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किसके पास क्या हैं विकल्प | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ ने सेनाध्यक्ष का पद छोड़ दिया है और वो अब एक गैर फ़ौजी के तौर राष्ट्रपति पद की शपथ ले सकते हैं. पाकिस्तान के बदलते राजनीतिक परिदृश्य में आने वाले दिनों में राष्ट्रपति मुशर्रफ़, पीकिस्तान पीपुल्स पार्टी की नेता बेनज़ीर भुट्टो और पाकिस्तान मुस्लिम लीग ( नवाज़) के प्रमुख नवाज़ शरीफ़ के समक्ष क्या विकल्प हो सकते हैं. जनरल मुशर्रफ़ सेनाध्यक्ष का पद छोड़ने के राष्ट्रपति मुशर्रफ़ के फ़ैसले को 1999 में सैन्य तख्तापलट के बाद का सबसे महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है. 1999 में तख्तापलट के ज़रिए मुशर्रफ़ सत्ता पर काबिज़ हुए थे. हालांकि तख्तापलट के बाद उनका रास्ता उतना आसान नहीं रहा जितना उन्होंने सोचा था. आगे चलकर वो राष्ट्रपति बने लेकिन दूसरी बार राष्ट्रपति पद की शपथ लेने से पहले उन्हें आपातकाल लगाना पड़ा और सुप्रीम कोर्ट के कई न्यायाधीशों को बर्खास्त करना पड़ा. आपातकाल को लेकर हो रहा विवाद उनका पीछा शायद ही छोड़े. आने वाले दिनों में वो चुनाव के ज़रिए जीत कर आने वाले प्रधानमंत्री और नए सैन्य प्रमुख के साथ सत्ता की भागेदारी करेंगे. हालांकि चुनी गई सरकार को बर्खास्त करने का अधिकार राष्ट्रपति के पास रहेगा लेकिन इस तरह का फ़ैसला इस बात पर निर्भर करेगा कि नया प्रधानमंत्री कितना लोकप्रिय है और सेना राष्ट्रपति का कितना साथ देती है. इससे पहले भी राष्ट्रपति की किसी भी प्रकार की कार्रवाई सेना के समर्थन पर निर्भर करती रही है लेकिन पिछले कुछ समय में सेना की भी कड़ी आलोचना होती रही है. आलोचक मानते हैं कि नए सैन्य प्रमुख के लिए सबसे बड़ी चुनौती सेना की छवि सुधारना और सैनिकों का मनोबल ऊंचा करना होगा. उधर मुशर्रफ़ चाहेंगे कि उन्हें सेना का समर्थन मिलता रहे और वोलोकतांत्रिक तौर पर चुने गए नेताओं के साथ सत्ता में पूरी भागेदारी न करने के सेना के सामूहिर रवैये का फ़ायदा उठाएं. ये तो आगे की बात हुई, तत्काल अगर देखा जाए तो मुशर्रफ़ के लिए सबसे बड़ी चिंता आने वाले चुनावों में पाकिस्तान मुस्लिम लीग क्यू के प्रदर्शन को लेकर है क्योंकि यह दल उन्हें पूर्व में रबर स्टांप जैसी संसद उपलब्ध कराती रही है. लेकिन अगर पीएमएल क्यू का प्रदर्शन इतना बेहतर होता है कि प्रधानमंत्री उनका बने तो इसमें आश्चर्य नहीं कि यह पार्टी भी मुशर्रफ़ के हाथ बांधने में पीछे नहीं रहेगी.
इतना ही नहीं कुछ आलोचकों के अनुसार चुनावों में गड़बड़ी करने की मुशर्रफ़ की कोई कोशिश उनके लिए आखिरी लड़ाई साबित हो सकती है. बेनज़ीर भुट्टो पूर्व प्रधानमंत्री बेनज़ीर भुट्टो इस समय उसी व्यवस्था की स्थापना करने में लगी हुई हैं जिसके कारण नब्बे के दशक में उन्हें खासा नुकसान उठाना पड़ा था. दो बार प्रधानमंत्री चुनी गईं बेनज़ीर को दोनों ही बार तत्कालीन राष्ट्रपतियों ने अपने अधिकारों का प्रयोग करते हुए बर्खास्त कर दिया था. लेकिन आलोचकों और विशेषज्ञों का मानना है कि बेनज़ीर अब पहले से अधिक चतुर हो गई हैं. अमरीका और पाकिस्तान के प्रशासन में उनकी ज़बर्दस्त नेटवर्किंग के कारण उन्हें पाकिस्तान वापसी में ख़ास मुश्किलें नहीं हुई हैं. उन्होंने पाकिस्तान आते ही न केवल मुशर्रफ़ को चुनौती दी बल्कि पीएमएल क्यू को भी पंजाब प्रांत में खुली चेतावनी दे डाली है. वरिष्ठ पाकिस्तानी विशेषज्ञ इरशाद अहदम हक्कानी कहते हैं कि बेनज़ीर न केवल खुद वापस आईं बल्कि अमरीकी प्रशासन को नवाज़ शरीफ़ की वापसी को समर्थन देने के लिए भी राज़ी किया है. बेनज़ीर को सिंध प्रांत में व्यापक समर्थन है और पंजाब में भी उनके समर्थकों की संख्या में इज़ाफा हुआ है. पंजाब नवाज़ शरीफ़ का गढ़ माना जाता है और अगर बेनज़ीर पंजाब में पीएमएल क्यू और नवाज़ शरीफ़ के लिए तिकोने संघर्ष की स्थिति पैदा कर दें तो यह बड़ी बात होगी. कहा ये भी जा रहा है कि वो नवाज़ शरीफ़ के साथ पंजाब में सीटों की भागेदारी पर भी विचार कर रही हैं ताकि पीएमएल क्यू की उपस्थिति नगण्य हो सके. हालांकि नवाज़ शरीफ़ के संभावित चुनावी बहिष्कार और चुनावी धांधली की स्थिति में त्रिशंकु संसद बनेगी जिसमें बेनज़ीर के विकल्प सीमित हो सकते हैं.
नवाज़ शरीफ़ नवाज़ शरीफ़ भी उन नेताओं में हैं जो दो बार पाकिस्तान के प्रधानमंत्री रहे हैं और उन्हें बेनज़ीर भुट्टो से कड़ी टक्कर का सामना करना पड़ रहा है. लेकिन अगर उनकी पार्टी पूरा ज़ोर लगा दे तो वो पंजाब मे बेहतरीन प्रदर्शन कर पीएमएल क्यू को ख़त्म कर सकते हैं. सन् 2000 में अदालत द्वारा सज़ा सुनाए जाने के कारण भी नवाज़ शरीफ़ की उम्मीदवारी शक के घेरे में है. उन्हें आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई थी जिसे राष्ट्रपति मुशर्रफ़ ने माफ़ कर दिया पर इसके बाद ही मुशर्रफ़ ने उन्हें निर्वासित कर दिया था. शायद यही कारण है कि नवाज़ शरीफ़ के चुनाव में भागेदारी के लिए कड़ी शर्ते रखी हैं. उनकी मांग है कि राष्ट्रपति मुशर्रफ़ तीन नवंबर को आपातकाल की घोषणा के बाद सुप्रीम कोर्ट के बर्खास्त किए गए सभी न्यायाधीशों बहाल करें. ऐसा संभव नहीं है क्योंकि इन्हीं न्यायाधीशों की बर्खास्तगी के बाद अब मुशर्रफ़ दोबारा राष्ट्रपति पद की शपथ लेने वाले हैं. नवाज़ शरीफ़ ने यह भी कहा है कि वो ऐसी किसी सरकार में प्रधानमंत्री नहीं बनेंगे जिसके राष्ट्रपति मुशर्रफ़ हों. यही कारण है कि नवाज़ शरीफ़ के लिए चुनावों का बहिष्कार करना सबसे अच्छा विकल्प है लेकिन इसके लिए उन्हें बेनज़ीर का भी समर्थन चाहिए होगा. दूसरा विकल्प ये है कि नवाज़ शरीफ़ बेनज़ीर के साथ मिलकर पीएमएल क्यू के ख़िलाफ लड़ें. पीएमएल क्यू नवाज़ शरीफ़ की पार्टो को तोड़कर ही बनवाई गई थी. | इससे जुड़ी ख़बरें आपातकाल के ख़िलाफ़ बेनज़ीर की रैली08 नवंबर, 2007 | भारत और पड़ोस बेनज़ीर ने मुशर्रफ़ पर दबाव बढ़ाया10 नवंबर, 2007 | भारत और पड़ोस 'सत्ता में भागीदारी पर कोई बातचीत नहीं'12 नवंबर, 2007 | भारत और पड़ोस नवाज़ शरीफ़ पाकिस्तान लौटे25 नवंबर, 2007 | भारत और पड़ोस मुशर्रफ़ को सुप्रीम कोर्ट से राहत मिली22 नवंबर, 2007 | भारत और पड़ोस मुशर्रफ़ ने सेना की कमान छोड़ी28 नवंबर, 2007 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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