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चुनावी बिसात पर सिर उठाते सवाल | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पाकिस्तान में वर्ष 2008 का आम चुनाव किसी एक मुद्दे पर नहीं बल्कि बहुत से मुद्दों पर लड़ा जा रहा है. इनमें सब से बड़ा मुद्दा - 'मौजूदा व्यवस्था का जायज़ होना और न्यायपालिका का भविष्य' है. पिछले कुछ महीनों में कई ऐसी घटनाएँ हुई हैं जिन्होंने पाकिस्तान की मौजूदा व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है. इनमें प्रमुख हैं - राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ का पिछले साल नौ मार्च को चीफ़ जस्टिस इफ़्तिख़ार चौधरी को बर्ख़ास्त करना, सुप्रीम कोर्ट का उन्हें पद पर बहाल करना, राष्ट्रपति मुशर्रफ़ का गले पांच बरसों के लिए ख़ुद को वर्दी में राष्ट्रपति निर्वाचित करवाने के लिए क़दम उठाना और फिर अपने चुनाव के अवैध घोषित किए जाने के डर से तीन नवंबर को आपातकाल लागू करना और 60 से अधिक न्यायधीशों को घर भेज देना. न्यायपालिका की स्थिति
इसीलिए नवाज़ शरीफ़ की मुस्लिम लीग ने अपने चुनाव प्रचार का केंद्र 'राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ से छुटकारा और न्यापालिका की बहाली' को बनाया है. यही नहीं, पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज़) चुनाव में भाग लेने वाली एक मात्र पार्टी है जिसने 1997 में आपातकाल लागू होने से पहले की न्यायपालिका की स्थिति को बहाल करने को ज़ोरशोर से उठाया है. लेकिन पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी ने इस बारे में न तो अपने घोषणा पत्र में कुछ कहा है और न ही चुनाव प्रचार के दौरान कोई साफ़ बात कही है. पीपुल्स पार्टी का सारा ज़ोर बेनज़ीर भुट्टो के नाम पर वोट हासिल करने में लग रहा है. इसी प्रकार महँगाई, अर्थव्यवस्था, और आटे, गैस और बिजली की क़िल्लत भी बड़े चुनावी मुद्दे हैं. महँगाई, आटे-दाल का सवाल पाँच साल तक सत्ता में रही पाकिस्तान मुस्लिम लीग (क्यू) के चुनाव प्रचार का सारा ज़ोर पिछले पांच बरसों में देश में होने वाली 'तरक़्क़ी' पर है. लेकिन जिस प्रकार 2004 के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को 'शाइनिंग इंडिया' ने धोखा दिया था इसी तरह सत्ता में रही पाकिस्तान मुस्लिम लीग (क्यू) के गले में आर्थिक प्रगति का दावा रस्सी बन गया है.
महंगाई, आटे, गैस और बिजली की समस्याओं ने उनके प्रचार के दौरान काफ़ी मुश्किलें पेश की हैं क्योंकि पाकिस्तान मुस्लिम लीग (क्यू) का उम्मीदवार जहां कहीं भी जाता है लोग उनसे आत्मघाती हमलों और आटे बिजली का सवाल करते हैं. लेकिन आर्थिक समस्या जितनी गंभीर हैं बड़ी-बड़ी राजनीतिक पार्टियों के घोषणा पत्र उन के सामाधान से उतने ही ख़ाली है. चरमपंथ के ख़िलाफ़ जंग तीसरा बड़ा चुनावी मुद्दा पाकिस्तान का चरमपंथ के ख़िलाफ़ युद्ध का भाग बनने की नीति है. पाकिस्तान मुस्लिम लीग (क्यू) के अलावा हर राजनीतिक पार्टी का मानना है कि चरमपंथ के ख़िलाफ़ जंग दरअसल अमरीका की जंग है. उनका मानना है कि अमरीका के कहने पर मुशर्रफ़ सरकार वज़ीरिस्तान, स्वात और बलूचिस्तान में अपने ही लोगों को मारकर अमरीका से उसकी क़ीमत वसूल कर रही है. वोटरों को यह भी एहसास है कि विदेश और विशेषकर अमरीका, ब्रिटेन, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात ने बेनज़ीर भुट्टो और नवाज़ शरीफ़ को पाकिस्तान की राजनीति में दोबारा शामिल करवाने के लिए मुख्य भूमिका निभाई है. अगर बड़ी-बड़ी पार्टियाँ मुशर्रफ़ को अमरीकी 'ग़लाम' कह कर सीधा निशाना लगा रही हैं लेकिन अमरीका समेत दूसरे देशों की आलोचना करने से कतरा रही हैं. यहाँ तक कि धार्मिक पार्टियाँ जिंहोंने 2002 के चुनाव में अमरीका विरोधी नारे लगा सफलता हासिल की थी वे भी इस बार इतने जोश और उत्साह का प्र्दर्शन नहीं कर रही हैं. |
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