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सोमवार, 18 फ़रवरी, 2008 को 06:19 GMT तक के समाचार
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पाक:चुनावी इतिहास, राजनीतिक घटनाक्रम

चुनाव की तैयारियां
पाकिस्तान में पिछले सातों चुनावों में कभी भी 50 प्रतिशत से ज़्यादा वोट नहीं पड़े हैं
पाकिस्तान बनने के बाद अब तक वहाँ दो बार संविधान बनाया जा चुका है लेकिन इस सब के बावजूद कोई ऐसा चुनाव नहीं हुआ जिसे राष्ट्रीय चुनाव कहा जा सके.

पाकिस्तान में 1951 से 1954 तक के तीन सालों में पंजाब, सिंध, सूबा सरहद, और पूर्वी पाकिस्तान (आज का बंगलादेश) में प्रांतीय चुनाव हुए.

लेकिन इन चुनाव में तत्कालीन सत्ताधारी मुस्लिम लीग ने इतनी खुली धांधली की कोशिश की, कि आम आदमियों ने उन्हें 'झरलू' चुनाव का नाम दे दिया.

दरअसल, 'झरलू' उस डंडे को कहते हैं जो मदारी किसी कपड़े पर फेर कर उससे कभी नोट तो कभी फूल निकालने का करतब दिखाता है.

सरकारी आयोग की रिपोर्ट

वर्ष 1956 में होने वाले चुनावी सुधारों में सरकारी आयोग ने अपनी रिपोर्ट में ये स्वीकार किया कि जितने भी प्रांतीय चुनाव हुए वो सब ‘जाली और फ़्रॉड’ थे.

उसी वर्ष यानी 1956 में पाकिस्तान में संविधान लागू किया जाना था और इसी के तहत संसद के चुनाव कराए जाने थे.

 1956 में होने वाले चुनावी सुधारों में सरकारी आयोग ने अपनी रिपोर्ट में ये स्वीकार किया कि जितने भी प्रांतीय चुनाव हुए वो सब ‘जाली और फ़्रॉड’ थे
वुसअतुल्लाह ख़ान

लेकिन इसके पहले ही सिकंदर मिर्ज़ा और अय्यूब ख़ान का मार्शल लॉ आ गया.

इस मार्शल लॉ ने असेंबली और संविधान को ही ख़त्म कर दिया.

इसके बाद तो इन तानाशाहों ने ये मान लिया कि पाकिस्तान की जनता अभी लोकतंत्र के क़ाबिल नहीं हैं.

इसीलिए 'बुनियादी लोकतंत्र' के नाम पर अप्रत्यक्ष चुनाव के ज़रिए राष्ट्रपति का चुनाव करवाया गया. ये अप्रत्यक्ष चुनाव वैसे ही हुए जैसे भारत में राज्यसभा के सदस्य को चुना जाता है.

 वर्ष 1970 में अय्यूब ख़ान की सरकार के जाने के बाद पहली बार एक व्यक्ति-एक वोट के आधार पर संसदीय चुनाव हुए

यानी उस वक्त चार करोड़ आम मतदाताओं ने पहले 80 हज़ार काउंसलरों को चुना और फिर इन काउंसलरों ने राष्ट्रपति का चुनाव किया.

अय्यूब से ज़िया तक

वर्ष 1970 में अय्यूब ख़ान की सरकार के जाने के बाद पहली बार एक व्यक्ति-एक वोट के आधार पर संसदीय चुनाव हुए.

चुनाव की तैयारी
पाकिस्तान में सोमवार को आम चुनाव के लिए मतदान होना है

इसके बाद तत्कालीन राष्ट्रपति और सेनाध्यक्ष जनरल यहया ख़ान की सरकार ने पूर्वी पाकिस्तान में मौलाना अब्दुल हमीद भाषानी की नेशनल अवामी पार्टी को समर्थन दिया.

वहीं, इसी सरकार ने पश्चिमी पाकिस्तान में ख़ान अब्दुल कय्यूम ख़ान की 'मुस्लिम लीग' और 'जमाअत-ए-इस्लामी' की मदद करने की कोशिश की.

लेकिन सरकार के समर्थन वाली पार्टियाँ शैख़ मुजीबुर्रहमान की 'अवामी लीग' और ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो की 'पीपुल्स पार्टी' के मुक़ाबले बुरी तरह पराजित हो गईं.

वर्ष 1975 में भुट्टो सरकार ने 'आईएसआई' में पॉलिटिकल सेल यानी राजनीतिक गतिविधियों पर नज़र रखने वाली शाखा की स्थापना की.

इसके बाद 1977 से लेकर 2002 तक पाकिस्तान में सात चुनाव हुए. लेकिन कोई चुनाव ऐसा नहीं रहा जिसमें सत्ताधारी पार्टी पर चुनावों में धांधली करने का इल्ज़ाम न लगता रहा हो.

 1977 से लेकर 2002 तक पाकिस्तान में सात चुनाव हुए. लेकिन, कोई चुनाव ऐसा नहीं रहा जिसमें सत्ताधारी पार्टी पर चुनावों में धांधली करने का इल्ज़ाम न लगता रहा हो

वर्ष 1985 में जनरल ज़िया-उल-हक़ ने ऐसे चुनाव करवाए जिनमें कोई व्यक्ति, उम्मीदवार तो हो सकता था, लेकिन किसी पार्टी को चुनाव में भाग लेने की इजाज़त नहीं थी.

इस सारी परेड का मक़सद ये था कि पीपुल्स पार्टी ज़ुलफ़िक़ार अली भुट्टो की फांसी को मुद्दा बना कर चुनाव में कामयाब न हो जाए.

इसलिए ये चुनाव उम्मीदावारों ने ज़ात, बिरादरी, और नस्ल की बुनियाद पर लड़े.

 वर्ष 1985 में जनरल ज़िया-उल-हक़ ने ऐसे चुनाव करवाए जिनमें कोई व्यक्ति, उम्मीदवार तो हो सकता था, लेकिन किसी पार्टी को चुनाव में भाग लेने की इजाज़त नहीं थी

हालांकि, एक तरफ़ लोग ये भी मानते थे कि जनरल ज़िया राजनीतिक पार्टियों के नाम से ही चिढ़ते थे इसीलिए उन्होंने ऐसा किया.

बाद में फ़ौज और जांच एजेंसियाँ भी जनरल ज़िया-उल-हक़ की इस व्यवस्था की सफलता के लिए काम करने पर मजबूर थीं.

फिर इन्हीं निर्वाचित सदस्यों ने संसद में 'नई मुस्लिम लीग' का निर्माण किया, जिसके विभिन्न गुट आज हमारे सामने हैं.

इस्लामी जम्हूरी इत्तेहाद

जनरल ज़िया की मौत के बाद अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए 1988 के चुनाव में पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई ने नौ पार्टियों का 'इस्लामी जम्हूरी इत्तेहाद' यानी 'आई जे आई' बनवाई. ताकि वो बेनज़ीर भुट्टो को बहुमत हासिल करने से रोक सके.

इस गठबंधन का नेतृत्व मियाँ नवाज़ शरीफ के हाथ में था.

वर्ष 1990 के चुनाव में 'आई जे आई' को बाक़ायदा धन मुहैया करा कर कामयाब किया गया.

 पाकिस्तान में पिछले सातों चुनावों में कभी भी 50 प्रतिशत से ज़्यादा वोट नहीं पड़ सके हैं

नवाज़ शरीफ़ का दौर

लेकिन 1997 के चुनाव में नवाज़ शरीफ़ दो तिहाई बहुमत लेकर उनके क़ाबू से बाहर हो गए.

इसके बाद, जब नवाज़ ने अपनी मनमानी शुरू कर दी तो जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ की नई सरकार ने सीख ली और 2002 के चुनाव के लिए मुस्लिम लीग(क्यू) के नाम से एक नई पार्टी खड़ी कर दी.

लोग इस तथ्य को खुलकर स्वीकार कर चुके हैं कि ये सारी राजनीति सिर्फ़ इसलिए की गई थी ताकि 1970 की तरह कोई भी पार्टी इतना बहुमत न हासिल कर ले कि वो सेना और एजेंसियों के लिए गंभीर चुनौती बन जाए.

मतदान
हिंसा के दौर के बीच पाकिस्तान में मतदान होना है

शायद यही वजह है कि पाकिस्तान में पिछले सातों चुनावों में कभी भी 50 प्रतिशत से ज़्यादा वोट नहीं पड़ सके हैं.

इन्हीं आंकड़ों से राजनीति में जनता की दिलचस्पी का अंदाज़ा लगाया जा सकता है.

18 फ़रवरी को फिर मतदान हो रहा है और हालिया घटनाओं के बाद ये अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि इस बार मतपेटी में पड़ने वाले वोटों का प्रतिशत क्या होगा?

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