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पाकिस्तान में अल्पसंख्यक वोट | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पाकिस्तान में कितने ईसाई, हिंदू और पारसी या सिख रहते हैं कभी राष्ट्रीय जनगणना के ज़रिए उनकी संख्या तीन प्रतिशत बताई जाती है तो कभी पांच प्रतिशत तक कह दी जाती है. जब पाकिस्तान बना तो उस वक़्त अहमदी समूदाय के लोग मुसलमान समझे जाते थे और दूसरे अल्पसंख्यकों के साथ भी सरकारी स्तर पर कोई भेदभाव नहीं था. इसलिए पाकिस्तान की पहली असेंबली के पहले स्पीकर और क़ानून मंत्री जोगेंद्र नाथ मंडल एक बंगाली हिंदू और पहले विदेश मंत्री सर ज़फ़रुल्लाह ख़ान एक अहमदी मुसलमान थे. फ़ौज में ईसाइयों का प्रतिनिधित्व भी था और अहमदियों की एक अच्छी ख़ासी तादाद थी. इसका कारण पूर्वी पाकिस्तान भी था जहां 20 प्रतिशत हिंदू आबादी को दरकिनार नहीं किया जा सकता था और एक उदार कल्चर या माहौल को पूरी तरह से ख़ुदा हाफ़िज़ नहीं कहा जा सकता था. लेकिन पूर्वी पाकिस्तान जब बंगलादेश बन गया तो पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की संख्या अचानक 25 प्रतिशत से घट कर साढ़े तीन प्रतिशत रह गई. इसलिए हम देखते हैं कि अल्पसंख्यकों के साथ पहला काम ये हुआ कि ज़ुल्फ़िक़्क़ार अली भुट्टो की सरकार ने 1970 के चुनाव में अल्पसंख्यकों के काफ़ी वोट प्राप्त करने के बावजूद, जिन शिक्षा संस्थानों का राष्ट्रीयकरण किया उनमें ईसाइयों के शिक्षा संस्थान भी शामिल थे जिनका स्तर सबसे अच्छा होता था. संविधान में बड़ा बदलाव उसके बाद 1973 के संविधान में साफ़-साफ़ लिखा गया कि पाकिस्तान का राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री सिर्फ़ मुसलमान ही बन सकता है. यह बात भुट्टो की उदारवादी और समाजवादी छवि के बिलकुल विपरीत थी. 1974 में अहमदियों को धार्मिक पार्टियों के दबाव में अल्पसंख्यक क़रार दिया गया और इस प्रकार अल्पसंख्यकों की जनसंख्या तीन प्रतिशत से बढ़ कर पांच प्रतिशत तक पहुंच गई. लेकिन अच्छी बात ये थी कि संविधान के तहत अल्पसंख्यकों के लिए न सिर्फ़ संसद और प्रांतीय असेंबलीयों में सुरक्षित सीटें रहीं बल्कि वह आम सीटों पर भी उम्मीदवार बन सकते थे और वोट दे सकते थे. लेकिन जब जनरल ज़ियाउलहक़ ने धार्मिक गुटों को अफ़ग़ान युद्ध के दौरान आपना समर्थक बनाने की नीति अपनाई तो अल्पसंख्यकों के लिए मुसीबतों का सबसे मुश्किल दौर शुरू हो गया.
उन्हें आम चुनाव में वोट देने के अधिकार से वंचित कर दिया गया वह सिर्फ़ सुरक्षित सीटों के लिए मतदान कर सकते थे. हिंदू सिर्फ़ हिंदू उम्मीदवारों और ईसाई सिर्फ़ ईसाई उम्मीदवारों को वोट डाल सकते थे. नतीजे में अल्पसंख्यकों की राजनीतिक सौदेबाज़ी की स्थिति और देश की राजनीतिक पार्टियों के नज़दीक अल्पसंख्यकों के वोट की जो थोड़ी बहुत अहमियत थी वह भी ख़त्म हो गई. अल्पसंख्यक अपने ऐसे नेताओं के रहमो-करम पर रह गए जो बार बार निर्वचित होकर हर सरकार का समर्थन करते थे और बदले में निजी लाभ उठाते थे. इस प्रणाली के तहत 1985 से 1997 तक पांच चुनाव हुए. राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ की सरकार को कम से कम यह श्रेय ज़रूर जाता है कि उन्होंने 2002 के आम चुनाव से पहले जो फ़ैसले किए उनमें से एक यह भी था कि 1973 के बाद पहली बार अल्पसंख्यकों के लिए न सिर्फ़ संसद और प्रांतीय असेंबलियों में सुरक्षित सीटें रखी गईं बल्कि उनके प्रतिनिधि किसी भी राजनीतिक पार्टी के टिकट पर आम सीट के लिए भी चुनाव लड़ सकते थे और वोट डाल सकते थे. 2002 के चुनाव में कुल 77 पार्टियों ने भाग लिया और उनमें से 15 पार्टियों का संबंध अल्पसंख्यक समुदाय से था. इन सुधारों के नतीजे में पिछले चुनाव में मुस्लिम लीग (क्यू) को अल्पसंख्यकों ने धन्यवाद करने के लिए काफ़ी वोट डाले थे. लेकिन 18 फ़रवरी के चुनाव में जिस तरह किसी चीज़ के बारे में भविष्यवाणी नहीं की जा सकती उसी तरह अल्पसंख्यकों के बारे ये भी कहना मुश्किल है कि उनके वोट का ऊंट किस करवट बैठेगा. | इससे जुड़ी ख़बरें एसजीपीसी का ननकाना साहिब पर प्रस्ताव08 नवंबर, 2005 | भारत और पड़ोस पाक चुनाव: अल्पसंख्यकों के मुद्दे16 फ़रवरी, 2008 | भारत और पड़ोस 'भारत-पाकिस्तान मसले सुलझा सकते हैं'22 सितंबर, 2004 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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