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'ये सब पाकिस्तान की ख़ातिर है' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पाकिस्तान में आपातकाल की घोषणा के बाद जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ ने कहा है कि पाकिस्तान ख़तरनाक दौर से गुज़र रहा है और देश की सुरक्षा पर पैदा हुए ख़तरे को देखते हुए उनके पास इमरजेंसी लागू करने के अलावा कोई चारा नहीं था. पाकिस्तान के सरकारी टीवी पर देश के नाम संदेश में उन्होंने विशेष तौर पर पश्चिमी देशों को संबोधित करते हुए कहा कि पाकिस्तान अस्थिरता की कगार पर है और उन्हें स्थिति की गंभीरता को समझना चाहिए. उन्होंने कहा कि जिन हालात में पाकिस्तान पहुँच चुका था वे काफ़ी गंभीर और चिंताजनक थे और ऐसे में वो देश को आत्महत्या करते हुए नहीं देख सकते थे. राष्ट्रपति मुशर्रफ़ ने पूरे देश में 'बढ़ रही चरमपंथी गतिविधियों और विधायिका और कार्यपालिका के कामकाज में न्यायपालिका हस्तक्षेप' को इमरजेंसी लगाने की मुख्य वजह बताया. उन्होंने मध्यरात्रि के समय राष्ट्र के नाम संबोधन में कहा, "ये सब मैंने पाकिस्तान की ख़ातिर किया है. देश के लिए मुझे जान भी देनी पड़े तो मैं पीछे नहीं हटूँगा." उनका कहना था, "दहशतगर्दी और इंतहापसंदी चरम पर है. आत्मघाती हमलावर पूरे पाकिस्तान में घूम रहे हैं. क़ानून लागू करने वाली संस्था न्यायपालिका के दबाव में सहमी हुई है." मुशर्रफ़ कहते हैं, "कोशिश सरकार के भीतर सरकार चलाने की हो रही है. लाल मस्जिद में यही हुआ. ये लोग पाकिस्तान की सुरक्षा को सीधे तौर पर चुनौती दे रहे हैं. बड़ा ही संगीन सूरतेहाल है." पाकिस्तानी राष्ट्रपति ने जनता से समर्थन देने की अपील करते हुए कहा, "इस्लाम के नाम पर लोगों को चरमपंथी गुमराह कर रहे हैं. यहाँ तक कि राजधानी इस्लामाबाद में दहशतगर्द घूम रहे हैं और मुझे अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में इनकी करतूतों के कारण शर्मिंदगी झेलनी पड़ रही है." अविश्वास का माहौल उनका कहना था कि पूरा देश पिछले कुछ महीनों से अनिश्चय के माहौल में है. न्यायपालिका और ख़ास कर सुप्रीम कोर्ट को आड़े हाथों लेते हुए उन्होंने कहा, "अगर क़ानून लागू करने वालों से कोई ग़लती हो जाए तो पूरे मुल्क को अस्थिर करना ठीक नहीं होगा."
मुशर्रफ़ ने इस वर्ष नौ मार्च को मुख्य न्यायाधीश इफ़्तिख़ार चौधरी के ख़िलाफ़ जाँच के निर्देशों को जायज़ सही ठहराते हुए कहा, "सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे की समीक्षा ही नहीं की. फिर भी मैंने फ़ैसला माना लेकिन स्थितियाँ नहीं बदली. सुप्रीम कोर्ट ने लाल मस्जिद खोलने के निर्देश दिए. 61 चरमपंथियों को रिहा कर दिया गया जो पता नहीं क्या कर रहे होंगे." उन्होंने स्पष्ट किया कि इमरजेंसी लागू करने का फ़ैसला भी लोकतंत्र की बहाली के प्रयासों का ही हिस्सा है. उन्होंने न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका के बीच सामंजस्य कायम करने की ज़रूरत बताई. 'नहीं देख सकता' राष्ट्रपति मुशर्रफ़ ने कहा कि वर्ष 1999 में सत्ता संभालने के बाद वर्ष 2002 तक त्रिस्तरीय मिशन के पहले चरण में उन्होंने ख़ुद कामकाज अपने हाथों में लिया. उनका कहना था, "इसके बाद वर्ष 2002 से वर्ष 2007 तक लोकतंत्र की दिशा में क़दम बढ़ाए गए. पहली बार सीनेट और नेशनल असेंबली ने कार्यकाल पूरा किया और हम तीसरे चरण में चुनाव कराने वाले ही थे कि स्थितियाँ बदल गईं. राष्ट्रपति चुनाव हो चुके हैं लेकिन मेरी उम्मीदवारी पर फ़ैसला अटका हुआ है. ये मेरे साथ क्या हो रहा है?" आर्थिक विकास में आए ठहराव का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा, "मैं पाकिस्तान की बर्बादी नहीं देख सकता. ये मुझे बर्दाश्त नहीं है." उन्होंने मीडिया के एक तबके पर नकारात्मक ख़बरें चलाने और अनिश्चय का वातावारण बनाने का आरोप लगाया. |
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