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शनिवार, 03 नवंबर, 2007 को 14:45 GMT तक के समाचार
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परवेज़ मुशर्रफ़ का मुश्किल दौर
परवेज़ मुशर्रफ़
परवेज़ मुशर्रफ़ सेनाध्यक्ष भी हैं
परवेज़ मुशर्रफ़ ने वर्ष 1999 में नवाज़ शरीफ़ का तख़्ता पलट करके सत्ता हासिल की थी. उस समय से उन्होंने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं. उन्होंने उस समय देश में सही मायने में लोकतंत्र लाने का वादा किया था और अर्थव्यवस्था में सुधार की बात कही थी.

अपनी सत्ता के शुरुआती वर्षों में पाकिस्तान की विदेश नीति पर सबसे ज़्यादा सवाल उठे. ख़ासकर कश्मीर मुद्दे पर भारत के साथ तनाव को लेकर.

लेकिन परवेज़ मुशर्रफ़ के अधीन पाकिस्तान की स्थिति में बड़ा बदलाव उस समय आया जब अमरीका में 11 सितंबर के हमले हुए. परवेज़ मुशर्रफ़ के लिए भी ये चुनौतीपूर्ण समय था.

लेकिन उन्होंने अमरीका के साथ 'आतंकवाद की लड़ाई' में साथ देने का फ़ैसला किया. लेकिन इस कारण घर में उनका विरोध शुरू हो गया. इस्लामी कट्टरपंथियों ने मुशर्रफ़ के इस फ़ैसले का जम कर विरोध किया.

लेकिन घरेलू मोर्चे पर उन्हें सबसे कड़ी चुनौती उस समय मिली जब उन्हें लाल मस्जिद में सैनिक कार्रवाई का आदेश देना पड़ा. इस कार्रवाई के दौरान 100 से ज़्यादा लोग मारे गए.

लाल मस्जिद में हुई कार्रवाई के बाद पाकिस्तान में एकाएक हिंसा की घटनाएँ बढ़ गई. सूबा सरहद और देश के उत्तरी क़बायली इलाक़ों में पाकिस्तानी सैनिकों पर लगातार हमले हुए.

फ़ैसला

साथ ही इसी साल मार्च में मुख्य न्यायाधीश इफ़्तिख़ार मोहम्मद चौधरी को निलंबित करने का फ़ैसला भी राष्ट्रपति मुशर्रफ़ के लिए काफ़ी मुश्किल साबित हुआ.

बेनज़ीर भुट्टो पिछले महीने स्वदेश लौटीं

इस मामले पर देशभर में मुशर्रफ़ के ख़िलाफ़ प्रदर्शन हुए. बाद में अदालत ने इफ़्तिख़ार मोहम्मद चौधरी को फिर से बहाल करके मुशर्रफ़ को बड़ा झटका दिया.

और तो और सेनाध्यक्ष रहते फिर से राष्ट्रपति बने रहने की उनकी कोशिश को भी अदालत में चुनौती दी गई. अभी सुप्रीम कोर्ट में इस मामले पर सुनवाई चल रही है क्या सेनाध्यक्ष रहते वे दोबारा राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव लड़ सकते थे या नहीं.

राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ की स्थिति इतनी कमज़ोर हुई कि उन्हें देश से बाहर रह रहीं पूर्व प्रधानमंत्री बेनज़ीर भुट्टो से समझौता करना पड़ा.

लेकिन एक और पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ को स्वदेश पहुँचने पर फिर लौटा दिया गया. हालाँकि बेनज़ीर भुट्टो पाकिस्तान लौटीं लेकिन उसी दिन उनके काफ़िले पर बड़ा हमला हुआ और बड़ी संख्या में लोग मारे गए.

उसके बाद सूबा सरहद में हिंसा का दौर जारी रहा. और अब परवेज़ मुशर्रफ़ ने देश में आपातकाल लगाने की घोषणा कर दी है. शायद मुशर्रफ़ इस समय अपने सबसे कठिन दौर से गुज़र रहे हैं.

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