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शनिवार, 12 जनवरी, 2008 को 14:56 GMT तक के समाचार
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किस हैसियत में ब्रूनी को लाएँगे सार्कोज़ी....

निकोलस सारकोज़ी और कार्ला ब्रूनी
पत्नी सेसिलिया से तलाक़ के बाद सारकोज़ी और ब्रूनी के बीच नज़दीकियाँ बढ़ी हैं
दूसरे देश के नेताओं की पत्नियों की यात्राओं के आदी रहे भारतीय अधिकारियों के लिए फ्रांसीसी राष्ट्रपति निकोला सार्कोज़ी की "फ़र्स्ट गर्लफ़्रेंड" का आना सिरदर्द बना हुआ है.

निकोला सार्कोज़ी इसी महीने की 24 तारीख़ को भारत आ रहे हैं. वे इस साल गणतंत्र दिवस समारोह के मुख्य अतिथि होंगे.

इस तरह के संकेत मिल रहे हैं कि वे अपने साथ 39 वर्षीय महिला मित्र और पूर्व सुपरमॉडल कार्ला ब्रूनी को भी ला रहे हैं.

निकोला सार्कोज़ी ने पिछले साल ही अपनी पत्नी सेसिलिया को तलाक़ दे दिया था.

जब मिस्र में सार्कोज़ी और ब्रूनी साथ-साथ घूम रहे थे तभी भारतीय विदेश मंत्रालय के अधिकारियों को इसका अंदाज़ा हो गया था कि कोई मुसीबत खड़ी होने वाली है.

भारतीय प्रोटोकॉल अधिकारी इस बात को लेकर परेशान हैं कि उन्हें "प्रथम महिला" का दर्जा दिया जाए या प्रतिनिधिमंडल का एक सदस्य मात्र माना जाए.

सवाल यह है कि राष्ट्रपति भवन में भोज के दौरान ब्रूनी क्या राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के पति देवी सिंह शेखावत के दाहिनी ओर बैठेंगी?

क्या वे राष्ट्रपति सार्कोज़ी के साथ ओबेरॉय होटल के 3,600 वर्गफ़ीट के कोहिनूर सयूट में रुकेंगी?

'तय करें फ़्रांसीसी'

सार्कोज़ी और ब्रूनी पर ख़बरें
दुनिया भर में इन दिनों सार्कोज़ी और ब्रूनी के क़िस्से मीडिया में छाए हुए हैं

विदेश विभाग के एक अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर ये स्पष्ट किया कि कई दिनों के सोच-विचार के बाद हम इस नतीजे पर पहुँचे हैं कि यह फ़्रांस को तय करना है कि कार्ला ब्रूनी को प्रथम महिला का दर्जा मिले या नहीं.

ये बात अधिकारी कह भले रहे हों लेकिन यह मामला उनके लिए परेशानी का सबब बना हुआ है.

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में कूटनीति पढ़ाने वाले पुष्पेश पंत कहते हैं, "हमारे अपने देश में बड़े नेताओं के ऐसे दोस्तों से रिश्ते रहे हैं. कोई किसी की मुँहबोली बहन है, कोई बहू है, कोई साली है, कोई किसी की भाभी है."

वे कहते हैं, "हक़ीकत कुल मिलाकर दिने भाईया, रातें माहिया वाली होती है. तो हम क्यों ये पाखंड पालें कि आदमी के रिश्ते विवाहेत्तर नहीं होते हैं."

सार्कोज़ी और ब्रूनी के रिश्तों पर पुष्पेश का मानना है, "वो कोई अपराध भी नहीं कर रहे हैं. उन्होंने अपनी पुरानी पत्नी को तलाक़ दे दिया है. वे एक महिला मित्र के साथ रह रहे हैं."

इस स्थिति में प्रोटोकॉल के सवाल पर पंत कहते हैं, "प्रोटोकॉल का जो महकमा है वो अपनी अहमियत इसमें समझता है कि बाल की खाल निकालें कि नंबर एक पर कौन बैठेगा और नंबर 118 पर कौन बैठेगा."

पुष्पेश पंत का मानना है, "अगर वे अपनी महिला मित्र को साथ लेकर आ रहे हैं तो अतिथि देवो भवः कहने वाले इस देश को मेहमाननवाज़ी निभानी चाहिए."

पहली बार नहीं...

सारकोज़ी और सिसिलिया
पिछले साल ही सारकोज़ी ने सेसिलिया से तलाक़ ले लिया था

निकोला सार्कोज़ी और ब्रूनी के साथ आने को लेकर इतना बवंडर मचा हुआ है लेकिन ऐसा पहली बार नहीं हुआ है.

सत्तर के दशक में एक अफ़्रीकी देश के निर्वाचित राष्ट्रपति शपथ लेने से पहले भारत की यात्रा पर आए थे और साथ में अपनी महिला मित्र को भी लाए थे.

विदेश मंत्रालय में एसजेएस चटवाल उस समय चीफ़ ऑफ़ प्रोटोकॉल थे.

चटवाल कहते हैं, "उन्हें राष्ट्रपति भवन पहुँचाकर जैसे ही मैं अपने दफ़्तर लौटा तो मेरे फ़ोन की घंटी बजी और उनके चीफ़ ऑफ़ प्रोटोकॉल ने कहा कि उनके राष्ट्रपति बहुत गुस्से में हैं."

वे बताते हैं, "मैं पहुँचा तो उन्होंने कहा कि हमारे दल की एक लड़की को आपने होटल में ठहरा दिया है जबकि मैंने उससे वायदा किया था कि वो मेरे साथ ठहरेगी."

जवाब में चटवाल ने कहा कि आपकी लिस्ट में वो अगर आपकी बीवी होतीं तो हम साथ ठहराते लेकिन हमारी सभ्यता के अनुसार किसी भी लड़की को आपके साथ ठहराना वाजिब नहीं होगा.

इस पर अफ़्रीकी देश के राष्ट्रपति ने चटवाल से अपने प्रधानमंत्री से बात करके आने कहा.

चटवाल ने प्रधान सचिव से बात की और प्रधान सचिव ने प्रधानमंत्री से बातकर निर्देश दिया कि अगर वो महिला उनकी बीवी नहीं हैं तो इस तरह की कोई गुंजाईश नहीं है.

चटवाल बताते हैं, "मैं वापस गया और उन्हें बताया कि हम उन्हें राष्ट्रपति भवन में नहीं ठहरा सकते. इस पर उन्होंने कहा कि तुम समझते नहीं हो, वो मेरी निजी सचिव है और मुझे समय-बेसमय उसे डिक्टेशन देता होता है."

...और मुस्कुराईं इंदिरा

इंदिरा गाँधी
एक राष्ट्राध्यक्ष ने कुछ ऐसा किया कि इंदिरा गाँधी भी मुस्कुराए बिना नहीं रह सकी थीं

चटवाल के यह कहने पर अफ़्रीकी राष्ट्रपति हँसने लगे कि पास के ही अशोका होटल में उस लड़की को ठहराया गया है और उन्हें गाड़ी की सुविधा भी दी गई है. आपको जब भी डिक्टेशन देने की ज़रूरत महसूस हो, आप उन्हें बुला सकते हैं.

लेकिन अगले दिन जो हुआ उसे देखकर उस समय की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भी मुस्कुराए बिना नहीं रह सकीं.

चटवाल बताते हैं, "भोज के दौरान उनके लोगों ने बैठने की व्यवस्था के साथ छेड़छाड़ कर उस लड़की को उस जगह पर बिठा दिया जहाँ राष्ट्रपति महोदय की पत्नी को होना चाहिए था."

वे बताते हैं, "श्रीमती गांधी ने इसे नोटिस किया और मुस्कुराकर मुझसे कहा कि अब इन लोगों ने बिठा दिया है, मैं कुछ नहीं कह रही, तुम भी कुछ मत कहना, अब जैसा है, चलने दो."

कुछ इसी तरह का वाक़या अर्जेंटीना के राष्ट्रपति अल फौनसिन के साथ हुआ था.

उन्हें भी सार्कोज़ी की तरह गणतंत्र दिवस परेड का मुख्य अतिथि बनाया गया था और वे भी अपनी पत्नी की जगह महिला मित्र के साथ आए थे.

उस समय अर्जेंटीना में भारत के राजदूत रहे लखन मेहरोत्रा याद करते हैं, "फौनसिन के चीफ़ ऑफ़ प्रोटोकॉल ने मुझसे कहा था कि उनकी पत्नी नहीं लेकिन एक दूसरी महिला उनके साथ जाएँगी."

मेहरोत्रा बताते हैं, "विदेश मंत्रालय का फ़ैसला यही था कि जिन-जिन लोगों को भी वहाँ के राष्ट्रपति लाना चाहें, ला सकते हैं, यह उनका अधिकार है."

और हो गई शादी...

इंडिया गेट पर गणतंत्र दिवस की तैयारियाँ
भारत ने गणतंत्र दिवस समारोह में सार्कोज़ी को बतौर मुख्य अतिथि आमंत्रित किया है

ये तो गर्लफ़्रेंड को अपने साथ लाने की बात हुई. लेकिन क़िस्से दूसरी तरह के भी हैं.

जाने-माने राजनीतिक विश्लेषक इंदर मल्होत्रा भी एक क़िस्सा सुनाते हैं जब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री मोहम्मद अली बोगरा भारत आए थे.

"बोगरा साहब अपनी बीवी के साथ आए थे. उनकी सचिव भी साथ में आई थीं जो उनके बच्चों की देखभाल भी करती थीं. उन्होंने ज़ोर दिया कि सचिव को भी साथ ठहराया जाए तो किसी तरह से बीवी के साथ वाले कमरे में उन महिला को भी ठहरा दिया गया."

मल्होत्रा बताते हैं, "उनके पाकिस्तान लौटने के दस दिनों बाद यह ख़बर मिली कि उन्होंने उस महिला से शादी कर ली."

इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सुकार्णों के बारे में मल्होत्रा बताते हैं, "सबको मालूम है कि उनकी क्या ख़ासियतें थी. वो जो चाहते थे, इंतज़ाम हो जाता था. राष्ट्रपति भवन में तो मुश्किल हुई लेकिन जब वे मुंबई के राजभवन में ठहरे तो कोई दिक्कत नहीं हुई."

झगड़े मियाँ-बीवी

ये तो रही प्रोटोकॉल की बात लेकिन इस तरह के भी कई मौक़े आए हैं जब किसी देश के प्रधानमंत्री पत्नी के साथ सरकारी यात्रा पर गए हों और गार्ड ऑफ़ ऑनर का निरीक्षण करते समय हवाई अड्डे पर ही सबसे सामने झगड़ पड़े हों.

मल्होत्रा सुनाते हैं, "कनाडा के प्रधानमंत्री पियरे त्रुदो यहाँ बड़ी इज्ज़त से आए थे. कई साल बाद जब वे जापान गए तब तक उनके रिश्ते बीवी से ऐसे बिगड़ चुके थे कि लोग गार्ड ऑफ़ ऑनर के लिए उनका इंतज़ार कर रहे थे और हवाई जहाज़ से उतरने के बाद दोनों मियाँ-बीवी सबसे सामने झगड़ रहे थे."

वे रूसी राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन का भी एक क़िस्सा सुनाते हैं. "आयरलैंड के प्रधानमंत्री एयरपोर्ट पर उनका इंतज़ार कर रहे थे लेकिन येल्तसिन साहब इतनी शराब पी गए थे कि वो हवाई जहाज़ से उतर ही नहीं सकते थे."

माओ के गाल को थपथपा गए राधाकृष्णन

सर्वपल्ली राधाकृष्णन
राधाकृष्णन ने जब माओ का गाल थपथपा दिया तो चीनी अधिकारी परेशान हो उठे थे

जब प्रोटोकॉल को कड़ाई से लागू करने की बात चली है तो यह जानना भी दिलचस्प होगा कि जब विदेशी प्रतिनिधिमंडल से विरोध जताने की बात आती है तो किस तरह की भाव-भंगिमा का सहारा लिया जाता है.

1972 में चीन में भारत के कार्यवाहक राजदूत रहे लखन मेहरोत्रा याद करते हैं, "ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो जब वहाँ आए थे जो चू एनलाई साहब ने उनके स्वागत में दावत दी थी."

वे बताते हैं कि 1972 के शिमला समझौते को हुए बहुत दिन नहीं हुए थे लेकिन अपने भाषण में एनलाई साहब ने कश्मीर का ज़िक्र किया और स्वनिर्धारण को फ़ैसले का आधार बता दिया.

चीनी नेता के इस बयान पर मेहरोत्रा अपनी पत्नी के साथ समारोह को छोड़ कर चले गए. दो दिन बाद भुट्टो साहब ने अपनी दावत दी और मेहरोत्रा वहाँ पत्नी के साथ गए.

वे बताते हैं, "भुट्टो साहब हम तक आए और हमसे कहा कि उस दिन आपको जाने की क्या ज़रूरत थी. और, मेरी मेरी पत्नी से बोले कि उन्होंने सोचा कि हम शौचालय जा रहे हैं. इस पर मेरी पत्नी ने उनसे कहा, सर हम दोनों साथ में शौचालय नहीं जाते हैं."

कुछ इसी तरह का काम किया था भारत के राष्ट्रपति रहे सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने.

देश के उपराष्ट्रपति की हैसियत से चीन यात्रा के दौरान उन्होंने वहाँ के सर्वोच्च नेता माओ-त्से तुंग के गाल को थपथपा दिया था.

इंदर मल्होत्रा मेहरोत्रा याद करते हैं, "माओ से जब राधाकृष्णन मिलने गए तो उन्होंने माओ के गाल को थपथपा दिया. चीनी अधिकारियों को घबराया देख राधाकृष्णन ने उन सबसे कहा कि आप लोग परेशान क्यों हो रहे हैं, मैंने ये तो स्तालिन को भी किया था और पोप को भी किया था."

नैतिकता के पैमाने

बात शुरू हुई थी सार्कोज़ी और कार्ला ब्रूनी की प्रस्तावित भारत यात्रा से.

भारत में आलम यह है कि मकान मालिक अविवाहित लोगों को किराए पर कमरे नहीं देते. शादी के बिना बच्चे पैदा करने की कल्पना भी नहीं की जा सकती.

वेलेंटाइन डे का विरोध
भारत में कई संगठन ऐसे हैं जो नैतिकता की दुहाई देकर हंगामा करते रहते हैं

समलैंगिकता अभी भी भारत में ग़ैर-क़ानूनी है.ऐसे में भारत की "मॉरल पुलिस" के पैमाने पर सारकोज़ी और ब्रूनी कितने खरे उतरेंगे,

इस पर पुष्पेश पंत कहते हैं, "यौन नैतिकता अपनी जगह पर है लेकिन क्या हम अपनी नैतिकता का पैमाना किसी ऐसे आदमी पर थोप सकते हैं जो दूसरे समाज और दूसरी संस्कृति में रह रहा है."

वे कहते हैं, "सार्कोज़ी साहब तो हिन्दुस्तान के दकियानूसी समाज के नागरिक नहीं हैं. अगर वे चौड़े सीने के साथ अपनी दोस्त को यहाँ ला रहे हैं और कुछ ऐसा नहीं कर रहे हैं जो अश्लील हो तो क्या दिक्कत है."

पंत कहते हैं, "हमारे देश में मुठ्ठी भर लोग हैं जो अपनी दकियानूस नैतिकता दूसरों पर थोपना चाहते हैं. चाहे सवाल वेलेंटाइन डे का हो या लड़िकयों के लिबास का, बंद दिमाग वाले लोग मुठ्ठी भर ही हैं."

बहरहाल इसमें कोई संदेह नहीं कि पापारात्सी फ्रांस की "प्रथम जोड़ी" का भारत में भी उसी तरह पीछा करेंगे, जिस तरह नील नदी के तट पर वे इन दोनों के पीछे साये की तरह पड़े थे.

और निकोला सार्कोज़ी भी शायद ही इसका बुरा मानेंगे.

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