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बसपा की ताकत और कमज़ोरियाँ | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
गुजरात चुनाव में जीत और उसके दो दिन बाद हिमाचल, भाजपा की इस फतह के बाद पुलकित पार्टी नेताओं ने कहा कि 2004 से जारी मनहूसियत टूट गई, अब तो हमारी लहर है. अख़बारों में बातें होने लगीं. क्या भाजपा सही कह रही है. चुनावों से भरे 2008 में राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, कर्नाटक के विधानसभा चुनाव और फिर लोकसभा के पांच साल... ऐसी बातें होनी जायज़ हैं. दिल्ली से चलती टीवी और अख़बारी बहस से लेकर गली मोहल्लों-चौराहों तक राजनीति में रुचि रखने वाले इस सवाल से खेल रहे हैं. पर जिनके कान ज़मीन पर लगे हैं और जो राजनीतिक दलों की दलदल से बाहर हैं वो कुछ और कहते हैं. अपनी अपनी राजनीति जाने माने इतिहासकार रामचंद्र गुहा कहते हैं, “भारत में 28 प्रदेश हैं. हर प्रदेश की अपनी अलग राजनीति है, अलग चेहरा है. गुजरात में नरेंद्र मोदी गुजराती अस्मिता की बात पर जीते. हिमाचल और उत्तराखंड में कांग्रेस इसलिए हारी क्योंकि वहाँ लोग विकास के मुद्दे पर पार्टी से ख़फ़ा थे.” यह पूछने पर कि कौन-सी राजनीतिक पार्टी आने वाले चुनावों में चौंका सकती है, गुहा कहते हैं, “कुछ समय से लग रहा है कि वह पार्टी बसपा है. किसी को अनुमान नहीं था कि वो उत्तर प्रदेश में स्पष्ट बहुमत के साथ आ सकते हैं.” यहाँ तक कि दक्षिणी राज्य कर्नाटक में भी जहाँ गुहा रहते हैं, वो बसपा को ऊपर चढ़ता देख रहे हैं.
बहुजन समाज पार्टी यानी मायावती, जिनकी ताकत हैं भरोसेमंद दलित मतदाता, सही सोशल इंजीनियरिंग और शायद तीखे तेवर. मायावती की पार्टी ने गुजरात में तीन फीसदी वोट पाए. एक नज़र में तीन फीसदी कुछ ख़ास नहीं लगते पर गुजरात कांग्रेस के अध्यक्ष भरत सिंह सोलंकी से पूछिए तो वो कहते हैं, “बसपा ने किस तरह दो से 12 हज़ार तक वोट पाकर कांग्रेस को नौ सीटों पर नुकसान पहुँचाया.” हिमाचल प्रदेश, जहाँ अभी हुए चुनावों में बसपा ने खाता खोला है, में हिमाचल कांग्रेस प्रवक्ता कुलदीप सिंह भी कुछ ऐसी ही बात करते हैं, “यहाँ कांग्रेस को 10 के क़रीब सीटों पर बसपा की वजह से नुकसान हुआ है.” इसके पहले उत्तराखंड में भी कुछ यही आलम था जहाँ बसपा ने पिछले चुनावों में 18 फीसदी वोट के साथ आठ विधायक पाए. महाराष्ट्र में बसपा अध्यक्ष बड़ी रैलियाँ कर रही हैं. दोनों जगह कांग्रेस काफी मज़बूत है. बसपा की वोट यात्रा कांग्रेस को आगे भी महंगी पड़ सकती है. पर क्यों इन राज्यों का दलित कांग्रेस से छिटक गया. क्या इसकी वजह कांग्रेस की केंद्रीय राजनीति में सत्ता के शीर्ष के चारों ओर केवल सवर्णों का होना है. सत्ता में सवर्ण कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह ऐसा नही मानते. वे बीते ज़माने के कद्दावर दलित नेता बाबू जगजीवन राम की बेटी मीरा कुमार को दिखाते है जो केन्द्र में मंत्री हैं. दिग्विजय सिंह सुशील कुमार शिंदे की भी बात करते हैं. इत्तेफ़ाक से ये वही शिंदे हैं जिनके नेतृत्व में पार्टी पिछला चुनाव महाराष्ट्र में जीती पर उन्हें मुख्यमंत्री के पद से हटाकर आंध्र प्रदेश का राज्यपाल बना कर प्रदेश से बाहर कर दिया गया. पर दिग्विजय सिंह जिन्हें अपनी पार्टी को उत्तर प्रदेश में पुनर्जीवित करने का काम सौंपा गया है, इतना तो मानते हैं कि कांग्रेस दलितों को ये महसूस नहीं करा पाई कि उनके लिए बनाए गए सारे कार्यक्रम और नीतियाँ कांग्रेस ने ही बनाए हैं. वे आने वाले समय मैं इस बात की पूर्ति करने की बात करते हैं. वोट बैंक में सेंध पर ऐसा नहीं है कि बसपा ने केवल कांग्रेस के ही वोट बैंक में सेंध लगाई हो. मध्य प्रदेश में 37 में से 34 दलितों के लिए आरक्षित सीटें भाजपा के पास हैं. ऐसा ही आलम राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भी है जहाँ भाजपा की सरकारें हैं. यहाँ बसपा के दलित वोट के बढ़ने का मतलब होगा भाजपा को नुकसान. पर मायावती की ऐसी कौन-सी कमजोरियां हैं जो उनके और उनकी पार्टी के उफ़ान को रोक सकती हैं. दूसरी पंक्ति के नेताओं का अभाव इस सवाल पर गुहा बताते हैं कि उनकी पार्टी में दूसरी पंक्ति के नेतृत्व का न होना पार्टी की बढ़त को सीमित कर सकता है. पर मध्य प्रदेश के फूल सिंह बरैया जो इस समय लोक जनशक्ति पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं, ज़्यादा खड़े ढंग से अपनी बात कहते हैं. वर्ष 2003 के अंत में वो बसपा के प्रदेश अध्यक्ष थे और चुनाव के टिकट बाँट रहे थे, तभी मायावती ने उन्हें हटा दिया. उस समय चुनाव के चंदे को लेकर काफी आरोप-प्रत्यारोप भी हुए थे. वो कहते हैं, “देश भर में कांशीराम जी के समय के जितने मूल कार्यकर्ता थे, जो पार्टी को सत्ता के दरवाज़े तक लेकर आए, उन सबको मायावती ने बाहर का रास्ता दिखा दिया है.” बरैया ऐसे लोगों के फेहरिस्त गिनाते हुए कहते हैं, “कांशीराम जी के साथ मध्य प्रदेश में दो बार सांसद रह चुके हरभजन सिंह लाखा, उत्तर प्रदेश के आरके चौधरी और राज बहादुर, राजस्थान के मेघवाल और महाराष्ट्र के कृष्ण हवाले थे, जिन लोगों ने पूरा आन्दोलन स्थापित किया. पर अब भारत भर में मायावती के साथ पार्टी का कोई मूल नेता नहीं है. उन्होंने सबको पार्टी से बाहर कर दिया.” बरैया भले अब मायावती के विरोधी हों, पर उनके सवाल कुछ हद तक जायज़ लगते हैं. क्यों मायावती के साथ नम्बर दो हैं ही नहीं, क्यों अपनी पार्टी में एक से 100 नम्बर तक वो ही वो हैं. कांशीराम के पदचिह्न दलित विचारक प्रोफेसर भाऊ लोखंडे जो नागपुर विश्वविद्यालय में बाबा साहेब अम्बेडकर चेयर पर हैं इसे एक सामान्य राजनीतिक बात बताते हैं. वे कहते हैं, “ऐसा तो हमेशा होता आया है कि जो भी सत्ता में आता है वो अपने आस-पास उन लोगों को रखता है जो उसके विश्वासपात्र होते हैं. और कांशीराम जी के साथ के लोग मायावती को ज़्यादा तवज्जो नहीं देते थे.” डॉ भाऊ लंबे समय से देश में दलित आन्दोलन पर नज़र रखे हुए हैं. बसपा की कमजोरियों के बारे में बात करने पर इतना तो वह भी कहते है कि जिस तरह से कांशीराम ने मायावती को चुना था और आगे के लिए तैयार किया था, उस तरह मायावती ने अपना उत्तराधिकारी नहीं चुना तो पार्टी बिखर जाएगी. हालांकि मायावती के पास अभी समय है क्योंकि कांशीराम को गए बहुत समय नहीं हुआ है पर उन्हें देर-सबेर यह करना ही होगा. लोखंडे कहते हैं कि अगर ऐसा न हुआ तो जिस तरह से भीमराव अम्बेडकर के जाने के बाद उनकी रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया गायकवाड़, बैरिस्टर खोब्रागडे के और अन्य खेमों के रूप में टूटकर बिखर गई वही हाल बसपा का होगा क्योकि बसपा आरएसएस की तरह का एक वैचारिक आन्दोलन नहीं, एक राजनीतिक आन्दोलन है. मतलब बसपा के लिए राह तो खुली है पर डगर बहुत कठिन है. बसपा पा सकती है सत्ता की कुंजी 2009 में अगर... और ये अगर बहुत बड़ा है. तब जब पार्टी खुले दिल से चले और उत्तर प्रदेश विकास की मिसाल बन पाए. हाँ और कोई भावनात्मक मुद्दा भी न हो तब. तब देखते हैं क्या होता है. | इससे जुड़ी ख़बरें मायावती ने लगाए कांग्रेस पर आरोप07 जनवरी, 2008 | भारत और पड़ोस केंद्रीय ख़ुफ़िया तंत्र पर नाकामी का आरोप23 नवंबर, 2007 | भारत और पड़ोस सतीश मिश्र का मंत्रिमंडल से इस्तीफ़ा13 नवंबर, 2007 | भारत और पड़ोस आरोप के बाद मंत्री का इस्तीफ़ा06 नवंबर, 2007 | भारत और पड़ोस 'बहनजी का दरबार' और बड़ा हुआ17 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस मायावती की नज़र अब दिल्ली पर16 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस ताज कॉरिडोर मामले में याचिका ख़ारिज10 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस चुनाव के लिए तैयार रहें: मायावती09 अक्तूबर, 2007 | भारत और 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