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रविवार, 30 दिसंबर, 2007 को 19:02 GMT तक के समाचार
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सरकार में शामिल हुए माओवादी
प्रचंड
माओवादी नेता राजशाही ख़त्म करने का फ़ैसला पहले चाहते थे
नेपाल में राजशाही ख़त्म करने को मिली संसद की मंज़ूरी के बाद माओवादी सरकार में शामिल हो गए हैं. इस साल सितंबर में माओवादी सरकार से यह कहते हुए हट गए थे कि जब तक राजशाही को ख़त्म नहीं किया जाएगा वे सत्ता में नहीं लौटेंगे.

पिछले साल माओवादियों ने अपना आंदोलन ख़त्म करते हुए राजनीति की मुख्यधारा में शामिल होने का फ़ैसला किया था. शुक्रवार को नेपाली संसद ने राजशाही ख़त्म करने को मंज़ूरी दे दी थी.

हालाँकि यह फ़ैसला अगले साल ही लागू हो पाएगा. अब माओवादियों के सरकार में शामिल होने के फ़ैसले के बाद नेपाल में राजनीतिक संकट ख़त्म होता दिख रहा है.

पहले नवंबर में चुनाव होने वाले थे लेकिन माओवादियों के फ़ैसले के बाद उसे टाल दिया गया था. अब सरकार में शामिल होने के निर्णय के बाद चुनाव की नई तारीख़ तय की जा सकती है.

मंज़ूरी

सरकार में शामिल पाँच माओवादियों को महत्वपूर्ण मंत्रालय दिए गए हैं. इनमें सूचना और संचार मंत्रालय भी शामिल है, जिसके अंतर्गत ही सरकारी मीडिया आता है.

राजा ज्ञानेंद्र के कई अधिकार छीन लिए गए हैं

माओवादी मंत्री को शहरी प्रशासन का प्रभार भी दिया गया है. दरअसल नेपाल की प्रमुख राजनीतिक पार्टियों ने नेपाल को गणतंत्र बनाने का मुद्दा संविधान सभा पर छोड़ने का फ़ैसला किया था, जिसके चुनाव अप्रैल में होने हैं.

लेकिन माओवादी चाहते थे कि ये फ़ैसला तुरंत लिया जाए. अब संसद ने राजशाही ख़त्म करने को मंज़ूरी दे दी है, तो इस मामले पर संविधान सभा की भूमिका कुछ ख़ास नहीं रह जाती है.

नेपाल में 1769 से राजशाही चल रही है. जून 2001 में नेपाल की राजशाही उस समय संकट के दौर से गुज़री जब राजकुमार दीपेंद्र ने नशे में अपने माता-पिता नेपाल नरेश बीरेंद्र और रानी ऐश्वर्या को मार डाला.

उन्होंने शाही परिवार के सात अन्य सदस्यों को भी मार दिया और फिर आत्महत्या कर ली. इसके बाद नेपाल नरेश बीरेंद्र के भाई ज्ञानेंद्र को राजा बनाया गया. लेकिन राजनीतिक दलों से उनके मतभेद चलते रहे.

फरवरी 2005 में उन्होंने संसद भंग कर दी और सारे कार्यकारी अधिकारी अपने हाथ में ले लिए. जिसके ख़िलाफ़ नेपाल में राजनीतिक आंदोलन शुरू हो गया. आंदोलन को कुचलने की उनकी कोशिश से देश में हिंसा फैली और पिछले साल अप्रैल में उन्हें संसद बहाल करना पड़ा.

उसके बाद से ही उनके अधिकार कम किए जाने लगे. सेना पर से भी उनका नियंत्रण ख़त्म हो गया और अब राजशाही भी छिनने जा रही है.

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