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ख़तरे में है नेपाल में लोकतंत्र | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बार-बार चुनाव टलने से नेपाल में राजनीतिक माहौल बदतर होते जा रहे हैं. राजशाही इसका कितना फ़ायदा उठा पाएगी, कहना मुश्किल है. पार्टियों के लिए लोगों के बीच साख बचाए रखना की चुनौती है. नेपाल के भविष्य का खाका खींचने के लिए चुनी जाने वाली संविधान सभा का चुनाव तीसरी बार टल जाने से राजनीतिक संकट और गहराने के आसार हैं. देश के हालात पर नज़र रख रहे विश्लेषकों को इस बात पर संदेह है कि चुनाव हो भी पाएंगे. इनका मानना है कि चुनाव के ताज़ा स्थगन का फ़ायदा सिर्फ़ राजा को मिलेगा. ताज्जुब की बात तो यह है कि ऐसा तब हो रहा है जब सभी प्रमुख पार्टियां राजतंत्र को ख़त्म करना चाहती हैं. इस बार चुनाव टलने के लिए माओवादी विद्रोहियों को ज़िम्मेदार ठहराया जा रहा है. माओवादियों ने दो नई मांगें रखी हैं. माओवादी चाहते हैं कि राजशाही तुरंत ख़त्म हो और यह काम मौजूदा अंतरिम संसद ही कर दे. उनकी दूसरी मांग संविधान सभा का चुनाव पूरी तरह से आनुपातिक चुनाव प्रणाली के आधार पर कराने की है. राजा ज्ञानेंद्र के ख़िलाफ़ मोर्चा बनाने बनाने वाली सात पार्टियों के साथ हुए समझौते से माओवादियों की यह मांग अलग है. चुनाव के स्थगन को माओवादियों की व्यापक रणनीति की रोशनी में देखा जाना चाहिए. बदलती रणनीति गुरिल्ला लड़ाई के दिनों में उनकी मूल रणनीति यही रही कि राजधानी काठमांडू और उसके आसपास दस्तक देने से पहले देश के दूसरे हिस्सों ख़ासकर गांवों में प्रभाव बढ़ाया जाए.
एक दशक तक चले इस संघर्ष की वजह से उनका ज़्यादातर प्रभाव नेपाल के ग्रामीण इलाकों पर है. माओवादियों को जब यह महसूस हुआ कि हिंसा या उनके शक्ति प्रदर्शन का काठमांडू पर कोई खास असर नहीं होता तो उन्होंने रणनीति बदल ली. 2004 के अंत में अपने लक्ष्य को पाने के लिए उन्होंने मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियों के साथ काम करने का फ़ैसला किया. फ़रवरी, 2005 में लोकतांत्रिक सरकार को बर्खास्त करके सत्ता हथियाने वाले राजा ज्ञानेंद्र के कदम से माओवादियों की इस रणनीति को बढ़ावा मिला. राजा के कदम से उग्र मुख्यधारा के राजनीतिक दलों ने इस बार माओवादियों के साथ हाथ मिला लिया. इससे पहले के दौर में ये पार्टियां माओवादियों के साथ किसी भी तरह के सहयोग से इनकार कर चुकी थीं. मुख्यधारा की सात पार्टियों के साथ माओवादी अप्रैल, 2006 में राजा के ख़िलाफ़ देश भर में सड़कों पर उतर आए. श्रृंखलाबद्ध और एकजुट विरोध ने राजा को बाध्य कर दिया कि वे सत्ता वापस लोगों को सौंप दें. बाद के दिनों में माओवादी अंतरिम संसद और सरकार के हिस्सा भी बने. उन्होंने काठमांडू में व्यापार, मीडिया और आम जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में अपनी मौजूदगी बढ़ाई. काठमांडू में खुद को स्थापित करने के बाद अब उनका सिर्फ एक लक्ष्य बचा रह गया है. वह लक्ष्य है सत्ता पर कब्ज़ा करना. राह नहीं आसान ज़्यादातर विश्लेषकों को संदेह है कि चुनावी मुकाबले के रास्ते माओवादी इस लक्ष्य को पाने में सफ़ल होंगे. गांवों में इन लोगों ने अपना प्रभाव खो दिया है और शहरों में ये लोकप्रिय नहीं हैं.
ऐसा लगता है कि इन्हीं कारणों से माओवादी नवंबर में चुनाव नहीं चाहते थे. अब वे राजतंत्र के तत्काल ख़ात्मे और आनुपातिक चुनाव प्रणाली की अपनी मांग पर राजी होने के लिए दूसरे दलों पर दबाव बढ़ाएंगे. अब नेपाली लोग इस बात पर चर्चा करने लगे हैं कि देश सेना या सेना समर्थित धुर दक्षिणपंथियों के हाथों में चला जाएगा या फिर धुर वामपंथी माओवादियों के. लोग सेना और माओवादियों के बीच रक्तपात की आशंका से भी इनकार नहीं कर रहे हैं. राजधानी में माओवादी कार्यकर्ता बड़ी संख्या में जुटे हुए हैं. आने वाले दिन नेपाल की कमज़ोर पड़ रही शांति प्रक्रिया के लिए और भी नाजुक और चुनौतीपूर्ण होंगे. गुरुवार को बुलाए गए संसद के विशेष सत्र में भी ऐसे ही सवाल हावी रहेंगे. यह बैठक मौजूदा संकट को दूर करने के उपाय तलाशने के लिए बुलाई गई है. समझा जाता है कि सेना ने मौजूदा संसद के ज़रिए नेपाल को गणतंत्र घोषित करने के विचार पर अपना विरोध जता दिया है. जानकारों का कहना है कि सेना राजशाही को लेकर प्रधानमंत्री गिरिजा प्रसाद कोईराला की नेपाली कांग्रेस पार्टी के फ़ैसले से भी नाखुश है. नेपाली कांग्रेस ने हाल में तय किया है कि संविधान सभा में वह राजतंत्र के ख़ात्मे के पक्ष में वोट करेगी. समझौते के संकेत माओवादी अब इस बात के संकेत दे रहे हैं कि राजतंत्र के ख़ात्मे की समयसीमा पर वे समझौता के लिए तैयार हैं लेकिन ऐसा लगता है कि आनुपातिक प्रतिनिधित्व के मुद्दे पर वे कोई समझौता नहीं करेंगे.
चर्चा के लिए दूसरे विकल्प भी सामने आए हैं. फ़ैसला जो भी हो लेकिन नतीज़ों के लिहाज़ से संविधान और चुनाव क़ानूनों में ख़ासे संशोधन की ज़रूरत हो सकती है. इस पूरी गड़बड़ी का फ़ायदा राजा ज्ञानेंद्र को मिल रहा है. अप्रैल, 2006 में जब राजा ने सत्ता छोड़ी थी तब वे पूरी तरह अलोकप्रिय हो चुके थे. लेकिन राजनीतिक दलों और माओवादियों के बीच सामंजस्य की कमी और गड़बड़ी के कारण उनकी प्रतिष्ठा में धीरे-धीरे इजाफ़ा हो रहा है. कुछ नेताओं का तो यहां तक कहना है कि नेपाल में लोकतंत्र गंभीर ख़तरे में है. इनका कहना है कि एक व्यापक गठबंधन बनाना चाहिए और उसमें राजतंत्र समर्थकों को भी शामिल करना चाहिए. इनका तर्क है कि इससे देश को तानाशाही के चंगुल में जाने से बचाया जा सकेगा. ज़्यादातर लोगों का मानना है कि काठमांडू में सेना और माओवादियों के बीच निर्णायक शक्ति प्रदर्शन का ख़तरा बढ़ गया है. अगर ऐसी स्थिति पैदा होती है तो कोई नहीं जानता कि कौन किस पर भारी पड़ेगा. | इससे जुड़ी ख़बरें नेपाल में गहराता राजनीतिक संकट29 सितंबर, 2007 | भारत और पड़ोस दक्षिण नेपाल में हिंसा, 20 मरे20 सितंबर, 2007 | भारत और पड़ोस नेपाल:माओवादियों को मनाने की कोशिश19 सितंबर, 2007 | भारत और पड़ोस नेपाल में माओवादी सरकार से अलग हुए18 सितंबर, 2007 | भारत और पड़ोस 'राजशाही ख़त्म नहीं, तो चुनाव में बाधा'18 सितंबर, 2007 | भारत और पड़ोस 'पाँच और महलों का राष्ट्रीयकरण हो'26 अगस्त, 2007 | भारत और पड़ोस नेपाल राजा के सात महलों का राष्ट्रीयकरण23 अगस्त, 2007 | भारत और पड़ोस इंटरनेट लिंक्स बीबीसी बाहरी वेबसाइट की विषय सामग्री के लिए ज़िम्मेदार नहीं है. | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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