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मंगलवार, 06 नवंबर, 2007 को 16:37 GMT तक के समाचार
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जब मेज़ के नीचे ग्रामर काँपा

मुशर्रफ़
'मुशर्रफ़ उस जाल में फंस गए हैं जिसमें हर बूढ़ा डिक्टेटर फंस जाता है'
सनीचर को अपनी ज़िदगी के तीसरे 'फ़ौजी कू' की कवरेज के लिए दफ़्तर आ रहा था तो रास्ते में एक अंग्रेज़ पत्रकार ने पूछा कि क़ौम को संबोधित करने में इतनी देर क्यों हो रही है?

मैनें कहा - 'शरीफ़ुद्दीन पीरज़ादा बूढ़े हो गए हैं...आहिस्ता, आहिस्ता लिख रहे होंगे.'

दफ़्तर पहुँचा तो संबोधन शुरु हो चुका था और पहला जुमला सुनते ही मुझे पता चल गया कि जनरल मुशर्रफ़ उस जाल में फंस गए हैं जिसमें हर बूढ़ा डिक्टेटर फंस जाता है - 'तुम सब की ऐसी की तैसी... मैं तो अपनी तक़रीर ख़ुद लिखूँगा.'

ग्रामर छिपी काँप रही थी

अगले 40 मिनट तक मैंने तक़रीर सुनी और मेरी परेशानी बढ़ती गई. इस वजह से नहीं कि वो क्या कह रहे थे, बल्कि उस ज़बान यानी भाषा की वजह से जो वो इस्तेमाल कर रहे थे. उनकी पूरी उर्दू तक़रीर में शायद एक भी जुमला दुरुस्त और मुकम्मल नहीं था. फ़ाइल के लिए वो हाथ से हवा में दायरे बना रहे थे. ग्रामर उनकी मेज़ के नीचे छिपा हुआ काँप रहा था.

मुझे भाषाविद होने का कोई दावा नहीं, लेकिन जब मुशर्रफ़ ने कहा कि दहशतगर्द बहुत इन्तहापसंद हो गए हैं तो मेरे बाक़ायदा रोंगटे खड़े हो गए.

 मैं ये सोच भी नहीं सकता कि दुनिया की सबसे बड़ी इस्लामी फ़ौज का सरबराह टीवी पर आकर ऐसी हरकत कर सकता है. हक़ीकत इससे भी ख़तरनाक थी. जनरल मुशर्रफ़ किसी 'आउट ऑफ़ द बॉडी' अनुभव से गुज़र रहे थे
मोहम्मद हनीफ़

मुझे लगा कि जनरल मुशर्रफ़ उस अंकल की तरह बात कर रहे हैं जिन से कभी-कभी आपकी पारिवारिक मेल-मिलाप के मौक़ों पर मुलाक़ात रही होगी. जब सब मेहमान सो जाते हैं लेकिन व्हिस्की की बोतल में थोड़ी बची होती है...अंकल ज़ोर देते हैं कि 'एक और पेग बनाओ तो सारी दुनिया के मसले अभी हल करता हूँ...और तुम्हारी आंटी की ऐसी की तैसी, मैं किसी से नहीं डरता...तुम मेरे बेटों की तरह हो...पानी ज़रा कम डालो.'

'आउट ऑफ़ द बॉडी' अनुभव

ज़ाहिर है मैं ये सोच भी नहीं सकता कि दुनिया की सबसे बड़ी इस्लामी फ़ौज का सरबराह टीवी पर आकर ऐसी हरकत कर सकता है. हक़ीकत इससे भी ख़तरनाक थी. जनरल मुशर्रफ़ किसी 'आउट ऑफ़ द बॉडी' अनुभव से गुज़र रहे थे.

शेरवानी पहनकर वो एक ऐसी तक़रीर कर रहे थे जो वर्दी वाले जनरल मुशर्रफ़ पर इलज़ामात लगा रहे थे.

ये हैं कुछ बातें जो उन्होंने अपने संबोधन में कहीं...जी हाँ, उन्होंने कहा -

"एक्सट्रीमिस्ट बहुत एक्सट्रीम हो गए हैं...
हमसे अब कोई डरता ही नहीं...
हुकूमत के अंदर एक और हुकूमत चल रही है...
हर वक़्त बस कोर्ट के चक्कर लगाते फिर रहे हैं...
इस्लामाबाद में एक्सट्रीमिस्ट भरे पड़े हैं..."

सिर्फ़ एक लम्हे के लिए उनके चेहरे पर नरमी नज़र आई जब उन्होंने अपनी हुकूमत के पहले तीन बरसों का ज़िक्र किया - 'मेरा उस वक़्त मुकम्मल कंट्रोल था.'

अंकल फिर क्या हुआ...मैने सोचा

जनरल मुशर्रफ़ ने इमरजेंसी लगाने का ज़िक्र भी सरसरी तौर पर हाथ हिलाकर किया और कह दिया -'आप लोगों ने टीवी पर देख ही लिया होगा.' ये तक नहीं बताया कि सारे टीवी चैनल तो मैंने बंद कर दिए हैं.

मुझे असल बेइज़्ज़ती का ऐहसास उस वक़्त हुआ जब आख़िर में जनरल मुशर्रफ़ ने पश्चिमी श्रोताओं से अंग्रेज़ी में ख़िताब किया. तक़रीर का ये हिस्सा लिखा हुआ था. किसी ने ग्रामर की ग़लतियाँ भी दुरुस्त कर दी थीं. जुमले शुरु होते थे और ख़त्म भी होते थे.

 'अंकल ठीक है. हम अभी उतने बालिग़ नहीं हुए कि लोकतंत्र या बुनियादी अधिकार माँग सकें लेकिन क्या हम दुरुस्त ग्रामर के भी हक़दार नहीं हैं
मोहम्मद हनीफ़

मैनें सोचा - 'अंकल ठीक है. हम अभी उतने बालिग़ नहीं हुए कि लोकतंत्र या बुनियादी अधिकार माँग सकें लेकिन क्या हम दुरुस्त ग्रामर के भी हक़दार नहीं हैं.'

ये इस लिहाज़ से भी ऐतिहासिक तक़रीर थी कि इसमें किसी की बेटी की शादी की तारीख़ का ज़िक्र भी हुआ - 'जज मेरा फ़ैसला देने की बजाय अपने कोलीग की बेटी की शादी अटेंड करना चाहते हैं.'

सुप्रीम कोर्ट के जज राजा फ़याज़ ने अभी तक अस्थायी संविधान आदेश (पीसीओ) के तहत शपथ नहीं ली है. उनकी बेटी की शादी 12 नवंबर को है. उन्हें हम पेशगी मुबारकबाद देते हैं.

और जनरल मुशर्रफ़ के लिए बस ये दिल करता है बोतल छिपाकर कहा जाए - 'अंकल रात बहुत हो गई. अब सो जाएँ.'

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