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रविवार, 04 नवंबर, 2007 को 15:42 GMT तक के समाचार
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ग़ैरक़ानूनी है इमरजेंसीः राणा भगवान दास
राणा भगवान दास
राणा भगवान दास मुशर्रफ़ को चुनाव लड़ने की अनुमति देने के ख़िलाफ़ थे
पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस और देश के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश रह चुके राणा भगवान दास पाकिस्तान के उन जजों में से हैं जिन्होंने इमरजेंसी को ग़ैर-क़ानूनी क़रार दिया है.

इससे पहले पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट ने जब परवेज़ मुशर्रफ़ को राष्ट्रपति चुनाव लड़ने की अनुमति दी थी तब भी राणा भगवान दास उन तीन जजों में से थे जो इस फ़ैसले से सहमत नहीं थे.

वे उन जजों में से हैं जिन्होंने नई व्यवस्था के तहत शपथ नहीं ली है जिसका सीधा मतलब है कि इमरजेंसी के दौरान वे जज नहीं माने जाएँगे.

पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट के एकमात्र हिंदू जज राणा भगवान दास से शाहज़ेब जिलानी ने इमरजेंसी लगाए जाने के बाद बातचीत की.

पाकिस्तान में इमरजेंसी लगाने के फ़ैसले पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है?

हमने तो पहले ही इसे सरासर ग़लत और ग़ैर क़ानूनी करार दिया था. हमारे सात जजों के बेंच ने शनिवार को ही ये कह दिया था कि अगर प्रोविज़नल कॉन्स्टीट्यूशनल ऑर्डर (पीसीओ) के तहत इमरजेंसी लगाई जाती है तो ग़लत होगा. हमने अपने फ़ैसले की कॉपी भी मीडिया को दे दी थी, उसके बाद हम घर आ गए. फिर जो हुआ वह हमने टीवी पर देखा.

क्या सरकार ने आपको बताया है कि आपकी छुट्टी हो गई है?

जी नहीं, सरकार से कोई संपर्क नहीं हुआ है.

आपके घर पर सरकारी सुरक्षा मौजूद है या हटा ली गई है?

वे अब भी मौजूद हैं.

जहाँ तक आपको मालूम है, आप अभी तक सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस हैं?

क़ानूनी और संवैधानिक तौर पर तो मेरा यही मानना है.

आपको तो पता है कि देश में संविधान मुअत्तल है, पीसीओ के तहत देश चल रहा है. ऐसे में आप क्या कर सकते हैं?

ये तो आने वाला वक़्त बताएगा.

आपकी इस मामले पर चीफ़ जस्टिस चौधरी से कोई मुलाक़ात या बात हुई है?

हाँ, बस ख़ैर-ख़बर तक बात हुई है, फिलहाल सारे जज अपने-अपने घर पर हैं.

क्या आपको अंदाज़ा था कि ऐसा कोई क़दम उठाया जा सकता है, इस तरह अचानक?

नहीं, मुझे इसका अंदाज़ा नहीं था, हमें नहीं लग रहा था कि इतनी जल्दी और इस तरह से यह ऑर्डर होगा.

राणा भगवान दास
राणा भगवान दास पाकिस्तान के इतिहास में सुप्रीम कोर्ट में पहले हिंदू जज हुए हैं

मुशर्रफ़ ने इमरजेंसी लगाने के जो कारण बताए हैं उनमें से एक यह भी था कि न्यायपालिका अपनी हद से बाहर जाकर काम कर रही थी.

नहीं, यह बिल्कुल ग़लत है, अदालतें अपने संवैधानिक दायरे के भीतर ही काम कर रही थीं.

वो ये भी कह रहे हैं कि अदालत ने अपनी तरफ़ से 100 से ज्यादा मामलों में कार्रवाई की, इस तरह सरकार कैसे चल सकती थी?

ये तो जनता बता सकती है कि फ़ैसले सही थे या ग़लत. जज के तो निर्णय ही बताते हैं कि वह सही था या ग़लत. जज ख़ुद नहीं बोलता, उसके ऑर्डर और जजमेंट बोलते हैं.

लेकिन आपके ही कई साथी जजों ने सरकार का साथ दिया और नए पीसीओ के तहत शपथ भी ले ली है, उनके बारे में क्या कहेंगे?

सबका अपना-अपना ख़याल है, अपने अपने विचार हैं और अपना अपना ज़मीर है, इस बारे में मुझे कुछ नहीं कहना है.

कल आप क्या करेंगे?

कल हम चाहेंगे कि अदालत जाएँ.

अगर आपको अदालत जाने से रोका गया तो?

हम वापस आ जाएँगे, जज सड़क पर प्रदर्शन तो नहीं कर सकते.

तो क्या आप ख़ामोश होकर बैठ जाएँगे.

ये तो आने वाला वक़्त बताएगा.

आपके इतने लंबे करियर का इस तरह अंत, आपका निजी अनुभव कैसा रहा है?

मैंने अपनी क़ानूनी और संवैधानिक भूमिका बखूबी निभाई है, मुझे कोई अफ़सोस नहीं है, कोई शर्मिंदगी नहीं है, जो लोग क़ानून और संविधान का सम्मान नहीं करते वे मौजूदा सूरतेहाल के लिए ज़िम्मेदार हैं.

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