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हाशिमपुरा मामले में 'सूचना' पर सवाल | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
सूचनाधिकार क़ानून का इस्तेमाल करके अगर आप किसी अहम मामले की जानकारी चाहते हैं तो सावधान हो जाइए, क्योंकि संभव है कि जो जानकारी आपको मिले वो अधूरी या ऐसी हो कि न आप पढ़ सकें और न जान सकें. मेरठ में 20 साल पहले के चर्चित हाशिमपुरा हत्याकांड के संबंध में उत्तर प्रदेश पुलिस की ओर से पीड़ित परिवारों को मिली जानकारी देखकर तो कम से कम ऐसा ही लगता है. ग़ौरतलब है कि मई 1987 में उत्तर प्रदेश के मेरठ ज़िले में सांप्रदायिक दंगे भड़कने के बाद 22 मई को शहर के हाशिमपुरा मोहल्ले के 600 से ज़्यादा मुसलमानों को उत्तर प्रदेश पीएसी के जवानों ने हिरासत में लिया था लेकिन इनमें से 42 लोग वापस नहीं लौटे थे. उत्तर प्रदेश पीएसी पर आरोप है कि उसके कुछ जवानों ने इन लोगों की हत्या कर दी थी. पीड़ितों का आरोप है कि किसी भी पीएसी जवान या अधिकारी के ख़िलाफ़ अबतक कोई कार्रवाई नहीं की गई है. इस मामले में मुक़दमा शुरू होने में ही 19 बरस लग गए और इस दौरान पीएसी के जिन 19 जवानों को इस मामले में अभियुक्त बनाया गया, उनमें से 16 ही जीवित बताए जा रहे हैं. इस मामले से जु़ड़े सरकारी दस्तावेजों को सार्वजनिक करवाने और फ़ाइलों में दबी बातों को उजागर करने के मक़सद से हाशिमपुरा कांड के कुछ पीड़ितों और मृतकों के परिजनों ने 24 मई 2007 को राज्य सरकार के पास सूचनाधिकार क़ानून के अंतर्गत जानकारी मुहैया कराने के लिए आवेदन किया था. इसके जवाब में उत्तर प्रदेश पुलिस के सीबीसीआईडी विभाग की ओर से जो जानकारी पीड़ित लोगों की मिली है उसमें लगभग 19 पन्ने ऐसे हैं जिनमें या तो कुछ भी नहीं लिखा है और या फिर इतनी ख़राब प्रतियाँ मिली हैं कि शायद ही कोई उन्हें पढ़ सके. और तो और, इस घटना के वर्ष से संबंधित कई कागज़ात जानकारी में शामिल ही नहीं किए गए हैं और कई महत्वपूर्ण दस्तावेज़ लोगों को दिए ही नहीं गए हैं. जानकारी का अधिकार मई 2007 में पीड़ित परिवारों के सदस्यों ने उत्तर प्रदेश पुलिस और गृह विभाग से सूचनाधिकार क़ानून के तहत आवेदन करके इस कांड से संबंधित सभी दस्तावेज़ मुहैया कराए जाने की माँग की थी.
पीड़ितों और मृतकों के परिजनों की ओर से राज्य सरकार के पास 615 आवेदन जमा किए थे जिनमें पुलिस महकमे से कई अहम सवाल पूछे गए थे. मसलन, इस हत्याकांड में शामिल पीएसी जवानों के ख़िलाफ़ अभी तक महकमे ने क्या कार्रवाई की है, कार्रवाइयों के लिए कौन से अधिकारी ज़िम्मेदार थे और ऐसा न करने पर उनके ख़िलाफ़ क्या क़दम उठाए जाने चाहिए. यह भी पूछा गया है कि इस घटना की सीबी-सीआईडी रिपोर्ट को अभी तक सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया है. आवेदकों ने इस रिपोर्ट की प्रति भी मांगी है पर पुलिस विभाग की ओर से अभी तक सीबीसीआईडी की जाँच रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं किया गया है. हालांकि जानकारी देने के लिए क़ानून के अंतर्गत जो समयसीमा तय की गई है, वह गुज़र चुकी है. विभागीय दलील जो जानकारी मिली है उसमें कुछ पन्ने अधूरे, कुछ लगभग सादे और कुछ ऐसे हैं जिन्हें जानकारी में शामिल ही नहीं किया गया है. जब बीबीसी ने इस बारे में उत्तर प्रदेश पुलिस के सीबीसीआईडी विभाग के महानिदेशक हर अमोल सिंह से पूछा कि इस तरह अधूरी जानकारी क्यों दी गई है तो उनका कहना था कि अगर जानकारी मांगने वाले उनके संज्ञान में यह बात लाते हैं तो उसे सुधारने की कोशिश की जाएगी.
पर विभाग बिना यह देखे-जाने कि लोगों को क्या और कितनी जानकारी दी जा रही है, कोई भी जानकारी विभागीय मोहर लगाकर कैसे दे सकता है? यह पूछने पर उन्होंने कहा, “आप अपने दायरे में रहकर जानकारी मांगें और सवाल करें. आप यह सवाल नहीं पूछ सकते. हाँ मैं मानता हूँ कि ग़लती हो गई होगी पर इसके लिए अपील करें तो आगे देखूँगा कि क्या किया जा सकता है.” यह पूछने पर कि सीबीसीआईडी की रिपोर्ट सहित कई ऐसी जानकारियाँ हैं जो लोगों ने मांगी थीं लेकिन उन्हें नहीं मिली हैं, सीबी-सीआईडी के महानिदेशक हर अमोल सिंह का कहना कि इसके लिए अपील कीजिए फिर विभाग उस पर विचार करेगा. इस पूरे मामले में पीड़ितों की पैरवी कर रही वकील वृंदा ग्रोवर ने प्रशासन के इस रवैये को ग़ैरज़िम्मेदाराना और हास्यास्पद बताते हुए कहा कि इस बारे में राज्य सूचना आयुक्त के पास अपील दायर कर दी गई है ताकि पूरी और सही जानकारी लोगों तक पहुँचे. ‘जुर्म’ की सज़ा जिन पुलिसकर्मियों पर इस हत्याकांड में शामिल होने का आरोप है और जिन्हें इस मामले में अभियुक्त बनाया गया है उनके वार्षिक पुलिस प्रगति रजिस्टर की 1987 की प्रतियाँ देखने से पता चलता है कि विभाग किस 'ईमानदारी' से कार्रवाई कर रहा है. मसलन, अधिकतर के लिए लिखा गया है - “काम और आचरण अच्छा है. सत्यनिष्ठा प्रमाणित है. श्रेणी-अच्छा, उत्तम.” एक अन्य पुलिसकर्मी के लिए लिखा गया है - “स्वस्थ व स्मार्ट जवान है. वाहिनी फ़ुटबॉल टीम का सदस्य है. वर्ष में दो नक़द पुरस्कार व दो जीई पाया है. काम और आचरण अच्छा है. सत्यनिष्ठा प्रमाणित है. श्रेणी- अच्छा.” पृष्ठभूमि इस हत्याकांड के बाद सीआईडी की क्राइम ब्रांच ने 1988 में जाँच का काम शुरू किया था. इसकी रिपोर्ट आने में छह साल लग गए. मई 1996 में ग़ाज़ियाबाद न्यायिक मजिस्ट्रेट के पास 19 पीएसी जवानों के ख़िलाफ़ चार्जशीट दायर हुई पर वर्ष 2000 तक कोई भी अभियुक्त मजिस्ट्रेट के सामने पेश नहीं हुआ. वर्ष 2000 में सुप्रीम कोर्ट की मध्यस्थता के बाद ग़ाज़ियाबाद से यह मामला दिल्ली की तीस हज़ारी अदालत में लाया गया जहाँ फ़िलहाल इस मामले की सुनवाई चल रही है. अदालत ने वर्ष 2006 में इन अभियुक्तों के ख़िलाफ़ आरोप तय किए और भारतीय दंड संहिता की धाराओं 302 (हत्या), 120बी (अपहरण), 307 (हत्या का प्रयास), सहित 201, 149, 364, 147 और 148 के तहत मामला दर्ज हुआ. | इससे जुड़ी ख़बरें ..ताकि बेपर्दा हो 20 बरस पहले का सच24 मई, 2007 | भारत और पड़ोस सूचना क्रांति से बदल जाएगी ज़िदगी03 फ़रवरी, 2007 | भारत और पड़ोस 'सरकार सूचना अधिकार को कमज़ोर कर रही है'06 अगस्त, 2006 | भारत और पड़ोस 'सूचना के अधिकार की लड़ाई जारी रहेगी'01 अगस्त, 2006 | भारत और पड़ोस अरविंद केजरीवाल को रैमन मैग्सेसे अवार्ड01 अगस्त, 2006 | भारत और पड़ोस सूचना के अधिकार क़ानून में संशोधन20 जुलाई, 2006 | भारत और पड़ोस सूचना के अधिकार के लिए अभियान01 जुलाई, 2006 | भारत और पड़ोस बहुत महंगी पड़ रही है सूचना19 मार्च, 2006 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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