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गुरुवार, 24 मई, 2007 को 14:33 GMT तक के समाचार
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..ताकि बेपर्दा हो 20 बरस पहले का सच

मोहम्मद उस्मान
मोहम्मद उस्मान इस हत्याकांड में ज़िंदा बचे लोगों में हैं
"बीस बरस पहले कुछ पुलिसवालों ने आकर कहा कि आपका बेटा अभी कुछ बातचीत के लिए हमारे साथ जा रहा है और जल्द ही लौट आएगा... और हंसता-बोलता गया बेटा लौटकर नहीं आया. हम इंसाफ़ के लिए भटक रहे हैं पर..."

...कहते-कहते हाजरा की आँखें भर आती हैं, गला बंध जाता है और 20 बरस पहले का ख़ौफ़नाक मंज़र फिर से ज़हन में कौंध उठता है.

मई 1987 में उत्तर प्रदेश के मेरठ ज़िले में सांप्रदायिक दंगे भड़कने के बाद 22 मई को ज़िले के हाशिमपुरा मोहल्ले के 600 से ज़्यादा मुसलमानों को उत्तर प्रदेश पीएसी के जवानों ने हिरासत में लिया था लेकिन इनमें से 42 लोग वापस नहीं लौटे. पीएसी पर आरोप है कि उन्होंने इन लोगों की हत्या कर दी.

पुलिस हिरासत में मौत के इस मामले पर ये लोग तब न्याय की गुहार लगा रहे हैं जब गुजरात में फ़र्ज़ी मुठभेड़ के मामले ने ऐसी घटनाओं पर देशभर में बहस छेड़ दी है.

 हमें गंगा नहर के पास ले जाकर एक-एक कर गाड़ी से उतारा गया और गोली मारी गई. गोली मेरे पेट में लगी और आर-पार हो गई. उन्होंने मरा समझकर नहर में फेंक दिया पर मैं ज़िंदा था. अगले कुछ घंटे वहीं अंधेरे में और फिर 15 घंटे एक पेशाबघर में रहा. फिर किसी ने मदद की और दवा-इलाज करवाया
ज़ुल्फ़िकार नासिर, एक पीड़ित

इस हत्याकांड में पुलिस की गोली के शिकार हुए ज़ुल्फ़िकार नासिर बताते हैं, "हमें गंगा नहर के पास ले जाकर एक-एक कर गाड़ी से उतारा गया और गोली मारी गई. गोली मेरे पेट में लगी और आर-पार हो गई. उन्होंने मरा समझकर नहर में फेंक दिया पर मैं ज़िंदा था. अगले कुछ घंटे वहीं अंधेरे में और फिर 15 घंटे एक पेशाबघर में रहा. फिर किसी ने मदद की और दवा-इलाज करवाया."

उस्मान के दर्द की दास्तान भी कुछ ऐसी ही है.

स्पष्ट है कि बीस बरस बाद भी पीड़ितों को न्याय नहीं मिला है. इनका आरोप है कि किसी भी पीएसी जवान या अधिकारी के ख़िलाफ़ अबतक कोई कार्रवाई नहीं की गई है.

इंसाफ़ की डगर पर..

इस हत्याकांड के बाद सीआईडी की क्राइम ब्रांच ने 1988 में जाँच का काम शुरू किया था. इसकी रिपोर्ट आने में छह साल लग गए.

मई 1996 में ग़ाज़ियाबाद न्यायिक मजिस्ट्रेट के पास 19 पीएसी जवानों के ख़िलाफ़ चार्जशीट दायर हुई पर वर्ष 2000 तक कोई भी अभियुक्त मजिस्ट्रेट के सामने पेश नहीं हुआ.

चोट
बीस बरस पहले की शारीरिक चोट तो भर गई पर इंसाफ़ न मिलना आज भी दर्द देता है

वर्ष 2000 में सुप्रीम कोर्ट की मध्यस्थता के बाद ग़ाज़ियाबाद से यह मामला दिल्ली की तीस हज़ारी अदालत में लाया गया जहाँ फ़िलहाल इस मामले की सुनवाई चल रही है.

पिछले वर्ष अदालत ने इन अभियुक्तों के ख़िलाफ़ आरोप तय किए और भारतीय दंड संहिता की धाराओं 302 (हत्या), 120बी (अगवा करना), 307 (हत्या का प्रयास), सहित 201, 149, 364, 147 और 148 के तहत मामला दर्ज हुआ.

प्रशासनिक उदासीनता की स्थिति यह है कि इस मामले में मुक़दमा शुरू होने में ही 19 बरस लग गए और इस दौरान जिन 19 पीएसी जवानों को इस मामले में अभियुक्त बनाया गया, उनमें से 16 ही जीवित बताए जा रहे हैं.

कार्रवाई

मेरठ के इस कांड के पीड़ित और उनके परिजनों की मदद कर रहीं जानी-मानी वकील वृंदा ग्रोवर ने बीबीसी को बताया, "जिन धाराओं के तहत आरोप तय हुआ है, उसके बाद अभियुक्तों को तुरंत नौकरी से बर्ख़ास्त किया जाना चाहिए था पर वे तो नौकरी पर क़ायम हैं. न्यायिक प्रक्रिया जिस रफ़्तार से चल रही है, उसे देखते हुए कह पाना मुश्किल है कि पीड़ितों को कब इंसाफ़ मिल पाएगा."

 जिन धाराओं के तहत आरोप तय हुआ है, उसके बाद अभियुक्तों को तुरंत नौकरी से बर्ख़ास्त किया जाना चाहिए था पर वे तो नौकरी पर क़ायम हैं. न्यायिक प्रक्रिया जिस रफ़्तार से चल रही है, उसे देखते हुए कह पाना मुश्किल है कि पीड़ितों को कब इंसाफ़ मिल पाएगा
वृंदा ग्रोवर, वकील

बीबीसी ने इन 16 अभियुक्तों के ख़िलाफ़ हुई कार्रवाई और उनकी आज की स्थिति जानने के लिए राज्य सरकार के कई आला-अधिकारियों से बात करने की कोशिश की पर वरिष्ठ अधिकारियों ने इस बारे में कुछ भी जानने-कहने से इनकार कर दिया.

राज्य पुलिस के अतिरिक्त महानिदेशक (क़ानून) बृजलाल और अतिरिक्त महानिदेशक (अन्वेषण) ओपीएस मलिक के पास इस बाबत कोई जानकारी नहीं थी.

कई बार संपर्क करने के बाद भी अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (पीएसी) डीपीएस सिद्धू बीबीसी को यह नहीं बता पाए कि विभाग की ओर से इन जवानों के ख़िलाफ़ क्या कोई कार्रवाई हुई थी या नहीं और अगर हुई भी है तो कब और क्या.

उन्होंने बताया कि 19 में से तीन जवानों की मौत हो गई है. एक रिटायर हो गए हैं. एक ने इस्तीफ़ा दे दिया है. छह उत्तर प्रदेश पुलिस और एक उत्तराखंड पुलिस में शामिल हो गए. सात के बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं है और इसका पता बटालियनों से ही लग पाएगा.

जवाबदेही के लिए

इस हत्याकांड में ज़िंदा बचे लोगों और मारे गए लोगों के परिजनों ने अब प्रशासनिक जवाबदेही के लिए सूचना के अधिकार क़ानून को अपनी लड़ाई का ज़रिया बनाया है.

परिजन
पीड़ितों के परिजन इस मामले में प्रशासन की पारदर्शिता और जवाबदेही तय करना चाहते हैं

गुरुवार को इन लोगों की तरफ़ से लखनऊ स्थित राज्य के पुलिस प्रमुख कार्यालय और राज्य सरकार के पास सूचना का अधिकार क़ानून के अंतर्गत 615 आवेदन जमा किए हैं जिनमें पुलिस महकमे से कई अहम सवाल पूछे गए हैं.

मसलन, इस हत्याकांड में शामिल पीएसी जवानों के ख़िलाफ़ अभी तक महकमे ने क्या कार्रवाई की है. कार्रवाइयों के लिए कौन से अधिकारी ज़िम्मेदार थे और ऐसा न करने पर उनके ख़िलाफ़ क्या क़दम उठाए जाने चाहिए.

यह भी पूछा गया है कि इस घटना की सीबी-सीआईडी रिपोर्ट को अभी तक सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया है. आवेदकों ने इस रिपोर्ट की प्रति भी मांगी है.

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