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तीन बरस से न्याय की आस में हैं, पर..... | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
गोधरा में तीन साल पहले हुए दंगों में सैकड़ों लोगों की मौत हो गई लेकिन अभी तक दंगाईयों में से न तो किसी को सज़ा हुई और न ही लोगों को पर्याप्त हर्ज़ाना मिला है. न्याय की आस में अपनी फ़रियाद लेकर अब दंगा पीड़ित दिल्ली पहुंचे हैं जहां उन्होंने आम जनता के सामने अपनी बात रखने की कोशिश की. “आप लोग बड़े-बड़े लोग हो, आप लोग तो कुछ कर सकते हो, हमें न्याय चाहिए. कुछ नहीं तो अगर पाँच दंगाइयों को भी सज़ा हो गई तो हमें और हमारे मारे गए रिश्तेदारों को बड़ी राहत मिलेगी. एक हौसला मिलेगा कि चलो कहीं तो न्याय की आस बाकी है.” ये कहना है गुजरात के उन तमाम दंगापीड़ितों का जो आज भारत की राजधानी दिल्ली में इकट्ठा हुए. दंगापीड़ितों की दर्दनाक कहानी पर लोग भी सिसकियाँ भर रहे थे. शाहआलम रसूलाबाद से आए, 21 वर्षीय फ़ारूक के शरीर के तमाम हिस्सों पर गोलियों के निशान थे. वो बताता है कि ये गोलियाँ उसे दंगों के दौरान सेना के जवानों ने मारी थीं. आँखों में आँसू और आवाज़ में न्याय की फ़रियाद लिए इन लोगों ने तीन साल पहले गुजरात में हुए दंगों की यादें लोगों को सुनाईं और अपनी कष्टप्रद हालत के लिए एक बार फिर से गुजरात सरकार को दोषी ठहराया. सहमत नाम के एक संगठन की ओर से आयोजित इस कार्यक्रम का आयोजन तो किया गया था मीडिया और केंद्र सरकार के तमाम घटक दलों को गुजरात के दंगापीड़ितों के सवालों से अवगत कराने के लिए पर राजनीतिक कम ही जुटे. हालांकि काँग्रेस प्रवक्ता आनंद शर्मा इस कार्यक्रम में आए पर लोगों से बात करते हुए उन्होंने कहा कि वो पार्टी की ओर से नहीं, अपनी भावनाओं के चलते कार्यक्रम में पहुँचे हैं. साथ की आस इन दंगापीड़ितों के समर्थन में माकपा पोलित ब्यूरो के सदस्य सीताराम येचुरी, वृंदा कारत, फ़िल्म अभिनेता राहुल बोस, वरिष्ठ अधिवक्ता शांतिभूषण, सुभाषिनी अली जैसे कई नामचीन मौजूद थे. हालांकि भारतीय मीडिया रविवार को खेले जाने वाले मैच को लेकर व्यस्त था और दंगापीड़ितों के लिए संचार माध्यमों पर जगह कम ही रही. कार्यक्रम में तीस्ता सीतलवाड़ के साथ इन तमाम दंगापीड़ितों ने मीडिया और अन्य लोगों, संगठनो से बात की और दंगों से संबंधित तमाम मामलों की जाँच सीबीआई को सौपने की माँग दोहराई. गुजरात दंगे से संबंधित मामलों को न्यायालय तक पहुँचाने और बेस्ट बेकरी मामले को लेकर चर्चा में रहीं तीस्ता सीतलवाड़ ने बताया, “पिछले एक साल में जिस तरह से सर्वोच्च नयायालय ने गुजरात के दंगापीड़ितों के मामले वापस किए हैं, ऐसे में देशभर के सामने इस तथ्य को उजागर करना ज़रूरी हो गया था कि ये लोग इस समय भी किन स्थितियों से गुज़र रहे हैं.” सुनामी के बाद अब गुजरात के दंगापीड़ितों के समर्थन में भी उतरे, चर्चित फ़िल्म अभिनेता राहुल बोस से जब इसकी वजह पूछी तो उन्होंने बताया, “गुजरात के दंगे दुर्भाग्यपूर्ण थे. तीस्ता ने इनका सवाल खड़ा करके एक अहम काम किया मगर पिछले कुछ समय में उनपर तमाम आरोप लगाए गए. मैं इसीलिए उनके समर्थन में सामने आया हूँ.” सवाल उठाएगी माकपा पर दिल्ली में बड़ी तैयारी के साथ सामने लाए गए ये दंगापीड़ित ख़ुद अपनी ज़मीन पर मनोवैज्ञानिक रूप से कितने मजबूत हैं, पूछने पर माकपा नेता सीताराम येचुरी कहते हैं, “राज्य की कानून व्यवस्था में हस्तक्षेप का अधिकार केंद्र को नहीं है और गुजरात सरकार इसी का लाभ उठा रही है.” “आज उनकी जो स्थिति है और जिस तरह की मनोवैज्ञानिक मदद उन्हें मिल रही है, उससे कहीं ज़्यादा मिलनी चाहिए थी और राजनीतिक दलों को इसके लिए प्रयास करने चाहिए.” यह पूछने पर कि क्या राजद नेता लालू प्रसाद यादव की पिछले दिनों गुजरात सरकार को भंग करने की माँग से वो सहमत हैं, सीताराम बताते हैं, “हम ऐसा नहीं चाहते कि केंद्रीय नेतृत्व को ऐसा कोई अधिकार हो पर लालू जी की भावनाओं को हम समझते हैं. अब तो तमाम पुलिस अधिकारी भी ख़ुद कह रहे हैं कि उनको मुख्यमंत्री के सीधे निर्देश थे.” हालांकि मकसद पीड़ितों की बात को लोगों तक पहुँचाना था पर मैच के धमाल में यह आयोजन ख़बर सुर्ख़ियों में जगह नहीं बना पाया, और आयोजकों को इतका मलाल रहेगा. |
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