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सूचना के अधिकार क़ानून में संशोधन | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत में केंद्र सरकार ने 'सूचना का अधिकार' कानून में संशोधन करने का फ़ैसला किया है. लेकिन संशोधन के तहत फाइलों पर नौकरशाहों की टिप्पणियों को क़ानून के दायरे से बाहर रखा जाएगा. इसका मतलब ये है कि किसी फ़ाइल पर अधिकारियों की नोटिंग या टिप्पणी क्या है, यह जानकारी किसी व्यक्ति को देना बाध्यकारी नहीं होगा. ग़ैर-सरकारी संगठनों का कहना है कि केंद्रीय कैबिनेट के इस फ़ैसले से शासकीय पारदर्शिता कायम करने के अभियान को झटका लगा है. छह महीने पहले ही केंद्र की यूपीए सरकार ने सूचना के अधिकार का क़ानून बनाकर आम जनता को सरकारी सूचनाएँ प्राप्त करने का अधिकार दिया था. उस समय यूपीए सरकार ने कहा था कि ये क़ानून नौकरशाही में पारदर्शिता लाने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगी. सरकारी दलील सरकार का तर्क है कि संवेदनशील सूचनाओं के सार्वजनिक होने के ख़तरे को भाँपते हुए यह संशोधन किया गया है. सूचना और प्रसारण मंत्री प्रियरंजन दास मुंशी ने कहा कि ताज़ा संशोधन अमरीका और ब्रिटेन में लागू कानून के अनुरुप है. उन्होंने स्पष्ट किया कि सामाज और विकास से जुड़े फाइलों की जानकारी अभी भी लोगों को उपलब्ध कराया जाएगा. विरोध उधर सामाजसेवी अरुणा रॉय मानती हैं कि इस संशोधन से क़ानून का मूल मक़सद ही ख़त्म हो गया है. उन्होंने कहा, "जब निर्णय लेने की पद्धति के बारे में ही लोगों को नहीं बताया जाएगा तो ये कानून लेकर हम क्या करेंगे." उनका कहना है कि पहले से ही कानून की धारा आठ में संवेदनशील जानकारियों को देने से रोकने का प्रावधान था फिर संशोधन की क्या जरूरत थी. अरुणा रॉय खुद वरिष्ठ अधिकारी रह चुकी हैं. उन्होंने अपने पद से इस्तीफा देकर राजस्थान में प्रशासनिक भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करने में अहम भूमिका निभाई थी. | इससे जुड़ी ख़बरें अरुणा का सलाहकार परिषद से इस्तीफ़ा21 जून, 2006 | भारत और पड़ोस नौसेना दस्तावेज़ लीक मामले में छापे23 जून, 2006 | भारत और पड़ोस पाँव पसार रहा है भ्रष्टाचार 04 जुलाई, 2006 | भारत और पड़ोस ब्लॉग साइट पर 'रोक', युवाओं में गुस्सा19 जुलाई, 2006 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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