|
'सूचना के अधिकार की लड़ाई जारी रहेगी' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत के अरविंद केजरीवाल को प्रतिष्ठित रैमन मैग्सेसे पुरस्कार देने की घोषणा की गई है. इस पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने कहा कि ये सम्मान उन्हें नहीं बल्कि सूचना के अधिकार को कारगर बनाने में लगे हर व्यक्ति को मिला है. उन्होंने इस बात पर खुशी जताई कि दुनिया भर में सूचना के अधिकार अभियान को सराहा गया है. हलाँकि इस कानून में संशोधन करने के केंद्र सरकार के फ़ैसले से वो आहत हैं. बीबीसी संवाददाता रेणु अगाल के साथ बातचीत में अरविंद केजरीवाल ने कहा कि अगर ये संशोधन हो गया तो कानून पूरी तरह से मर जाएगा. पेश है बातचीत के अंश.. आप एक नौकरशाह रह चुके हैं. सरकार कहती है कि हर चीज़ नहीं बताई जा सकती. इसलिए फ़ाइल नोटिंग इस अधिकार के तहत नहीं लाना चाहती. अगर फ़ाइल नोटिंग इसके दायरे से बाहर रहती है तो क्या इस क़ानून की अहमियत बची रहेगी? अगर फ़ाइल नोटिंग नहीं दिखाई जाएगी तो ‘राइट टू इंफोरमेशन’ का कोई मतलब नहीं रह जाएगा. मैं सरकार में रह चुका हूं. मुझे मालूम है कि फ़ाइल नोटिंग की क्या अहमियत है और केवल मैं ये नहीं बोल रहा हूं . माधव गोडबोले जो पूर्व गृह सचिव रह चुके हैं, उन्होंने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर कहा है कि अगर फ़ाइल नोटिंग को नहीं दिखाया जाए तो इस क़ानून को रखने की कोई ज़रूरत नहीं है. छोटी या बड़ी जो भी सूचना कोई व्यक्ति माँगता है उसका संबंध फ़ाइल नोटिंग से होता है. सरकार की इसके पीछे क्या मंशा है? एक तरफ़ वो जनता को बताना चाहती है कि हमने सूचना का अधिकार दिया है लेकिन कितनी सूचना देंगे इसका अधिकार हम अपने पास रखते हैं? मुझे लगता है ये क़ानून दुनिया का सबसे बढ़िया क़ानून है और जब इतना सशक्त क़ानून आया था तो एक राजनैतिक इच्छाशक्ति थी क्योंकि उस वक्त भी नौकरशाही ने बहुत कोशिश की थी इस क़ानून को कमजोर करने की. लेकिन नौकरशाही की नहीं चली. दुर्भाग्य है कि पिछले आठ महीने के दौरान कहीं न कहीं कुछ भ्रष्ट नौकरशाह उस राजनैतिक इच्छाशक्ति को कमज़ोर करने में कामयाब हो गए हैं. संसद में संशोधन आने वाला है. आपको लगता है कि पुरस्कार के मिलने के बाद भी आपकी बात सुनी जाएगी? ये केवल मैं नहीं कह रहा हूँ पूरा देश कह रहा है. हर व्यक्ति कह रहा है कि ये क़ानून हर इंसान को सशक्त करता है. आज़ादी के बाद का ये सबसे बढिया क़ानून है. इस क़ानून को इसी रूप में बनाए रखना जनतंत्र के लिए सबसे ज़रूरी है. हर नागरिक को इस क़ानून को बचाने के लिए हर भरसक प्रयत्न करना पड़ेगा. आपने इस क़ानून का इस्तेमाल किया इसलिए आपको ये पुरस्कार भी दिया गया. आपने इस कानून का कैसे इस्तेमाल किया और कैसे इसकी सफलता देखी? हमने तो बहुत जबर्दस्त सफलता देखी है. एक आदमी राशन कार्ड बनवाने की कोशिश कर रहा था लेकिन चार महीने हो गए चक्कर लगाते हुए. सूचना का अधिकार इस्तेमाल हुआ और 10 दिन में काम हो गया. पासपोर्ट है, आयकर, विधवा पेंशन है, किसानों के मुआवज़े का मामला है, हर मुद्दों में सूचना के अधिकार का इस्तेमाल किया गया. कई बार जब हिसाब माँगा गया तो कई सारे घपले सामने आए. सरकारी अधिकारी डर गए कि अब ये सब नहीं कर सकते क्योंकि लोग तो इसके बारे में पूछेंगे. पांच साल के लिए जिस नेता को चुना गया है वो कितना काम करता है उसकी जवाबदेही क्या है. इस पर भी पूछा जा सकता है? नेता क्या कर रहा है, नौकरशाही क्या कर रहा है, इंजीनियर ने उस पर कितना पैसा खर्च किया, उसने फ़ाइल पर क्या लिखा, कोई कॉन्ट्रेक्ट उसको क्यों दिया गया इसको क्यों नहीं दिया गया, इन सब चीज़ों में हम हस्तक्षेप कर सकते हैं. परिवर्तन के बारे में कुछ बताएँ? परिवर्तन एक संगठन है. रजिस्टर्ड एनजीओ नहीं है. हम 10 लोग हैं. हम सब एकसाथ बराबर काम करते हैं. ढेरों वोलेंटीयर हैं. ये एक तरह का जनआंदोलन है. आप आईआईटी खड़गपुर छोड़ कर पहले आईआरएस अधिकारी बने और फिर उसको छोड़कर ये सब करना, क्या आपने नौकरी छोड़ दी है. आगे क्या करना चाहते है? मैंने फरवरी 2006 में त्यागपत्र सरकार को दे दिया है जो उनके विचाराधीन है. इसकी शुरूआत 2006 में ही हुई थी. बहुत छोटी सी बात से कि आम आदमी को सरकारी विभाग में अपना काम करवाने के लिए रिश्वत देनी पड़ती है, उससे हमारे पूरे देश की मानसिकता खराब होती जा रही है और जिस देश में हर व्यक्ति भ्रष्ट होगा वह देश प्रगति नहीं कर सकता. तो इस बात को लेकर हमने ये कोशिश की थी कि क्या आम आदमी को विकल्प दे सकते हैं कि वो बिना रिश्वत के अपना काम करा ले. अभी फिलहाल तो सबसे बड़ा प्रश्न ये है कि इस क़ानून को कैसे बचाया जा सके. अगर नेताओं को लगता है कि ये ऐसी बात है जिससे उनके वोट पर असर पड़ सकता है तो मुझे लगता है कि वे इस बात को जरूर सुनेंगे. नहीं तो आखिरी रास्ता यही है कि अगर क़ानून पास हो जाता है तो कोर्ट में उसको चैलेंज किया जाए. | इससे जुड़ी ख़बरें अरविंद केजरीवाल को रैमन मैग्सेसे अवार्ड01 अगस्त, 2006 | भारत और पड़ोस एडमिरल रामदास को मैगसेसे पुरस्कार03 अगस्त, 2004 | भारत और पड़ोस लिंगदोह को मिलेगा मैगसेसे | भारत और पड़ोस सूचनाधिकार क़ानून में संशोधन का विरोध27 जुलाई, 2006 | भारत और पड़ोस सूचना के अधिकार क़ानून में संशोधन20 जुलाई, 2006 | भारत और पड़ोस सूचना के अधिकार के लिए अभियान01 जुलाई, 2006 | भारत और पड़ोस बहुत महंगी पड़ रही है सूचना19 मार्च, 2006 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
| |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||