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गुरुवार, 27 जुलाई, 2006 को 15:35 GMT तक के समाचार
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सूचनाधिकार क़ानून में संशोधन का विरोध

सूचना का अधिकार
सूचना के अधिकार के इस्तेमाल को लेकर हाल ही में जनसंगठनों ने एक बड़ा अभियान चलाया है
सूचना के अधिकार संबंधी क़ानून के लागू होने को भारतीय लोकतंत्र की एक बड़ी उपलब्धि क़रार दिया जा रहा था लेकिन अब भ्रष्टाचार विरोधी गुटों का कहना है कि भारतीय कैबिनेट इसमें संशोधन करके इसे कमज़ोर बनाने जा रहा है.

उनका कहना है कि अगर ऐसा होता है तो वे इसके ख़िलाफ़ आंदोलन छेड़ेंगे.

हालाँकि सरकार ने इन आपत्तियों को बेबुनियाद क़रार दिया है.

भारतीय के केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा सूचना के अधिकार कानून में संशोधन कर के किसी भी मामले की फ़ाइल में अधिकारियों या मंत्रियों द्वारा की गई टिप्पणियों को सार्वजानिक करने से रोकने के फ़ैसले के ख़िलाफ़ आवाज़ें बुलंद हो रही हैं.

अरुणा रॉय और अण्णा हज़ारे जैसे सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि अगर फ़ाइलों में अधिकारियों द्वारा लिखी गई टिप्णियों की जानकारी से लोगों को वंचित कर दिया जाता है तो यह क़ानून बुरी तरह कमज़ोर हो जाएगा.

प्रधानमंत्री कार्यालय ने इस पर अपनी प्रतिक्रिया में कहा है कि सामाजिक और विकास के क्षेत्र संबंधी फ़ाइलों में लिखी गई टिप्पणियाँ जनता को उपलब्ध होंगी. सिर्फ़ सुरक्षा, सरकारी कर्मचारियों की नियुक्तियाँ और आर्थिक हितों से जुड़े मामलों की टिप्पणियां इससे बाहर होंगी.

मगर भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ पिछले कुछ दशकों से संघर्ष कर रहे अण्णा हज़ारे का कहना है कि इन टिप्पणियों के ज़रिए ही सरकारी महकमों में भ्रष्टाचार के स्रोतों का पता चलता है और यह पता चलता है कि किस फ़ैसले के लिए कौन ज़िम्मेदार था.

"फाइल नोटिंग के ज़रिए करोड़ों रुपए के घोटाले होने की संभावना है. मसलन, नीचे से लेकर ऊपर तक सभी अधिकारी लिखते हैं कि यह करना ठीक नहीं है और जब वही फाइल मंत्री तक जाती है तो वह एक झटके में कह देता है कि कर लो, मैं आदेश देता हूँ."

टिप्पणी अहम हैं...
 फाइल नोटिंग के ज़रिए करोड़ों रुपए के घोटाले होने की संभावना है. मसलन, नीचे से लेकर ऊपर तक सभी अधिकारी लिखते हैं कि यह करना ठीक नहीं है और जब वही फाइल मंत्री तक जाती है तो वह एक झटके में कह देता है कि कर लो, मैं आदेश देता हूँ."
अण्णा हज़ारे

"अगर फाइल नोटिंग देखने का अधिकार लोगों को होगा तो कोई भी मंत्री इस तरह मनमाने ढंग से फ़ैसले नहीं ले सकेगा."

क्या और कितनी ज़रूरत?

अगर बात इतनी ही आसान और अहम है तो फिर सरकार को इन टिप्पणियों को लोगों की नज़र से दूर रखने की क्या ज़रूरत है. या फिर सूचना अधिकार कानून में संशोधन वाक़ई भ्रष्ट अफ़सरशाहों के कारनामों पर पर्दा डालने की ज़रूरत से लाया जा रहा है.

पूर्व विदेश सचिव शशांक ऐसा नहीं मानते. शशांक का कहना है कि ऐसी बात नहीं है. कई बार कंपनियों और ठेकों के मामले में फाइल नोटिंग को सार्वजनिक करने से प्रशासनिक देरी हो सकती है या फिर बहुत से लोग उन टिप्पणियों को अदालत में घसीटने की कोशिश कर सकते हैं.

एक दलील जो अफ़सरशाही की ओर से दी जाती है और जिससे शशांक भी सहमत हैं वो यह है कि फ़ाइलों की टिप्पणियों के सार्वजानिक होने के डर से अधिकारियों के लिए अपनी राय बेबाक तरीके से दर्ज करना मुश्किल होगा.

मगर पूर्व केंद्रीय केबिनेट सचिव और उत्तर प्रदेश के सचिव रह चुके टीएसआर सुब्रमण्यम की राय इससे अलग है.

सुब्रमण्यम का कहना है कि फाइलों पर होने वाली टिप्पणियों के आधार पर ही कोई निर्णय लिया जाता है इसलिए उनका बहुत महत्व है.

बहरहाल भ्रष्टाचार विरोधी मुहीम में जुडे कार्यकर्ताओं ने लगता है बीड़ा उठा लिया है कि वो सूचना अधिकार क़ानून में संशोधन का जमकर विरोध करेंगे.

सरकार ने मन नहीं बदला तो अण्णा हज़ारे नौ अगस्त को राजघाट से अपना पद्मभूषण सम्मान सरकार को लौटा देंगे और देशव्यापी आंदोलन शुरु करेंगे.

उनके शब्दों में कहा जाए तो यह आज़ादी की दूसरी लड़ाई होगी.

लगता है कि सरकार के लिए अपने फ़ैसले को जायज़ ठहरा पाना चुनौती होगी.

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