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डगर कठिन है माया की | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
मायावती ने एक नई रणनीति अपनाकर यह दिखा दिया है कि धार्मिक उन्माद फैलाए बिना भी किस तरह से चुनावी राजनीति को न सिर्फ़ प्रभावित किया जा सकता है बल्कि परिवर्तन की एक नई बयार चलाई जा सकती है. नतीजों पर ग़ौर करें तो बहुजन समाज पार्टी ने पूरे उत्तर प्रदेश में अपनी पैठ बढ़ाई है और उम्मीदवारों की पृष्ठभूमि बताती है कि सभी धर्मों और जातियों के लोगों के वोट बसपा को मिले हैं. भारतीय जनता पार्टी ने सत्ता में आने बाद भी सामाजिक समरसता लाने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई थी और वह हिंदुओं के भी सिर्फ़ एक सीमित तबके तक ही अपनी पहचान बना सकी थी और कुछ समय के बाद तो जैसे उसकी पोल खुल गई. पार्टी इस समय अंदरूनी कलह से तो गुज़र ही रही है, यह और भी झटके वाली बात है कि ख़ुद पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह उत्तर प्रदेश से ही हैं लेकिन उनके चुनाव प्रचार में कोई धार नज़र नहीं आई थी. कुछ विश्लेषकों का तो कहना है कि भारतीय जनता पार्टी, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और विश्व हिंदू परिषद ने इस चुनाव में अपना धर्म कार्ड खेलने की कोशिश की थी और उसके लिए एक सीडी भी जारी की थी जिसमें मुसलमानों के ख़िलाफ़ बहुत सी आपत्तिजनक बातें कही गई थीं लेकिन ग़नीमत की बात ये है कि लोग ज़्यादा समझदार निकले. समाजवादी पार्टी के लिए मुसलमानों का रुझान देखा जाता था लेकिन ऐसी ख़बरें आईं कि मुलायम सिंह की सरकार ने बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में लाल कृष्ण आडवाणी के लिए नरमी दिखाई जिससे उनकी सरकार अपना कार्यकाल किसी तरह से पूरा कर सकी क्योंकि भाजपा ने भी बदले में मुलायम सरकार को गिरने से बचाने में परोक्ष रूप से योगदान किया. जैसा जनाधार इस बार बसपा को मिला है ऐसा किसी ज़माने में कांग्रेस का हुआ करता था लेकिन उत्तर प्रदेश दशकों तक एक छत्र सरकार चलाने वाली कांग्रेस अपनी लाख कोशिशों के बावजूद अपनी पैठ बढ़ाने में नाकाम रही है. राज्य के इस जातीय समीकरण को मायावती ने समय रहते भाँप लिया और जो नया समीकरण पेश किया उसने सबकी आँखें खोल दीं. यह दिलचस्प सवाल है कि इस तरह की रणनीति अपनाने और राजनीतिक हिम्मत दिखाने का ख़याल किसी और पार्टी में क्यों नहीं आया जबकि कांग्रेस, भाजपा और समाजवादी पार्टी, सभी दल बड़े-बडे नेताओं और रणनीतिकारों से भरे पड़े हैं. चुनौतियाँ इसमें कोई शक नहीं कि मायावती ने राजनीति को एक नई दिशा दी है लेकिन चुनावी नतीजे उनके पक्ष में आने के साथ ही उनके लिए अनेक बड़ी चुनौतियाँ भी सामने आ खड़ी हुई हैं.
सबसे बड़ी चुनौती यही है कि जिस परिवर्तन की शुरुआत उन्होंने की है उसे आगे बढ़ाना बहुत ही मुश्किलों भरा रास्ता है और उनमें प्रमुख होंगी - सामाजिक समरसता क़ायम करना और भ्रष्टाचार जैसे दैत्य का मुक़ाबला करना. मायावती की असली कसौटी यही होगी कि वह स्वच्छ प्रशासन देने में किस हद तक कामयाब हो पाती हैं और जातीय समीकरण एक बार अपने पक्ष में भुनाने के बाद कामयाबी का बस यही पैमाना होगा क्योंकि बहुत देर तक इस तरह के लोगों को धर्म या जाति जैसे मुद्दों पर अपने साथ नहीं रखा जा सकता जब तक कि कोई सरकार लोगों की बेहतरी के लिए ठोस काम नहीं करे. उत्तर प्रदेश में भ्रष्टाचार और सार्वजनिक सेवाओं में कामचोरी इस हद तक अपनी जड़ें जमा चुके हैं कि उन्हें ख़त्म करना तो दूर, उनमें कुछ कमी करना और सरकारी कर्मचारियों की सोच में कुछ बदलाव लाना भी अंगद के पैर को हिलाने से कम नहीं होगा. भारतीय समाज में सदियों से चली आ रही जाति प्रथा ने सामाजिक समरसता को दीमक की तरह चाटा है. मायावती की पार्टी का जनाधार हालाँकि दलित समुदाय है लेकिन ब्राहमण वर्ग को भी साथ लाकर उन्होंने इस सामाजिक समरसता की जो बयार चलाई है उसे आगे बढ़ाना भी टेढ़ी खीर होगी. राजनीतिक महत्वकांक्षाएँ अपनी सरकार का बहुमत बनाए रखना भी मायावती के लिए एक बडी़ चुनौती होगी. मायावती को सरकार बनाने के लिए किसी अन्य दल के समर्थन की ज़रूरत नहीं है जिसका मतलब है कि सभी विपक्ष में बैठेंगे और इसी उधेड़-बुन में लगे रहेंगे कि मायावती के बहुमत को किस तरह से कमज़ोर किया जाए.
ऐसे में मायावती को अपने विधायकों की राजनीतिक महत्वकांक्षाओं को लगातार पूरा करते रहना होगा और इसमें ज़रा सी भी ढील हुई तो ख़तरा बढ़ सकता है. वैसे बाक़ी राजनीतिक दलों स्थिति पर नज़र डालें तो उनमें से कोई भी 200 के जादुई आँकड़े के पास नहीं और उन सभी में 36 का आँकड़ा है. समाजवादी पार्टी के पास सिर्फ़ 97 विधायक हैं और कांग्रेस का समर्थन तो मिल नहीं सकता है और मुलायम सिंह भाजपा से कोई दोस्ती करेंगे नहीं. इसलिए मायावती को कम से कम विपक्षी दलों से तो डरने की कोई ज़रूरत नहीं है. संगठन कहने के लिए तो बहुजन समाज पार्टी का वजूद दो दशक से भी ज़्यादा पुराना हो गया है लेकिन अभी तक उसका कोई ठोस संगठनात्मक ढाँचा उभककर नहीं आया है. पूरी पार्टी किसी ज़माने में सिर्फ़ काँशीराम के इर्दगिर्द घूमती थी और अब वो स्थान मायावती ने ले लिया है.
जिस परिपक्व राजनीतिक सोच का परिचय मायावती और उनके सहयोगी नेताओं ने इस चुनाव में दिया है अगर उसे एक सुगठित संगठन का साथ मिल जाए तो उससे एक नया राजनीतिक युग शुरू हो सकता है जो बेशक राष्ट्रीय स्तर पर भी अपना प्रभाव छोड़ेगा. पिछले एक दो-साल के समय पर नज़र डालें तो कई नामी नेता बसपा छोड़कर गए थे और उनका यही आरोप था कि मायावती अपनी पार्टी में लोकतांत्रिक संगठन बनाने में ज़्यादा दिलचस्पी नहीं लेतीं. इसमें कोई शक नहीं कि मायावती के व्यक्तित्व का करिश्मा आज भारी वोट खींचने की क्षमता रखता है लेकिन इस जनाधार को मज़बूती देने के लिए पार्टी की सत्ता का विकेंद्रीकरण भी ज़रूरी होगा. साख मायावती के सामने एक बड़ी चुनौती ये है कि उन्हें भ्रष्टाचार के आरोपों से ख़ुद को बेदाग़ साबित करना होगा. निवर्तमान मुख्यमंत्री मुलायम सिंह जाते-जाते राज्यपाल को ताज कॉरीडोर मामले में मायावती पर लगे आरोपों का पत्र थमा गए. हालाँकि अब सरकार मायावती की होगी और वह इस मामले से बख़ूबी निपट सकेंगी लेकिन प्रदेश को भ्रष्टाचार की जकड़ से मुक्त करना उनकी बड़ी ज़िम्मेदारी होगी. ख़ुद उन पर इस तरह के भी आरोप लगते रहे हैं कि उनकी पार्टी का टिकट खुले रूप में बिकता है. हो सकता है इसमें कोई सच्चाई ना हो लेकिन धुँआ तो वहीं उठता है जहाँ कुछ आग होती है, हालाँकि कोई भी राजनीतिक दल इस तरह के आरोपों से मुक्त नहीं है मगर जितनी ख़बरें इस मामले में बसपा के बारे में फैली, उतनी किसी और दल के बारे में नहीं. यह बात मानी जा सकती है कि हर राजनीतिक दल को चलाने के लिए धन की ज़रूरत होती है तो उसके लिए ईमानदार और पारदर्शी तरीके से चंदा इकट्ठा करने का रास्ता शायद ज़्यादा असरदार और टिकाऊ साबित होगा. मायावती को ख़ासतौर से प्रशासनिक मशीनरी को सुचारू और कार्यशील बनाना होगा और पाँच साल तक वह बदले की राजनीति से ऊपर उठकर अगर प्रदेश और लोगों की भलाई के लिए नीतियाँ बनातीं और योजनाएँ लागू करती रहीं तो उनके राजनीतिक सपने को पूरा होने और पूरे देश की एक राजनीतिक ताक़त बनने से कोई नहीं रोक सकता. |
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