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सपा की हार के कारण | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में वर्ष 2004 में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी राजग के चुनाव हारने के बाद चुनावोत्तर समीक्षा में ख़ुद भाजपा ने यह स्वीकार किया कि बार-बार प्रचार माध्यमों से प्रसारित 'इंडिया शाइनिंग' वाले नारे ने लोगों को नाराज़ कर दिया था. इसका कारण यह है कि जब वे अपने आस-पास देखते थे तो उन्हों कोई भी ऐसी लाभप्रद चमक नज़र नहीं आती थी जो उन्हें संतोष दे सके. मुलायम सिंह यादव की सरकार ने भी उत्तर प्रदेश में 'जुर्म कम' और 'बड़ा दम' होने वाले नारे को 'कायम रहे मुलायम' से जोड़कर ऐसा घटाटोप तैयार किया गया कि ऐसी शांति, ऐसी व्यवस्था और ऐसा सुचारूपन तो उत्तर प्रदेश में कभी था ही नहीं. जबकि लोग जब अपने आसपास का माहौल देखते थे तो उसमें गुंडों का वर्चस्व, महाबलियों की धौंस और नए धनकुबेरों द्वारा उनकी ज़मीनें हड़पने जैसी ज़्यादतियां ही ज़्यादा दिखाई देती थीं. लिहाज़ा इस बार विधान सभा चुनाव में भी वही हुआ जो पिछली बार लोकसभा चुनाव में हुआ था. मतदाताओं ने नारों का भ्रमजाल खड़ाकर भरमाने की कोशिश को नकार दिया. योजनाओं में गड़बड़ी मुलायम सिंह के प्रचारक आश्वस्त थे कि 'कन्याधन' और 'बेरोज़गारी भत्ते' मुहैया कराकर उन्होंने पहली बार वोट देने वाले युवा मतदाताओं का मन जीत लिया है. मगर ऐसा हुआ नहीं क्योंकि इसके लाभ बहुत कम लोगों को मिला और ज़्यादातर वंचित रह गए. उनके लिए इनके कोई मायने नहीं थे. कन्याधन और ग़रीब महिलाओं में साड़ी वितरण को लेकर हुई धांधलियों और नौकरशाही के स्तर पर इन कार्यक्रमों में हुए भ्रष्टाचरों पर ख़ुद मुलायम सिंह ने कई बार टिप्पणियाँ कीं. दोषियों के ख़िलाफ़ जाँच भी बैठाई गई, कुछ दंडित भी हुए मगर कार्यक्रम की चमक तो चली ही गई. हालात इतने बिगड़ गए कि गंगा-जमुनी कछार को जो इलाक़ा मुलायम का शुरुआत से ही राजनीतिक शिविर रहा है वहाँ भी बसपा ही हावी होने लगी. बसपा ने समाज के सबसे निचले और दलितों वर्ग से लेकर ब्राह्मणों, बनियों और कायस्थों तक को अपने साथ लेने की रणनीति बड़ी कामयाबी से अपनाई. मायावती की रणनीति मायावती ने न तो मीडिया के चुनाव प्रचार में बढ़ चढ़कर दावे किए और न ही कोई दृश्यमान अभियान चलाया. वह केवल राजनीतिक मुद्दों को उभारने का काम करती रहीं जैसे सर्वसमाज की राजनीति, अतिग़रीब अगड़ों को भी आरक्षण जैसे मुद्दे. इनका असर पूरे राज्य में हुआ. इसलिए पश्चिमी उत्तर प्रदेश, बुंदेलखंड, मध्य उत्तर प्रदेश और पूर्वांचल हर जगह उनका वोट प्रतिशत भी बढ़ा और सीटें भी ज़्यादा मिलीं. केवल सपा ही नहीं, भाजपा, कांग्रेस और अन्य पार्टियों के भी वोट प्रतिशत और सीटें घटती गईं और बसपा उनकी कीमत पर मज़बूत होती गई. जिन इलाक़ों में पहले बसपा की उपस्थिति मामूली थी वहाँ भी इससे ज़्यादा ज़बरदस्त अंतर पड़ा. समाजवादी पार्टी जब पहली बार सत्ता में आई थी तब से पिछले एक दशक में जैसे उसका पूरा चरित्र ही बदल गया. उत्तर प्रदेश को लोगों की राय में वह कांग्रेस से भी ज़्यादा पूंजीपतिपरस्त, भाजपा से भी ज़्यादा संप्रदायवादी और चौधरी अजित सिंह जैसे जातिवादी दल चलाने वाले राजनीतिकों से भी ज़्यादा जातिवादी हो गई. हालांकि इस पर कुछ लोगों के अलग मत भी हो सकते हैं. पूंजी और राजनीति का एक ऐसा अजीब-सा तालमेल लोगों को देखने को मिलने लगा, जिसे कुछ समझाते और कुछ न समझाते हुए भी मतदाता ने पूरी तरह नापसंद किया. दोस्तों का साथ छूटा मुलायम के साथ कंधे से कंधा मिलाकर समाजवादी पार्टी को खड़ा करने वाले- बेनी प्रसाद वर्मा, राज बब्बर जैसे लोगों को पार्टी में पूंजी और राजनीति के नए रिश्ते लेकर आए लोगों ने रहना दूभर कर दिया. जनेश्वर मिश्र और स्व. कपिल देव सिंह जैसे लोग आख़िरी वक़्त तक बने रहे मगर क्या वे दल के हालचाल से दुखी नहीं होते रहे? पार्टी की शक्ल बदलती गई और पार्टी के प्रस्तावक मूकदर्शक बने रहे. महाबली मुलायम सिंह और उनके परम शक्तिशाली मित्रों के आगे वे करते भी क्या? मुस्लिम मतदाता सपा की रीढ़ थे मगर न जाने कैसे इस चुनाव में आम मुस्लिम मतदाता की यह धारणा बनने लगी कि चुनाव के बाद सपा अपनी सत्ता बचाने के लिए भाजपा से भी तालमेल कर सकती है. इसे अफ़वाह भी कह लें तो भी यह पिछले कुछ दिनों में तेज़ ही होती गई और मीडिया की सर्वेक्षण रपटों में जैसे-जैसे पिछड़ने की तस्वीर उभरने लगी, वैसे-वैसे मुस्लिम मतदाता चौकन्ना होने लगा. बसपा के बारे में वह आश्वस्त था कि उसका भाजपा से तालमेल नहीं होगा. ज़्यादा से ज़्यादा उसे कांग्रेस के समर्थन की ज़रूरत हो सकती है. इसमें उसे कोई एतराज नहीं था. लिहाजा जहाँ-जहाँ उसे बसपा का उम्मीदवार विजयी होता लगा, मुस्लिम मतदाता उसके साथ हो लिया. यह ताबूत की आख़िरी कील थी. |
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