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बाघ मारने का अनोखा 'ग़ैरक़ानूनी' उत्सव

वन विभाग इस उत्सव को रोक नहीं पाया है
पूर्वोत्तर भारत के मेघालय प्रांत में एक गांव ऐसा है जहां मनाए जाने वाले उत्सव से वहाँ के बाघ भी खौफ खाते हैं.

वन विभाग की रोकटोक और क़ानूनी कार्रवाई की चेतावनी के बावजूद यह उत्सव जारी है.

जनजातीय आबादी वाले मेघालय की जयंतिया पहाड़ियों पर बांग्लादेश सीमा के पास स्थित नोंग्तालांग नामक गांव में रोंगख्ली उत्सव तब मनाया जाता है जब ग्रामीण किसी बाघ या तेंदुए को मार डालने में कामयाब होते हैं.

जयंतिया भाषा में रोंग का मतलब होता है बाघ और ख्ली उत्सव को कहते हैं. गाँव की पुरानी परंपरा के हिस्से के रूप में मनाए जाने वाले इस उत्सव का अंत बाघ के भूने हुए माँस के साथ सामुदायिक भोज से होता है.

उत्सव में उत्साह के साथ भाग लेने वाले गाँव के किसान बिरोम लिंग्डोह तालांग बताते हैं कि यह उत्सव आम तौर पर फसल कटने के बाद के महीनों में मनाया जाता है. "हम सब मिलकर ईश्वर की पूजा करते हैं और बाघ को गाजे-बाजे के साथ उस लोक को विदा करते हैं."

आम तौर पर मारे गए बाघ या तेंदुए का मांस और अंतड़ियां निकालकर सुखा ली जाती हैं. जानवर की खाल को भूसे से भरकर गांव के बाहर विशेष रूप से बने फाटक पर लटका दिया जाता है. इस फाटक को वहां फ्लोंग कहा जाता है.

शान

जब तक उत्सव चलता है तब तक भूसा भरा बाघ का शव उसी तरह लटका रहता है. गांव के प्रवेश द्वार पर लटके ऐसे शव को गांव वाले अपनी शान समझते हैं.

कोई चोरी-छिपे नहीं होता यह उत्सव

एक ग्रामीण तिबू लिंग्डोह तालांग बताते हैं कि मुख्य उत्सव से एक दिन पहले शव को गांव के अंदर लाकर एक विशेष स्थान पर रखा जाता है. अगले दिन यानी मुख्य उत्सव के दिन सभी ग्रामीण रंग-बिरंगी पारंपरिक पोशाकें पहनकर गांव भर में जुलूस के रूप में घूमते हैं. इस दौरान ग्रामीण जमकर नाचते-गाते हैं, गांव की गलियों को भी पताकाओं से सजाया जाता है.

गाँववासियों के कुशल-मंगल के लिए प्रार्थना करने के बाद उत्सव का मुख्य भाग यानी "शाद ख्ला' यानी बाघ-नृत्य. बाघ या तेंदुआ मारने वाले व्यक्ति को इसमें विशेष सम्मान मिलता है और उसे सबसे पहले नाचने का अधिकार होता है.

गांववासियों में मान्यता है कि पूजा के बाद बाघ का शव पवित्र हो जाता है और घर में उसका एक अंश रखने पर अपवित्र आत्माएं दूर रहती हैं और कामयाबी प्राप्त होती है.

वन अधिकारियों का कहना है कि इस तरह संकटग्रस्त वन्य जीव को मारना कानून का उल्लंघन है तथा वन विभाग ऐसे लोगों के साथ कोई रियायत नहीं बरतता.

मेघालय के प्रधान मुख्य वन संरक्षक बीके नौटियाल का कहना है कि राज्य के वन विभाग ने इस मामले में भी उचित कानूनी कार्रवाई शुरू की है.

उन्होंने कहा कि दोषी ग्रामीणों की शिनाख्त करने के बाद उनके विरुद्ध मामले दर्ज किए गए हैं और आगे कार्रवाई के लिए सभी मामले कानून के प्रावधानों के मुताबिक अदालत को सौंप दिए गए हैं.

नौटियाल का कहना है कि जनजातीय परंपराओं के नाम पर वन्य जीव संरक्षण कानून के उल्लंघन की इजाजत नहीं दी जा सकती.

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