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बाघों को बचाने की कवायद | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बाघों का अस्तित्व बचाए रखने के लिए दुनिया भर के विशेषज्ञ नेपाल की राजधानी काठमांडू में मिल रहे हैं. बाघों की कई प्रजातियाँ लुप्त होने की कग़ार पर हैं. इस सम्मेलन का आयोजन विश्व वन्यजीव कोष (डब्ल्यूडब्ल्यूएफ़) ने किया है. बैठक के दौरान बाघों के खाल और हड्डियों के कारोबार से जुड़े नैतिक पहलुओं पर भी चर्चा होगी. वैज्ञानिक बाघों की गिनती ऐसे अद्भुत प्रजाति के रूप में करते हैं जिसके संरक्षण पर लोगों की राय एक जैसी है. लेकिन यह भी सही है कि दुनिया भर में बाघों की आठों प्रजातियाँ जंगलों पर बढ़ रहे दबाव और शिकार के कारण संकट में हैं. पूरे एशिया में अब पाँच से सात हज़ार बाघ ही बचे हैं. इस सम्मेलन में 12 देशों के प्रतिनिधि भाग ले रहे हैं जिनमें भारत, रूस, इंडोनेशिया और ख़ुद नेपाल भी शामिल है. चीन के प्रतिनिधिमंडल में 13 सदस्य हैं. बाघों के संरक्षण पर चीन का रूख़ विवादास्पद रहा है. वर्ष 1993 में चीन ने बाघों की हड्डियों के कारोबार पर रोक लगा दी थी लेकिन अब वहाँ की सरकार पर यह प्रतिबंध हटाने का दबाव बढ़ रहा है. इसके पक्ष में एक तर्क ये है कि बाघों की हड्डियाँ इलाज़ के काम आती है. लेकिन कुछ वैज्ञानिकों का कहना है कि बाघों की हड्डियाँ सूअरों या कुत्तों की हड्डियों से बहुत अलग नहीं है. | इससे जुड़ी ख़बरें कॉर्बेट में बढ़ी बाघों की तादाद08 अप्रैल, 2007 | भारत और पड़ोस रणथंभौर के पर्यटन व्यवसाय में खलबली10 दिसंबर, 2006 | भारत और पड़ोस बाघों की घटती संख्या पर सरकारी सुस्ती29 जून, 2006 | भारत और पड़ोस बाघों की रक्षा के लिए कार्यबल गठित25 जून, 2005 | भारत और पड़ोस बाघों को बचाने की प्रधानमंत्री की अपील25 मई, 2005 | भारत और पड़ोस भारत में घटते बाघों की चिंता13 अप्रैल, 2005 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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