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यूपी चुनावों में भाजपा की संभावना | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भाजपा उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावी अखाड़े में ऊँचे दावे से उतरने जा रही है. इसमें वह अपनी पूरी ताक़त लगाने का तानाबाना बुन चुकी है. इसके बावजूद क्या भाजपा सत्ता की दावेदारी में कही ठहरती है, ऐसा दिखाई नहीं पड़ता. पिछला चुनाव राजनाथ सिंह के मुख्यमंत्रित्व में भाजपा ने लड़ा था. राजनाथ सिंह तब दावा करते थे कि सरकार बनाने की कुंजी उनके पास है. चुनाव नतीजे से उस दावे की पोल खुल गई. उस चुनाव में भाजपा ने आठ दलों से समझौता किया था. उनके लिए 85 सीटें छोड़ी थी और ख़ुद 319 सीटों पर वह लड़ी थी. यह तो सभी जानते हैं लेकिन कुछ ही लोग यह जानते हैं कि राजनाथ सिंह ने उस चुनाव में 42 निर्दलियों से अपने तार जोड़े थे. फिर भी भाजपा तीसरे नंबर पर ही पहुँच सकी थी. इस बार राजनाथ सिंह के हाथों में भाजपा की कमान है. उत्तरप्रदेश में कल्याण सिंह को नेता प्रोजेक्ट किया जा रहा है. जो लोग राजनाथ सिंह की कथनी और करनी को जानते हैं, उन्हें पता है कि कल्याण सिंह सिर्फ़ 'मुखौटा' हैं. असली दावेदार कोई और है. राजनाथ सिंह के इर्दगिर्द चल रही हलचलों की भनक जिन्हें है वे उस दावेदार का नाम जानते हैं. वे विनय कटियार हैं. यह अकेला उदाहरण नहीं है जिससे भाजपा की एकजुटता की थाह ली जा सकती है. ऐसे उदाहरण अनेक हैं. उम्मीदवारों का चयन उम्मीदवारों के चयन से पहले एक ख़बर छपी कि कल्याण सिंह दाग़ी लोगों की सिफ़ारिश कर रहे हैं. भला, क्या कोई इस पर विश्वास कर सकता है? फिर भी कल्याण सिंह को इसका खंडन करना पड़ा.
भाजपा अपने अंतरविरोधों को ढंक नहीं पा रही है. शरद यादव ने अपने किसी मित्र से हैरान होकर कहा कि समझौते में जद-यू और अपना दल जितनी सीटें चाहते थे, उससे ज़्यादा भाजपा ने दी. यह कोई रहस्य नहीं है कि जिन उम्मीदवारों को राजनाथ सिंह भाजपा से टिकट नहीं दिलवा सकते थे उनके लिए इन समझौतों में जगह बनाई गई है. दूसरी ओर 'भारतीय समाज पार्टी' से समझौता भरसक कोशिश करने के बावजूद नहीं हो पाया. पिछले चुनाव में जितना नुक़सान कल्याण सिंह की पार्टी से भाजपा को हुआ था उससे कम नुक़सान इस बार उमा भारती नहीं पहुँचाएंगी. हिसाब बराबर रहेगा. गोरखपुर मंडल में एक उम्मीदवार के चयन को सांसद आदित्यनाथ ने मुद्दा बना दिया है. अगर आदित्यनाथ ने अपने उम्मीदवार खड़े कर दिए तो भाजपा की उस क्षेत्र में बुरी गत बनेगी. दामन पर छींटे इस चुनाव में मतदाता किस लिए वोट करेगा? यही वह सवाल है जिससे दलों की तकदीर तय होगी. भाजपा के दामन पर भी छीटें हैं. मुलायम सिंह की सरकार को बनवाने में भाजपा की ही भूमिका थी. उसे चलाने और टिकाए रखने का जिम्मा लोभी विधायकों ने संभाल लिया. जिस तरह उत्तर प्रदेश लूटपाट और जंगल राज की त्रासदी से गुजर रहा है, उससे मुक्ति पाने के लिए इस बार लोग वोट करेंगे. चुनावी बहस में इस बार सपा-भाजपा की सांठगांठ की कलई खुलेगी. आम और ग़रीब आदमी की ज़िंदगी के सवालों को राजनीति के पटल पर मुलायम सिंह ने जिस तरह ओझल कर रखा था, उसका उन्हें खामियाजा भुगतना पड़ेगा. मुलायम सिंह को लोग हराएंगे और जिताएंगे किसको? इस वक़्त जो दिखाई पड़ रहा है, उसमें बसपा जीत के जातीय समीकरण पर खड़ी है. भाजपा का अपना जनाधार बिखर गया है. उसके पास न मुद्दा है और न जनबल. ग़लत टिकट के बंटवारे से भाजपा की 25 सीटें ख़तरे में पड़ गई हैं. इसलिए बहुत जोरशोर से लड़ती हुई भाजपा अपनी सीटें जीतती रही है यानि 88, उतनी भी वह इस चुनाव में हासिल कर सकेगी, इसमें संदेह है. वैसे तो भाजपा के नेता 124 सीटें जीतने का दावा कर रहे हैं. मेरा अनुमान है कि भाजपा 70 का आंकड़ा पार नहीं कर पाएगी और तब लालकृष्ण आडवाणी की वापसी का रास्ता खुलेगा. |
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