|
उत्तर प्रदेश में खुला मुक़ाबला | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
उत्तर प्रदेश की पंद्रहवीं विधान सभा की चुनाव प्रक्रिया शुरू हो गयी है लेकिन चुनाव मैदान की तस्वीर अभी तक साफ नहीं है. अभी भी नए समीकरण बन रहे हैं और पुराने बिगड़ रहे हैं. सात चरणों में मतदान होने से नामांकन प्रक्रिया ही एक महीने यानि 20 अप्रैल तक चलेगी. पश्चिम में राष्ट्रीय लोकदल नेता अजीत सिंह ने अभी तक पत्ते नहीं खोले हैं. कहा जा रहा है कि लोकदल ने जाट मुस्लिम गठजोड़ मजबूत किया है. वी पी सिंह – राज बब्बर का जन मोर्चा साथियों की तलाश मे हैं जबकि कांग्रेस तालमेल को लेकर दुविधा मे है . तीन साल तक गठबंधन सरकार चलाने के बाद मुलायम सिंह यादव राजनीतिक तौर पर अलग थलग पड़ गए हैं. महानगरीय निकाय चुनाव और उत्तराखंड विधान सभा में सफलता के बावजूद बीजेपी में अकेले लडाई लडने का साहस नहीं दिख रहा. बीजेपी की आपसी गुटबंदी अपनी जगह है ही. कहा जा रहा है कि पूरब मे मऊ से गोरखपुर के बीच हिन्दू मुस्लिम तनाव का लाभ बीजेपी को मिल सकता है बशर्ते महंत आदित्यनाथ योगी से उनका तालमेल हो जाए. हालांकि योगी गोरखपुर से बीजेपी के टिकट पर सांसद हैं लेकिन उनका अपना एक अलग संगठन हिंदू युवा वाहिनी है और उनकी अपनी अलग पहचान है.
बीएसपी ने ब्राह्मणों व अन्य अगडी जातियों के साथ नया ताना बाना बुना है, पर इससे कहीं कहीं दलित समुदाय मे अकुलाहट भी सुनी जा रही है. कई सालों बाद इस बार मुस्लिम समुदाय के दिमाग पर बीजेपी का खौफ नहीं है. मुस्लिम मतों का बिखराव भाजपा के लिए कितना लाभदायक होगा, कहना मुश्किल है लेकिन इसका कुछ नुकसान सपा को हो सकता है. जहाँ तक मुद्दों की बात है अमिताभ बच्चन के लाख समझाने के बावजूद जुर्म और गुंडई आम आदमी के लिए मुद्दा हैं. दादरी में बिजली तो नहीं बनी, मुलायम सरकार पर पूँजीपतियों की हिमायती होने का ठप्पा ज़रूर लग गया. राज्य में गन्ना किसानों को राहत मिली, लेकिन आम किसानों की हालत मे फर्क नहीं आया. प्रशासन मे भ्रष्टाचार बढा है. ग्रामीण असंतोष बढा है. इन सबके बावजूद मुलायम सरकार को किसी बड़े जनांदोलन का सामना नहीं करना पडा. यह उनका राजनीतिक कौशल हो सकता है या विपक्ष की कमजोरी. प्रेक्षक मानते हैं कि वोटरों के लिए अब भी विकास या सुशासन के बजाय जातीय पहचान और सामाजिक मुद्दे अधिक बड़े प्रेरक हैं. इसीलिए नेतृत्व की अगली कतार मे पिछड़े वर्गों के नेता हावी हैं पर उत्तर प्रदेश की राजनीति का यह मर्म कांग्रेस का कार्पोरेट कम्प्यूटर नहीं समझ पाया.
फिलहाल जो परिस्थिति बन रही है, उससे लगता है कि अब मुकाबला सीधे सीधे समाजवादी और बहुजन समाज पार्टी के बीच नही रहा. आखिरी वक्त पर भारतीय जनता पार्टी मे जो उभार आ रहा है, उससे अब मुकाबला त्रिकोण और कहीं - कहीं चौकोर दिखने लगा है. लेकिन न किसी के पक्ष मे लहर दिख रही है, न विपक्ष में हवा. प्रेक्षकों की माने तो विधान सभा फिर त्रिशंकु होगी. कुछ प्रेक्षकों की राय मे बसपा सबसे बडी पार्टी हो सकती है. चुनाव के बाद एकदम नए समीकरण बन सकते हैं. जो अभी विरोधी हैं , साथ आ सकते हैं . सरकार बनाने में छोटे दलों और निर्दलीयों की भूमिका अहम होगी . अभी मुख्यमंत्री पद की दौड़ मे जो तीन नाम मायावती, मुलायम सिंह और कल्याण सिंह चल रहे हैं , उनमें कई समानताएं हैं. तीनों समाज के पिछडे तबकों, ग्रामीण इलाकों और पश्चिमी क्षेत्र से हैं. तीनों शुरू मे टीचर थे. और अब तीनों के साथ सीबीआई का ठप्पा जुड गया है. लेकिन बहुमत का जुगाड न बना तो कुछ समय के लिये राष्ट्रपति शासन लगने की नौबत भी आ सकती है. कांग्रेस तो यही चाहेगी कि अगले लोक सभा चुनाव से पहले वह उत्तर प्रदेश मे दिल्ली से हुकूमत चलाए. | इससे जुड़ी ख़बरें गोरखपुर में कर्फ़्यू में दो घंटे की ढील02 फ़रवरी, 2007 | भारत और पड़ोस उत्तर प्रदेश में राजनीतिक सरगर्मी तेज़16 फ़रवरी, 2007 | भारत और पड़ोस 'राष्ट्रपति शासन की ओर बढ़ता यूपी'17 फ़रवरी, 2007 | भारत और पड़ोस कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक आज18 फ़रवरी, 2007 | भारत और पड़ोस उत्तर प्रदेश में राजनीतिक उठापटक25 फ़रवरी, 2007 | भारत और पड़ोस सपा के उम्मीदवारों की पहली सूची जारी01 मार्च, 2007 | भारत और पड़ोस निठारी पर बहस, पाटिल का आश्वासन07 मार्च, 2007 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
| |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||