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मंगलवार, 13 मार्च, 2007 को 10:54 GMT तक के समाचार
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सवर्णों को मिलीं सबसे ज़्यादा टिकटें

मायावती
मायावती ने चुनाव न लड़ने की घोषणा की है
उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव के लिए बहुजन समाज पार्टी ने सभी 403 सीटों के लिए उम्मीदवारों की सूची जारी कर दी है. पार्टी अध्यक्ष मायावती ने यह भी स्पष्ट किया कि बसपा अपने दम पर ही चुनाव लड़ेगी और किसी भी दल से तालमेल नहीं करेगी.

पार्टी अध्यक्ष मायावती ने उम्मीदवारों की सूची जारी करते हुए ऐलान किया की वह स्वंय विधानसभा चुनाव नहीं लड़ेंगी.उनका कहना था कि इससे प्रचार अभियान पर असर पड़ सकता है.

बहुजन समाज पार्टी ने उत्तर प्रदेश विधानसभा आम चुनाव के लिए सबसे ज़्यादा 139 टिकट अगड़ी जातियों को दिए हैं.

इनमें भी सबसे ज्यादा छियासी टिकट ब्राह्रमण समुदाय को दिये गये हैं. इस तरह मनुवाद और ब्राह्रमणवाद विरोधी बसपा ने नयी राजनीति और सामाजिक इंजीनियरिंग को अंजाम दिया है.

सामाजिक समीकरण

उत्तर विधान सभा में कुल 403 सीटें हैं

उम्मीदवारों का सामाजिक वर्गीकरण देते हुए मायावती ने बताया कि इस बार अगड़ी जातियों को 139, पिछड़ी जातियों को 110, दलित वर्ग को 93 और मुसलिम समुदाय को 61 टिकट दिये गये हैं.

पिछली बार 2002 विधान सभा चुनाव में अगड़ी जातियों को 92 टिकट दिये गये थे. इस तरह इस बार अगड़ी जातियों के 47 उम्मीदार अधिक हैं.

अगड़ी जातियों को ज़्यादा टिकट देने के लिए मुस्लिम, पिछड़ी जातियों और दलित समुदाय के उम्मीदवार पहले की तुलना में कम हुए हैं.

मायावती ने स्पष्ट किया कि अगड़ी जातियों में ब्राह्रमणों को सबसे ज़्यादा टिकट उनकी तैयारी को देखकर दिए गये हैं.

मायावती पिछले कुछ समय से प्रदेश भर में घूम-घूमकर ब्राह्रमण सम्मेलन कर रही थीं और ब्राह्रमण समुदाय सत्ता में साझेदारी के लिए उनकी ओर आकर्षित भी हुआ.

बसपा महासचिव सतीश मिश्र का दावा है कि आज़ादी के बाद पहली बार किसी एक राजनीतिक दल ने ब्राह्रमण समुदाय को इतने टिकट दिए हैं.

ब्राह्रमण वोट

प्रेक्षकों के अनुसार ब्राह्रमण समुदाय के बसपा के प्रति झुकने का बड़ा कारण यह है कि पिछले कुछ सालों में कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी सत्ता से दूर होती गईं और समाजवादी पार्टी पर यादव-ठाकुर गठजोड़ हावी है.

सरकारी अधिकारियों-कर्मचारियों में भी यही भावना पनपी है.

सामाजिक धरातल पर भी गांवों में दलित समुदाय का टकराव ब्राह्रमणों के बजाय ठाकुर, जाट, अहीर जैसी लाठी और खेती वाली जातियों से है.

संभवतः इसी कारण मायावती की नई सामाजिक इंजीनियरिंग को बीएसपी के दलित समुदाय में भी स्वीकार्यता मिली.

शुरू-शुरु में कांग्रेस पार्टी का सामाजिक आधार भी ब्राह्रमण, दलित और मुसलिम समुदाय थे और मायावती कांग्रेस को खत्म करने के लिए उसी सामाजिक आधार को अपना रही हैं.

बहुजन समाज पार्टी की बुनियाद ब्राह्रमणों एवं अन्य अगड़ी जातियों के विरोध पर आधारित थी.

बीएसपी नेता कहते थे कि 15 फीसदी अगड़ी जातियाँ शेष 85 फीसदी पर शासन करती हैं.

नई रणनीति

बीएसपी के दो नारे बहुचर्चित रहे हैं- तिलक, तराजू और तलवार इनको मारो जूते चार.

दूसरा नारा था- जिसकी जितनी हिस्सेदारी उतनी उसकी भागीदारी. शुरू के दौर में बीएसपी के इस रुख से जातीय संघर्ष भी हुए.

बीएसपी ने समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और भाजपा तीनों से समय-समय पर गठजोड़ किए.

लेकिन बीएसपी का अनुभव रहा कि दूसरी पार्टीयाँ अपने वोट उसके उम्मीदारों को नहीं दिला पातीं.

इसलिए बीएसपी ने रणनीति बदलकर स्वंय ही अगड़ी जातियों से हाथ मिलाया. इस प्रक्रिया में दूसरे दलों के कई मज़बूत नेताओं ने बीएसपी का टिकट लेना फायदेमंद समझा. इसके लिए उन्होंने बड़ी-बड़ी रकमें भी खर्च की है.

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