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बुधवार, 21 मार्च, 2007 को 08:56 GMT तक के समाचार
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बाबरी मस्जिद पर राहुल गांधी के बयान के मायने

राहुल गाँधी
राहुल गांधी ने उत्तर प्रदेश में अपने रोडशो के दौरान बाबरी विध्वंस पर बयान दिया था
बाबरी मस्जिद विध्वंस के संदर्भ में राहुल गांधी के अब विवादास्पद बन गए बयान पर बीबीसी हिंदी डॉट कॉम पर पाठकों से अपना मत देने के लिए कहते हुए तीन विकल्पों में से एक को चुनने के लिए कहा गया.

पहला, क्या उनका बयान कि अगर कोई गांधी देश का प्रधानमंत्री होता तो बाबरी मस्जिद नहीं गिरती... सही है.

दूसरा, क्या यह मुस्लिम तुष्टिकरण है, या फिर तीसरा कि यह उनकी राजनीतिक अपरिपक्वता है.

मेरी समझ में तीनों विकल्पों में से एक को चुनना मुश्किल है क्योंकि तीनों ही उत्तर किसी हद तक सही हैं और ग़लत भी.

यदि आप भारत के राजनीतिक इतिहास का ईमानदार विश्लेषण करें तो सचमुच यह बात गले उतरना मुश्किल है कि जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी या राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में बाबरी मस्जिद गिराई जा सकती थी.

(इस विषय पर बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के पाठकों के विचार आप नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं)

कारण चाहे आदर्शवाद होता, धर्मनिरपेक्षता के प्रति प्रतिबद्धता या फिर सीधी-सादी राजनीतिक समझ और मुस्लिम वोट खोने का डर; किसी गांधी ही क्यों, किसी भी राजनीतिक रूप से सशक्त और दूरदृष्टि रखने वाले प्रधानमंत्री के कार्यकाल में 6 दिसंर 1992 जैसी घटना संभव नहीं थी.

मुस्लिम तुष्टिकरण

 यदि आप भारत के राजनीतिक इतिहास का ईमानदार विश्लेषण करें तो सचमुच यह बात गले उतरना मुश्किल है कि जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी या राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में बाबरी मस्जिद गिराई जा सकती थी

अब बात करते हैं मुस्लिम तुष्टिकरण की.

इसमें कोई शक नहीं कि राहुल के बयान से मुस्लिम सोच प्रभावित होगी. सब जानते हैं कि यूपी के मुस्लिम 1992 के बाद से ही कांग्रेस से जैसे नाता तोड़ चुके हैं.

इसका असर साफ़ दिखता भी है.

कांग्रेस की उत्तर प्रदेश में पिछले पंद्रह वर्षों में जो राजनीतिक दुर्दशा हुई है, वह किसी से छिपी हुई नहीं है.

नाराज़गी का कारण बाबरी मस्जिद का गिराया जाना था, यह भी सब जानते हैं. इस घटना पर कांग्रेस की माफ़ी या अफ़सोस जताए जाने से कोई फर्क़ अब तक तो पड़ा नहीं है.

तो फिर, अगर राहुल इस मामले पर गांधी परिवार और उसकी कांग्रेस पार्टी की तत्कालीन सरकार में फर्क़ कर मुसलमान मतदाता को वापस रिझाने की कोशिश कर रहे हैं तो उसमें क्या नुक़सान है?

अगर मुस्लिम कांग्रेस के साथ वापस जुड़ते हैं तो लाभ तो कांग्रेस और गांधी परिवार दोनों को ही होगा.

जो प्रेक्षक इस पूरे प्रकरण में 'गांधी सामंतवाद' का एक और उदाहरण देख रहे हैं वह भी कुछ ज़्यादा ही उस नई-नवेली दुल्हन की तरह अनभिज्ञ दिखने का प्रयास कर रहे हैं जो ससुराल में नई-नई आई है और अपने नए घर के तौर-तरीक़े से अपरिचित है.

राहुल गांधी
राहुल गांधी के बयान पर राजनीतिक दलों ने तीखी प्रतिक्रिया जताई

क्या पिछले पाँच दशकों में कभी भी किसी को 'गांधी-नेहरू' परिवार के 'ख़ास दर्जे' के बारे में कोई संदेह रहा है?

बात सही-गलत की नहीं है. गांधी परिवार भारतीय राजनीति की 'रॉयल्टी' या शाही परिवार जैसा है और उन्हें इस सिंहासन पर सिर्फ़ कांग्रेसजनों ने नहीं, विपक्ष, मीडिया और किसी हद तक भारतीय मतदाताओं ने भी बिठा कर रखा है.

जब यह सच्चाई है ही तो फिर इस पर इतना शोर मचाना कितना युक्तिसंगत है?

राजनीतिक रणनीति के तहत नहीं

यह प्रकरण राहुल की राजनीतिक अपरिपक्वता अवश्य दर्शाता है.

भारतीय राजनीति में साफ़गोई और सीधी बात कहने की परंपरा काफ़ी समय पूर्व ही समाप्त हो चुकी है.

 बात सही-गलत की नहीं है. गांधी परिवार भारतीय राजनीति की 'रॉयल्टी' या शाही परिवार जैसा है और उन्हें इस सिंहासन पर सिर्फ़ कांग्रेसजनों ने नहीं, विपक्ष, मीडिया, और किसी हद तक भारतीय मतदाताओं ने भी बिठा कर रखा है

भारतीय नेता अब मन से बोलने के लिए नहीं जाने जाते. उनके समर्थक भी उम्मीद यही करते हैं कि उनके नेता का हर बयान नपा-तुला हो; उससे कोई वर्ग नाराज़ नहीं हो और चारों ओर से वोटों की वर्षा हो.

बात सही हो या ग़लत, संभव हो या असंभव, प्रासंगिक हो या बिल्कुल ऊटपटांग, इससे किसी को मतलब नहीं होता.

मुझे इस बात का पूरा विश्वास है कि राहुल ने यह बयान अनौपचारिक बातचीत की तर्ज़ पर ज़्यादा दिया होगा न कि सोची-समझी राजनीतिक रणनीति के तहत.

लेकिन अब जब उनका बयान सुर्खियाँ बन चुका है उनके पास कोई चारा नहीं है सिवा उस पर डटे रहने के.

हाँ, एक बात मैं कहना चाहूँगा जो मुझसे पहले बुधवार के इंडियन एक्सप्रेस के संपादकीय में कही जा चुकी है.

इस बात से मैं पूरी तरह सहमत हूँ कि युवा पीढ़ी, भविष्य के नेता - खासकर पढे-लिखे नेताओं, जैसे राहुल गांधी से हम यह उम्मीद अवश्य करेंगे कि वह भविष्य की संभावनाओं और चुनौतियों को नज़र में रखते हुए ही भारत को नेतृत्व देने का एजेंडा तय करेंगे. न कि विगत त्रासदियों और विवादों में देश और स्वयं को उलझा कर एक निरर्थक और नकारात्मक एजेंडा तय करेंगे.

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