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गुरुवार, 15 फ़रवरी, 2007 को 13:24 GMT तक के समाचार
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भारत की सस्ती दवाओं को क़ानूनी चुनौती

नोवार्टिस के खिलाफ प्रदर्शन
अगर फ़ैसला नोवार्टिस के पक्ष में हुआ तो विकासशील देशों पर इसका बुरा असर पड़ सकता है
दवा बनाने वाली एक बड़ी कंपनी नोवार्टिस ने भारत के पेटेंट क़ानून को अदालत में चुनौती दी है.

अगर नोवार्टिस को सफलता मिल जाती है तो विकासशील देशों को एड्स और दूसरी महामारियों की दवाइयाँ सस्ती कीमतों पर मुहैया होना बंद हो सकती हैं.

उल्लेखनीय है कि अंतरराष्ट्रीय बौद्धिक संपदा पर ग्लोबल समझौते के हिसाब से भारत ने वर्ष 2005 में अपने पेटेंट कानून में बदलाव किया था.

इस नए क़ानून का पहली बार इस्तेमाल करते हुए नोवार्टिस ने ल्यूकेमिया बीमारी की दवा ग्लिवेक के लिए पेंटेंट याचिका दायर की थी जिसे जनवरी 2006 में भारत के पेटेंट कार्यालय ने ख़ारिज कर दिया था.

अब नोवार्टिस ने न केवल इस फ़ैसले को अदालत में चुनौती दी है बल्कि इसने यह भी दावा किया है कि भारत का पेटेंट कानून अंतरराष्ट्रीय समझौतों के अनुकूल नहीं है. मामले की सुनवाई चेन्नई में शुरु हो चुकी है.

आविष्कार

मामले में आविष्कार का सवाल सबसे अहम है. भारत के पेटेंट क़ानून के तहत पेटेंट सुरक्षा हासिल करने के लिए दवाओं का ‘नया और एक आविष्कार के चरण में होना’ ज़रूरी होता है.

मेडिसीन्स सैन्स फ्रन्टियर्स (एमएसएफ) और ऑक्सफ़ैम जैसे ग़ैर-सरकारी संगठनों का कहना है कि यदि नोवार्टिस को सफलता मिल जाती है तो दवा कंपनियां प्रचलित दवाओं पर आधारित एड्स के नए उपचारों को भी भारत में पेटेंट सुरक्षा के दायरे में ला पाएँगी.

उनका मानना है कि इसकी वजह से सस्ती मौलिक दवाइयों के अफ़्रीका और दूसरे देशों में होने वाले निर्यात पर रोक लग जाएगी.

1970 में भारत दुनिया भर के गरीबों का दवाखाना बन गया जब उसने दवाओं पर पेटेंट जारी करना बंद कर दिया. इसके चलते यहाँ के कई दवा निर्माता दूसरे देशों में पेंटेट सुरक्षा के भीतर आने वाली मौलिक दवाइयों की नकल करने में सक्षम हो गए.

गरीबों की पहुँच से दूर
 अगर नोवार्टिस जीत जाता है तो ऐसी अनगिनत दवाइयाँ जो गरीब लोगों को पहले से सस्ते में उपलब्ध है, वे पेटेंट कराए जा सकेंगे और गरीबों की पहुँच से दूर हो जाएँगे
रिचर्ड इंग्लिश, ऑक्सफ़ैम

लेकिन 1994 में भारत ने व्यापार से संबंधित बौद्धिक संपदा अधिकार समझौते पर हस्ताक्षर किया जिसके बाद 2005 तक विश्व व्यापार संगठन के सभी सदस्य देशों को दवाइयाँ समेत सभी प्रौद्योगिकीय उत्पादों पर पेटेंट जारी करना जरूरी हो गया था.

इसके बाद से ही दवा निर्माता कंपनियाँ अपने उत्पादों को भारत में पेटेंट कराने के लिए कतार में खड़ी रही हैं. ऐसे करीब नौ हज़ार याचिकाओं की जाँच होनी है.

ग्लिवेक अदालत तक सबसे पहले पहुँचने वालों में से एक था. इसकी पेटेंट याचिका इसलिए ख़ारिज कर दी गई थी क्योंकि ऐसा माना गया कि यह महज़ एक पुरानी दवा का ही एक नया संस्करण था.

ऑक्सफाम के मेक ट्रेड फेयर अभियान के प्रबंधक रिचर्ड इंग्लिश कहते हैं, “यदि नोवार्टिस जीत जाता है तो ऐसी अनगिनत दवाइयाँ जो ग़रीब लोगों को पहले से सस्ते में उपलब्ध है, वे पेटेंट कराए जा सकेंगे और गरीबों की पहुँच से दूर हो जाएंगे.”

एमएसएफ ने नोवार्टिस के मुकदमें को वापस लिए जाने के आह्वान वाली एक याचिका पर दुनिया भर से तीन लाख हस्ताक्षर इकट्ठे किए हैं.

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