|
एशियाई देशों में एड्स की भयावह तस्वीर | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
एशियाई देशों में अगर एड्स के संक्रमण को रोकने के लिए प्रभावी क़दम नहीं उठाए गए तो अगले पाँच वर्षों के दौरान यहाँ प्रभावित लोगों की संख्या 150 फ़ीसदी बढ़ जाएगी. संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूएनएड्स की एक नयी रिपोर्ट के अनुसार इसकी ज़्यादा संभावना है कि मादक दवाओं का इस्तेमाल करने वाले, समलैंगिक और यौनकर्मी एचआईवी के संपर्क में आ सकते हैं. संस्था का कहना है कि इन लोगों में एड्स के प्रसार को रोकने की कोशिश होनी चाहिए. जापान में एशिया-प्रशांत क्षेत्र में एड्स के प्रसार को रोकने पर चल रहे सम्मेलन के दौरान यह रिपोर्ट जारी हुई. संयुक्त राष्ट्र के अनुसार एशियाई देशों में सबसे बड़ी समस्या ये है कि यहाँ के ज़्यादातर लोग एड्स को बड़ा मुद्दा नहीं मानते. यह भी सही है कि एशिया के कई हिस्सों में इसे प्रभावित लोगों की संख्या भी कम है लेकिन कई एशियाई देशों की ज़्यादा आबादी के कारण आंकड़े बहुत भयावह तस्वीर पेश करते हैं. भारत में एचआईवी से प्रभावित लोगों की संख्या क़रीब 50 लाख है. जो दक्षिण अफ़्रीका के बराबर है. कई एशियाई देशों में एड्स के मामले तेज़ी से बढ़ रहे हैं. जापान जैसे देश में एचआईवी से प्रभावित लोगों की संख्या कम तो है लेकिन यहाँ भी इसका प्रसार उतनी ही तेज़ी से हो रहा है जितनी तेज़ी से यह दुनिया के सबसे प्रभावित देशों में हो रहा है. एड्स पर काम करने वाले लोगों का कहना है कि कई एशियाई देशों में इलाज के लिए सामने न आना और समलैंगिकों, यौनकर्मियों और मादक दवा का सेवन करने वालों के प्रति पूर्वाग्रह इसका प्रसार रोकने के रास्ते में सबसे बड़ा रोड़ा है. कई स्वास्थ्यकर्मियों का कहना है कि उन्हें तो यह भी पता नहीं चल पाता कि वाकई इन इलाक़े में एड्स की स्थिति कितनी गंभीर है क्योंकि लोग सामने नहीं आते. यूनएड्स का कहना है कि एड्स से निपटने के लिए एशिया को सहायता राशि कम मिल रही है. संस्था का कहना है कि अगर और प्रभावी क़दम उठाए गए तो इसका प्रसार रोकने में मदद मिल सकती है. |
| |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||