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'ब्रितानी सरकार की नीतियाँ ज़िम्मेदार' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
एक ग़ैर सरकारी संगठन क्रिश्चियन एड्स ने भारत में उस संकट का ज़िम्मेदार ब्रितानी सरकार की मुक्त व्यापार नीतियों को ठहराया है जिसके कारण हज़ारों किसानों को आत्महत्या करने पर मजबूर होना पड़ा. संगठन ने एक रिपोर्ट में घाना, जमैका और भारत के बाज़ारों में सुधारों का जायज़ा लिया है. रिपोर्ट में आँध्र प्रदेश राज्य में हुई चार हज़ार आत्महत्याओं की घटनाओं के लिए अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक से प्रेरित नीतियों को दोषी ठहराया है. ब्रिटेन सरकार का कहना है कि यह आलोचना 'समय से पीछे है' और जो सहायता दी जाती है वह निजीकरण जैसी शर्तों से बंधी हुई नहीं है. क्रिश्चियन एड्स ने ब्रिटेन सरकार से कहा है कि वह अपनी सहायता विकासशील देशों के मुक्त व्यापार प्रयासों पर आधारित न रखे और इस वर्ष जी8 में अपनी अध्यक्ष पद का इस्तेमाल बदलाव को प्रेरित करने के लिए करे. रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पश्चिमी देश मुद्रा कोष और विश्व बैंक की अनुदान और करों को ख़त्म करने के लिए बनाई गई मुक्त व्यापार नीतियों का समर्थन कर रहे हैं. आँध्र प्रदेश में वर्ष 1999-2004 में कई किसानों ने आत्महत्या कर ली क्योंकि पूर्व राज्य सरकार ने जिन नीतियों का पालन किया था उनसे कर्ज़े में बढ़ौतरी हो गई थी. रिपोर्ट के अनुसार जमैका में भी इन्हीं नीतियों के तहत गन्ने की फ़सल में कमी आई जिसके बाद महिलाओं में वेश्यावृत्ति और मादक पदार्थों की तस्करी की प्रवृत्ति बढ़ती देखी गई. रिपोर्ट के सह-लेखक जॉन मैकघाई का कहना है, "आज मुक्त व्यापार मुक्त नहीं है यह विकासशील देशों के लिए अनुकूल नहीं है". उनका कहना है, "यह सबके लिए बराबर नहीं है और ग़रीबों को सबसे ज़्यादा भुगतना पड़ता है". लेकिन ब्रिटेन के सूचना विकास मंत्री गैरेथ टॉमस का कहना है, "क्रिश्चियन एड्स लगता है समय से पीछे चल रही है. हमारी सहायता निजीकरण जैसे शर्तों से जुड़ी हुई नहीं है". |
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