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नाराज़ हैं हरियाणा के किसान | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
गांव - चौपाल की राजनीति के लिए मशहूर हरियाणा में कई बार तो चौपाल पर ही उम्मीदवारों के भाग्य का फैसला हो जाता है. फरवरी के महीने में यहाँ किसानों को न बुआई की चिंता है और न ही कटाई की. सो यहाँ चुनावी माहौल पर घंटों बातचीत लाज़मी है. अब जींद जिले के कान्हखेड़ा गाँव को ही लें. गेहूँ और सरसों की फसल खेतों में लहलहा रही है और बड़े-बुजुर्ग के साथ-साथ बच्चे और नौजवान सभी कल होने वाले मतदान और उसके असर पर बातचीत में लगे हैं. हरियाणा में 80 फीसदी किसान हैं. किसानों की पहली चिंता फसल की होती है. हरियाणा में रबी की फसल जैसे गेहूँ, सरसों की सिंचाई के लिए नहर और ट्यूवेल पर निर्भर करते हैं. बड़ी दिक्कत यह है कि नहरों में सिंचाई के लिए पहले पानी 20 से 30 दिनों में छोड़ा जाता था जो अब बढ़ाकर 40 से 45 दिन हो गया है. ट्यूबवेल से सिंचाई डीज़ल की बढ़ती कीमत की बज़ट से फायदेमंद नहीं रही है. नहर की लहर वैसे हरियाणा में नहर के सहारे अपने पक्ष में लहर तैयार करने की कोशिश राजनीतिक पार्टियाँ दशकों से करती आ रही है. ऐसी ही एक नहर है सतलुज-यमुना जोड़ नहर.
कांग्रेस की विरोधी पार्टियाँ राज्य में इसे बड़े मुद्दे के तौर पर पेश करती रही हैं. 1987 में मौजूदा मुख्यमंत्री ओम प्रकाश चौटाला के पिता देवीलाल इसी मुद्दे के सहारे वापस सत्ता में आए थे लेकिन तमाम राजनीतिक और न्यायिक दखल के बावजूद दक्षिणी हरियाणा के ज़िलों जैसे महेन्द्रगढ़, नारगौल,रेवाडी, भिवानी और फतेहाबाद के सभी किसानों को अबतक इस नहर के पानी से लबालब होने का इंतजार है. हालाँकि अब इस लंबे इंतजार ने राजनीतिक पार्टियों से इन किसान मतदाताओं का मोहभंग कर दिया है. कड़ी मेहनत के बावजूद किसानों की दिक्कत महज बिजली, पानी, खाद की जद्दोजहद तक सीमित नहीं है. हरियाणा में न केवल जरूरत से ज़्यादा अनाज है बल्कि वे घाटे वाले राज्यों की जरूरत पूरी करके केंद्र को भी अनाज देता है. दिक्कत तो तब होती है जब मंडी में अनाज का दाम बढ़ता हुआ नज़र नहीं आता. हाँ किसान, न किसान किसानों की अहमितयत को राजनीतिक पार्टियाँ भी समझती है. कोई भी पार्टी किसान और उससे जुड़े मुद्दों पर बात और दावे करने से नहीं चूकती है. राज्य के मुख्यमंत्री ओम प्रकाश चौटाला की सरकार अपने भाषणों में दिल्ली से लगने वाले गुड़गाँव और फरीदाबाद को जापान की शक्ल देने की बात करती है और जब वोट माँगने की बारी आती है तो किसानों की माला जपने लगती है. इंडियन नेशनल लोकदल पार्टी से तीन बार विधायक रह चुके चौधरी सुरिंदर सिंह बरवाला कहते हैं, "जब 1991 में हमारी पार्टी की सरकार हटी थी, उस समय हम 24 घंटे बिजली सप्लाई की व्यवस्था करके गए थे पर इसके बाद पाँच साल के कांग्रेस शासन और साढ़े तीन साल के बंसीलाल के शासनकाल में राज्य की बिजली व्यवस्था एकदम चरमरा गई थी." वो दावा करते हैं, "अब हम इसे काफ़ी हद तक सही कर चुके हैं और बिजली की समस्या लगभग ख़त्म हो गई है." उधर सुरिंदर सिंह किसानों को समय से खाद उपलब्ध न होने का ठीकरा केंद्र के सिर पर फोड़ना चाहते हैं. उन्होंने कहा, "राज्य को खाद उपलब्ध कराना केंद्र की ज़िम्मेदारी है. हमने दो-तीन महीनों से खाद के लिए चेक संबंधित एजेंसियों के पास जमा कर रखे हैं पर खाद समय से नहीं दी जा रही है." जींद का कान्हाखेड़ा गाँव हो या इस जैसा हरियाणा का कोई और गाँव, किसानों की समस्या एक ही जैसी है. बदलते वक्त में उनके खेत-खलिहान और परिवार की क्या शक्ल होगी और अगली बार समर्थन मूल्य क्या होगा जिससे कि खाद, पानी, और बिजली खरीदने के बाद बुरे वक्त के लिए दो पैसा जमा किया जा सके, यह शायद सबसे अहम सवाल है....भले ही सरकार के लिए न हो, पर किसानों के लिए तो है. |
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