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किसानों की पीड़ा कौन दूर करेगा | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों के लिए प्रचार अंतिम सप्ताह में पहुँचते ही दोनों प्रमुख गठबंधन जनता से बड़े-बड़े वादे कर रहे हैं, लेकिन जनता की असली समस्या पर किसी का ध्यान नहीं है. पूर्वी महाराष्ट्र, जो विदर्भ के नाम से जाना जाता है, यहाँ के वर्धा ज़िले पर नज़र डालते ही ये बात साफ हो जाती है. महात्मा गाँधी ने 1930 के दशक में स्वतंत्रता आंदोलन को तेज़ करने के लिए वर्धा ज़िले को चुना था जो आगे चलकर दुनिया में सेवाग्राम वर्धा के रुप में मशहूर हुआ, आज वही वर्धा सिर्फ़ बुरे कारणों से ही सुर्खियों में है. विदर्भ के अन्य क्षेत्रों की तरह ही यहाँ भी कपास और सोयाबीन की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है, लेकिन पिछले तीन सालों में वर्धा ज़िले में हालात इतने बिगड़ गए हैं कि सरकारी आंकड़ों के अनुसार कम से कम 50 किसान कर्ज़ के बोझ के कारण आत्महत्या कर चुके हैं. कर्ज़ का बोझ पिछले कुछ सालों के दौरान यहाँ कम बारिश और सरकार की बेरुखी ने इस क्षेत्र के गरीब किसानों को सरकारी बैंकों और साहूकारों से कर्ज़ लेने पर मजबूर कर दिया. अच्छी फसल न होने से वर्धा के किसान कर्ज़ चुकाने में असमर्थ हैं, और वसूली के दौरान घर पर ताला लगने के डर ने ही किसानों को आत्महत्या तक करने पर मजबूर कर दिया. शहर से 20 किलोमीटर दूर तलेगाँव के 39 वर्षीय रमेश देशमुख ने कर्ज़ न चुका पाने से परेशान होकर दो महीने पहले ज़हर पीकर अपना जीवन समाप्त कर लिया था. उनके बड़े भाई देवीदास ने बीबीसी को बताया कि उसके पास कोई विकल्प ही नहीं बचा था, “रमेश के दो छोटे बच्चे हैं. वसूली के लिए बैंक वालों से मैंने खुद कहा था कि आप फसल होने के बाद आना, लेकिन वे नहीं माने.” सहायता रमेश के घर बाद में सहायता राशि एक लाख रुपए का चेक लेकर काँग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी पहुँची थीं.
लेकिन अन्य प्रभावित परिवार इतने खुशक़िस्मत नहीं हैं. वायेगांव के 30 वर्षीय विजय हैलोंडे अपने घर में सबसे बड़ा था और बहन की शादी नहीं करवा पाने से हताश विजय ने आत्महत्या कर ली. उनके गाँववालों का कहना है कि विजय के परिवार की सुध किसी ने नहीं ली. दूसरी तरफ चुनावों के समय में ज़िला प्रशासन की ओर से कलेक्टर सहित कोई भी वरिष्ठ अधिकारी आंकड़े उपलब्ध करवाने के सिवाए कुछ भी कहने के लिए तैयार नहीं था. वर्धा सहकारी बैंक के प्रबंध निदेशक एजी बेनोडीकेर ने कर्ज़ वसूली के दौरान किसी भी तरह की सख्ती से इनकार करते हुए कहा “अगर हम सख्ती कर रहे होते तो हमारी वसूली की दर इतनी कम नहीं होती. हम हर किसान को तीन मौके देते हैं कर्ज़ चुकाने के लिए. उसके बाद भी हम केवल लिखित कार्यवाही ही करते हैं|”. लेकिन अधिकतर गाँववालों की शिकायत कर्ज़ वसूली को तरीके को ही लेकर है. दूसरी तरफ काँग्रेस-राष्ट्रवादी काँग्रेस और शिवसेना-भाजपा, दोनों ही गठबंधनों ने इस चुनाव के लिए भी किसानों से बड़े-बड़े वादे तो कर दिए हैं. दोनों गठबंधनों ने मुफ्त बिजली और अधिक समर्थन मूल्य के वादे तो अपने-अपने घोषणापत्रों मे किए हैं, लेकिन इस चुनावी मौसम के बाद गरीब किसानों के बारे में सोचने का समय किसके पास होगा. |
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