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तीन महानगरों में आज से 'कैस' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत के तीन महानगरों मुंबई, दिल्ली और कोलकाता में नए साल के पहले दिन से टेलीविज़न के लिए नई तकनीक 'कंडीशनल एक्सेस सिस्टम' यानी 'सीएएस' या 'कैस' की शुरुआत हो रही है. कंडीशनल एक्सेस सिस्टम (कैस) को फ़िलहाल इन तीनों महानगरों के चुनिंदा इलाक़ों में ही लागू किया जा रहा है. चेन्नई में इसे पहले से ही लागू किया जा चुका है. इस तकनीक लागू हो जाने के बाद दर्शकों को 'पे चैनल' देखने के लिए अपने टेलीविज़न के साथ एक सेट टॉप बॉक्स लगाना होगा. हालांकि 'फ़्री टू एयर' चैनल इसके बिना भी देखे जा सकेंगे. जिसमें दूरदर्शन के चैनल और कई समाचार चैनल शामिल हैं. 'पे चैनलों' यानी भुगतान के साथ देखे जा सकने वाले चैनलों के लिए ग्राहकों को प्रति चैनल के हिसाब से भुगतान करना होगा. माना जा रहा है कि इस तकनीक के लागू होने से केबल टेलीविज़न ऑपरेटरों का दबदबा ख़त्म हो जाएगा और दर्शकों को अपनी पसंद के चैनल देखने के लिए कम पैसे ख़र्च करने होंगे. हालांकि शुरुआत में सेट टॉप बॉक्स लगाने के लिए शुरुआत में कोई एक हज़ार रुपए खर्च करने होंगे और इसके बाद कोई सौ रुपयों का भुगतान महीने करना होगा. इसके अलावा हर पसंदीदा 'पे चैनल' के लिए पाँच रुपए का शुल्क देना होगा. इस समय 'फ़्री टू एयर' और 'पे चैनलों' के लिए केबल ऑपरेटर अपनी मर्ज़ी के अनुसार पैसे वसूलते थे. जो अलग-अलग इलाक़ों में दो सौ रुपयों से लेकर चार सौ रुपयों तक होता था. कैस से दर्शक तय कर सकेंगे कि वे कौन से चैनल देखना चाहते हैं कौन से नहीं. मतभेद हालांकि सरकार ने वर्ष 2003 में केबल टेलीविज़न एक्ट बनाया था लेकिन इसके विरोध के कारण इसे लागू नहीं किया जा सका था. लेकिन एक याचिका पर फ़ैसला देते हुए हाईकोर्ट ने इसे लागू करने के आदेश दिए थे और इसके बाद सरकार ने इसे नए वर्ष के शुरु से लागू करने का फ़ैसला किया था. कैस की वकालत करने वालों का कहना है कि इससे दर्शकों और चैनलों के बीच एक पारदर्शिता आएगी और दर्शक फ़ायदे में रहेगा. लेकिन इसका विरोध करने वालों का कहना है कि ज़्यादा चैनल देखने का शौक रखने वाले लोगों के लिए कैस महंगा साबित होगा. दूसरी तरफ़ 'डायरेक्ट टू होम' यानी डीटीएच तकनीक जिस तरह से लोकप्रिय हो रही है उसके चलते भी कैस पर सवाल उठाए जा रहे हैं. डीटीएच सिस्टम के लिए फ़िलहाल डिश टीवी और टाटा स्काई कंपनियाँ बाज़ार में है. ये दोनो कंपनियाँ चार हज़ार रुपयों के आरंभिक खर्चों के बाद तीन सौ रुपए मासिक पर ज़्यादातर चैलन दर्शकों तक पहुँचा रही हैं. | इससे जुड़ी ख़बरें डिजिटल टेलीविज़न की तेज़ रफ़्तार20 सितंबर, 2006 | पत्रिका 'वयस्कों वाली फ़िल्में टीवी पर नहीं'24 अगस्त, 2006 | पत्रिका संसद के लिए विशेष टीवी चैनल28 जून, 2006 | भारत और पड़ोस धमकियों से फिर बंद हुआ केबल टीवी12 मई, 2006 | पत्रिका कश्मीर में फिर शुरु हुआ केबल टीवी11 मई, 2006 | पत्रिका धमकी के बाद कश्मीर में केबल टीवी बंद10 मई, 2006 | भारत और पड़ोस वीडियो-टीवी भी सेंसर सर्टिफ़िकेट लें: खेर28 जुलाई, 2004 | पत्रिका | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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