|
सीनेट में परमाणु समझौता बहुमत से पास | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अमरीकी संसद के उच्च सदन सीनेट ने दस घंटे की बहस के बाद भारत-अमरीका परमाणु समझौते को भारी बहुमत से पारित कर दिया है. संसद के निचले सदन प्रतिनिधि सभा ने जुलाई में इस समझौते को पारित किया था. बीबीसी संवाददाता शाहज़ेब जीलानी के अनुसार सीनेट में 85 सदस्यों ने इसके पक्ष में और केवल 12 ने इसके ख़िलाफ़ वोट दिया. बीबीसी संवाददाता के अनुसार अब दोनो सदनों में पारित विधेयकों को मिलाया जाएगा और फिर इसे अमरीकी कांग्रेस यानी दोनो सदनों वाली पूरी संसद के समक्ष मतदान के लिए रखा जाएगा. अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के हस्ताक्षर के बाद ही ये विधेयक अमल में आएगा और इस पूरी प्रक्रिया में कुछ महीने का समय लग सकता है. दक्षिण-पूर्वी एशिया का दौरा कर रहे अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने एक बयान में इसका स्वागत करते हुए इसे भारत-अमरीका रणनीतिक साझेदारी को मज़बूत बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया है. उन्होंने कहा कि इससे भारत विश्व में परमाणु अप्रसार के पक्षधरों की मुख्यधारा में आ जाएगा. राष्ट्रपति बुश का कहना था, "जैसे-जैसे भारत की अर्थव्यवस्था बढ़ती है, इस साझेदारी से भारत की ऊर्जा की ज़रूरतें पूरी होंगी लेकिन न प्रदूषण बढ़ेगा और न ग्रीन हाऊस गैसें बढ़ेंगी." ऊर्जा या सामरिक ज़रूरत? भारत-अमरीका परमाणु सहमति असैनिक गतिविधियों - विशेष तौर पर ऊर्जा क्षेत्र से संबंधित है. इसके तहत भारत असैनिक कार्यों के लिए परमाणु ईंधन और तकनीकी जानकारी अमरीका और परमाणु ईंधन सप्लाई करने वाले देशों से पा सकेगा. इसके बदले में भारत को अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी को अपने कुछ परमाणु केंद्रों का निरीक्षण करने की इजाज़त देनी होगी. बीबीसी संवाददाता शाहज़ेब जीलानी का कहना है कि अमरीका वाणिज्य और रक्षा क्षेत्रों में भारत से क़रीबी रिश्ते चाहता है. उनके अनुसार अमरीका की रणनीति ये है कि एशिया में भारत चीन के प्रभाव का सामना करे और उस दृष्टि से सक्षम बने. उनका ये भी मानना है कि भारत की तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था को ऊर्जा की ज़रूरत है और इसलिए उसके लिए ये समझौता अहम है. हालाँकि पाकिस्तान इसे अमरीका की भेदभावपूर्ण नीति बताता आया है लेकिन शाहज़ेब जीलानी के मुताबिक अमरीका भारत को परमाणु अप्रसार के क्षेत्र में पाकिस्तान से ज़्यादा ज़िम्मेदार देश मानता है और उसी नीति के मुताबिक चल रहा है. रिपब्लिकन पार्टी ने ज़ोर लगाया पहले इस बारे में संशय था कि ये विधेयक संसद के 'लेम डक' यानि आख़िरी सत्र में लाया भी जाएगा या नहीं. लेकिन बुधवार को अमरीका की सीनेट में बहुमत के नेता बिल फ़्रिस्ट ने समझौते पर सीनेट में चर्चा करने के सर्वसम्मति से हुए फ़ैसले के बारे में घोषणा की. सीनेट के अल्पमत के नेता हैरी रीड ने भी रिपब्लिकन पार्टी की बात का समर्थन किया. उनका कहना था, "हम सत्र की समाप्ति से पहले इस विधेयक पर काम समाप्त करेंगे. यही बहुमत के नेता ने कहा है और मैं जिस भी तरह ज़रूरी हुआ, उनके साथ सहयोग करुँगा." अमरीकी सीनेट के विदेश मामलों की समिति के अध्यक्ष रिचर्ड लुगर ने विधेयक को ज़ोरदार समर्थन करते हुए कहा, "मैं सभी सहयोगियों से अनुरोध करुँगा कि वे भारत-अमरीका समझौते की पुष्टि करें. इस विधेयक के पारित होने से अमरीका भारत के साथ शांतिपूर्ण परमाणु सहयोग कर पाएगा और संसद की प्राथमिकताओं के अनुसार अमरीकी सुरक्षा और अप्रसार प्रयास भी सुनिश्चित हो पाएँगे." उनका ये भी कहना था, "ये समझौता भारत को और परमाणु परीक्षण न करने और अमरीका के साथ परमाणु प्रसार रोकने में काम करने के लिए प्रोत्साहित करेगा." | इससे जुड़ी ख़बरें डेमोक्रेट खेमे में जश्न का माहौल08 नवंबर, 2006 | पहला पन्ना रम्सफ़ेल्ड को हटाने की घोषणा08 नवंबर, 2006 | पहला पन्ना अमरीकी उपराष्ट्रपति को मंज़ूरी की उम्मीद23 जून, 2006 | पहला पन्ना परमाणु सहमति के पक्ष में मुहिम तेज़14 जून, 2006 | पहला पन्ना 'परमाणु सहमति में फेरबदल से मुश्किलें'25 मई, 2006 | पहला पन्ना | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
| |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||