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शुक्रवार, 17 नवंबर, 2006 को 07:06 GMT तक के समाचार
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सरकार, कांग्रेस की सतर्कतापूर्ण प्रतिक्रिया
सीनेट
सोनिया गाँधी ने कहा कि बुश-मनमोहन समझौते के बाहर लगाई शर्तें भारत को मंजूर नहीं होंगी
भारत ने अमरीकी सीनेट में भारत-अमरीका परमाणु समझौते की मंज़ूरी का स्वागत करते हुए उम्मीद जताई है कि अब इसका जो अंतिम स्वरूप सामने आएगा वह जुलाई 2005 के समझौते के क़रीब होगा.

जहाँ अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने इसे भारत-अमरीका साझेदारी में अहम कदम बताया है वहीं भारत की कांग्रेस पार्टी ने इस पर सतर्कतापूर्ण प्रतिक्रिया दी है.

संयुक्त जनतांत्रिक गठबंधन और कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने स्पष्ट किया है कि भारत मूल समझौते के बाहर जाकर लगाई शर्तें मंज़ूर नहीं करेगा.

उधर अमरीकी राजदूत डेविड मलफ़र्ड का कहना था कि अमरीका भारत की चिंताओं के बारे में सचेत है.

'अंतिम स्वरूप का इंतज़ार करें'

 उम्मीद है कि अमरीकी संसद के दोनो सदनों की बैठक के बाद विधेयक का जो स्वरूप सामने आएगा वह जुलाई 2006 के भारत-अमरीका संयुक्त बयान और मार्च 2006 के सेपारेशन प्लान से मेल खाता होगा
विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी

विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी ने अपने बयान में कहा है कि इससे अमरीका की दोनो प्रमुख पार्टियों में इस पहल के लिए समर्थन के बारे में पता चलता है.

उन्होंने अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश और अमरीकी विदेश मंत्री कोंडोलीज़ा राइस के ये विधेयक पारित कराने के प्रयासों की सराहन भी की है.

उनका कहना था, "हमें उम्मीद है कि अमरीकी संसद के दोनो सदनों की बैठक के बाद विधेयक का जो स्वरूप सामने आएगा वह जुलाई 2006 के भारत-अमरीका संयुक्त बयान और मार्च 2006 के सेपारेशन प्लान से मेल खाता होगा."

उनका ये भी कहना था कि ऐसा होने के बाद भारत और अमरीका के बीच पूर्ण असैनिक परमाणु सहयोग अस्तित्व में आ सकेगा और भारत की सुरक्षा में भी इसका योगदान होगा.

साथ ही प्रणव मुखर्जी के बयान में ये भी कहा गया है कि भारत को इस विधेयक पर अंतिम राय बनाने से पहले इसके अंतिम स्वरूप का इंतज़ार करना चाहिए.

'महत्वपूर्ण कदम'

 जैसे-जैसे भारत की अर्थव्यवस्था बढ़ती है, इस साझेदारी से भारत की ऊर्जा की ज़रूरतें पूरी होंगी लेकिन न प्रदूशण बढ़ेगा और न ग्रीन हाऊस गैसें बढ़ेंगी
राष्ट्रपति बुश

अपने दक्षिण-पूर्वी एशिया के दौरे के दौरान अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने एक बयान में सीनेट के फ़ैसले का स्वागत किया और इसे भारत-अमरीका रणनीतिक साझेदारी को मज़बूत बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया है.

उन्होंने कहा कि इससे भारत विश्व में परमाणु अप्रसार के पक्षधरों की मुख्यधारा में आ जाएगा.

राष्ट्रपति बुश का कहना था, "जैसे-जैसे भारत की अर्थव्यवस्था बढ़ती है, इस साझेदारी से भारत की ऊर्जा की ज़रूरतें पूरी होंगी लेकिन न प्रदूशण बढ़ेगा और न ग्रीन हाऊस गैसें बढ़ेंगी."

सोनिया की सतर्कतापूर्ण प्रतिक्रिया

 यूपीए और कांग्रेस पार्टी का स्पष्ट रुख़ ये है कि 18 जुलाई 2005 के बुश-मनमोहन समझौते के बाहर यदि कोई शर्तें लगाई जाती हैं तो ये भारत को मंजूर नहीं होगा
सोनिया गाँधी

सीनेट के भारत-अमरीका परमाणु समझौते को पारित करने पर सोनिया गाँधी का कहना था कि अमरीकी संसद के दोनो सदनों ने इस विषय में अपनी एक राय अभी बनानी है.

लेकिन उन्होंने ये भी कहा, "यूपीए और कांग्रेस पार्टी का स्पष्ट रुख़ ये है कि 18 जुलाई 2005 के बुश-मनमोहन समझौते के बाहर यदि कोई शर्तें लगाई जाती हैं तो ये भारत को मंजूर नहीं होगा."

सोनिया गाँधी का कहना था कि यदि पारित विधेयकों में ऐसी कोई शर्तें हैं जो भारत को स्वीकार्य नहीं हैं तो उन्हें समझौते से बाहर रखा जाना चाहिए.

'घातक संशोधन विफल हुए'

उधर एक भारतीय टीवी चैनल के साथ बातचीत में भारत में अमरीकी राजदूत डेविड मलफ़र्ड का कहना था कि अमरीका भारत की चिंताओं के बारे में सचेत है.

उनका कहना था कि प्रतिनिधि सभा और सीनेट के विधेयकों की शब्दावली में कोई ख़ास अंतर नहीं है.

उन्होंने इस ओर भी ध्यान दिलाया कि ऐसी शर्तें या संशोधन लगाने के प्रयास विफ़ल हो गए हैं जो भारत को अस्वीकार हो सकती थी और जिनसे ये विधेयक धरा का धरा रह जाता.

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