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'सरकार विदेश नीति पर विफल रही' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत के प्रमुख वामपंथी दल सीपीएम के वरिष्ठ नेता और पोलित ब्यूरो के सदस्य सीताराम येचुरी ने कहा है कि मनमोहन सिंह सरकार स्वतंत्र विदेश नीति के मामले में अब तक विफल रही है. ग़ौरतलब है कि वामपंथी दलों के समर्थन पर ही संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन(यूपीए) की सरकार टिकी हुई है. सीपीएम नेता येचुरी ने कहा कि पड़ोसी देशों के साथ प्रगाढ़ संबंधों से ही भारत विकासशील देशों के नेता के रूप में उभर सकता है. साप्ताहिक कार्यक्रम आपकी बात बीबीसी के साथ में सीताराम येचुरी ने स्पष्ट किया कि भारत अमरीका परमाणु समझौते के संबंध में प्रधानमंत्री के संसद में दिए गए बयान में वामपंथी दल कोई बदलाव स्वीकार नहीं करेंगे. उनका कहना था कि संसद को विश्वास में लिए बिना यदि कोई बदलाव किया जाता है तो वामपंथी दलों का विरोध बढ़ेगा और सरकार भी इसके परिणामों को जानती है. हालांकि उन्होंने उम्मीद जताई कि सरकार भी ऐसे किसी बदलाव को स्वीकार नहीं करेगी. भारत-पाक संबंध भारत-पाक संबंधों के सवाल पर उन्होंने कहा कि मनमोहन सरकार यदि यह सोच है कि अमरीका भारत का उसी तरह समर्थन करेगा जिस तरह वह पाकिस्तान का करता रहा है तो इतिहास और अनुभव के आधार पर हम कह सकते हैं कि सरकार मुगालते में है. सीताराम येचुरी से एक श्रोता ने सवाल पूछा कि सरकार पर वामपंथी दलों का दवाब प्रभावी नहीं रहा है, तो उनका कहना था कि वो इस विचार को स्वीकार नहीं करते हैं. उन्होंने कहा कि 1990 के दशक में उदारीकरण के जनक माने जानेवाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह यह न कहते कि मुनाफ़े में चल रहे सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों का निजीकरण नहीं किया जाएगा. येचुरी ने कहा कि अगर वामपंथी दलों का दवाब नहीं होता तो अब तक परमाणु समझौता हो गया होता. उन्होंने नेपाल में होनेवाले समझौते का स्वागत किया और कहा कि वहाँ भारत सरकार को और सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए थी. लेकिन उन्होंने मौजूदा नीति पर संतोष व्यक्त किया. |
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