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पोलित ब्यूरो ने बसु का अनुरोध ठुकराया | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता ज्योति बसु ने ख़राब स्वास्थ्य के कारण पार्टी पोलित ब्यूरो को छोड़ने की इच्छा जताई थी. लेकिन पार्टी ने उनके इस अनुरोध को ठुकरा दिया है. हालांकि दुनियाभर में कम्युनिस्ट नेता अवकाशग्रहण करने को लेकर ज़्यादा उत्साहित नहीं रहते हैं और ऐसा लगता है कि भारतीय कामरेड भी उसी परंपरा का पालन कर रहे हैं. पोलित ब्यूरो ने पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु को सन 2008 तक राजनीति में सक्रिय रहने को कहा है सीपीएम के महासचिव प्रकाश कारत ने कहा,'' हमने उनसे कहा है कि वो 2008 में होनेवाली अगली पार्टी कांग्रेस तक सक्रिय रहें. उसके बाद हम स्थिति की समीक्षा करेंगे.'' बसु की भूमिका बाइस साल तक पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री रहनेवाले 93 वर्षीय ज्योति बसु इस फ़ैसले से कोई बहुत उत्साहित नहीं हैं. उन्होंने पत्रकारों से कहा,'' मैं कभी कभी बहुत कमज़ोरी महसूस करता हूँ.'' हाल में ज्योति बसु अपने घर में गिर गए थे जिससे उनके दाहिने पैर में चोट लग गई थी. जब छह साल पहले वो मुख्यमंत्री पद से हटे थे तो पोलित ब्यूरो चाहता था कि देश के अन्य हिस्सों में पार्टी के विस्तार में उनका इस्तेमाल किया जाए. लेकिन ज्योति बसु ने दिल्ली के बजाए कोलकाता में ज़्यादा समय बिताना पसंद किया. वामपंथी मामलों के विशेषज्ञ आशीष बिस्वास का कहना है,'' पश्चिम बंगाल के कामरेडों की यह बड़ी समस्या है कि वो दिल्ली में ज़्यादा वक्त बिताना पंसद नहीं करते हैं.’’ सन् 1996 में जब काँग्रेस की हार हुई तो तीसरे मोर्चे की सरकार बनवाने में वामपंथी दलों की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका रही थी. एक समय तो ज्योति बसु को प्रधानमंत्री बनाए जाने पर लगभग सहमति बन गई थी. लेकिन पार्टी ने उन्हें ये पेशकश स्वीकार करने की अनुमति नहीं दी. बाद में स्वयं ज्योति बसु ने इसे एक ‘ऐतिहासिक भूल’ बताया था. |
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