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नक्सलवादी आंदोलन की चुनौतियाँ | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पिछली शताब्दी के सातवें दशक में वैचारिक रूमानियत का प्रतीक बना नक्सल आंदोलन एक बार फिर दोराहे पर है. चार दशक में बेशक दुनिया काफी बदल गई है. कालेज छोड़कर इस उग्र वामपंथी आंदोलन में कूदने वाली पीढी के बच्चे मैकडॉनल्ड और पिज्ज़ाहट में बड़े हो रहे हैं. एक तरह से यह सपने के ध्वस्त होने जैसा है. और यह भी कि क्या नक्सलवाड़ी से फूटा आंदोलन महज एक फैंटेसी थी, तात्कालिक उत्तेजना थी, काफ़ी हद तक यह सच साबित हो रहा है. इसके बावजूद इस आंदोलन ने बीते चार दशकों से देश की राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित किया है. तमाम उतार चढ़ाव से गुजरने के बाद नक्सल संगठनों ने अपनी ताकत में भी ख़ासा इजाफ़ा किया है. केंद्रीय गृह मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक देश के 55 से ज़्यादा ज़िलों में उनका असर है. आंध्रप्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड और उड़ीसा के अनेक जिलों में तो उनकी समानांतर सरकार ही चल रही हैं. इन इलाक़ों में नक्सली संगठन सत्ता के साथ-साथ तमाम राजनीतिक दलों के लिए भी चुनौती बने हुए हैं. वैचारिक उग्रता के साथ ही नक्सल संगठनों की हिंसक गतिविधियाँ क़ानून के लिए भी चुनौती रही हैं. अलग पृष्ठभूमि
नक्सली संगठनों की पृष्ठभूमि भी अलग रही है. काम करने का तरीका अलग रहा है और इनके क्षेत्र भी अलग रहे हैं. नक्सल आंदोलन उल्फ़ा, बोडो या एनएससीएन की तरह का पृथकवादी आंदोलन नहीं है. और न ही हाल की नेपाल की माओवादी हिंसा के पहले तक नक्सल आंदोलन को देश की सीमाओं के लिए उल्फ़ा, बोडो या एनएससीएन की तरह ख़तरा माना जाता था. उल्फ़ा, बोडो और एनएससीएन की तुलना में नक्सली संगठनों को स्थानीय स्तर पर समर्थन भी कहीं ज़्यादा है. इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि नक्सल संगठनों ने बिलकुल निचले स्तर से अपनी जड़ें जमानी शुरू कीं. मसलन छत्तीसगढ़ में नक्सलियों ने सबसे पहले आदिवासियों को बिचौलियों और तेंदूपत्ता ठेकेदार के ख़िलाफ़ एकजुट किया. बाद में उनकी ताकत बढ़ी और वे सरकारों के लिए चुनौती बन गए. दूसरी ओर नक्सली हिंसा को लेकर सरकारें हमेशा दुविधा में रही हैं कि इसे क़ानून व्यवस्था का मामला माना जाए या सामाजिक-आर्थिक समस्या. लेकिन दूसरे अलगाववादी संगठनों के मुक़ाबले नक्सल संगठनों का असर देश के बड़े हिस्से में है. कम से कम नौ राज्य नक्सली हिंसा से जूझ रहे हैं. उत्तरांचल और पूर्वी उत्तर प्रदेश जैसे नए इलाक़ों में नक्सल संगठनों ने पैर पसार लिए हैं. इस विस्तार के बावजूद नक्सल संगठनों के अंतरविरोध कम नहीं हुए हैं. भटकाव नक्सल आंदोलन शुरू से भटकाव से गुजरता रहा है. यहाँ तक कि नक्सल आंदोलन के जनक माने जाने वाले चारु मजूमदार भी इससे बच नहीं पाए. 27 जुलाई, 1972 में संदिग्ध हालात में पुलिस हिरासत में चारू मजूमदार की मौत के बाद उनके अपने साथियों ने ही उन्हें कठघरे में खड़ा कर दिया था. चारू मजूमदार ने 1964 में सीपीआई के विभाजन के बाद 1965 से 1967 के दौरान पार्टी के क्रांतिकारी साथियों को आठ पत्र लिखे और क्राँति की ज़रूरत बताई थी. यही पत्र 1961 में सीपीआई (एमएल) के गठन के बाद उसका घोषणा पत्र बन गए. पर मजूमदार की मौत के बाद सीपीआई (एमएल) टूट गई. यही नहीं मजूमदार के करीबी रहे कानू सान्याल ने ही उन्हें अराजकतावादी करार दिया था. यही हाल पीपुल्स वार के जनक कोंडापल्ली सीतारमैया का हुआ था जिन्हें उनके ही दल के गणपति ने पार्टी से बेदखल कर पार्टी की कमान संभाल ली थी. हालत यह हो गई कि दो वर्ष पहले 12 अप्रैल, 2001 में जब विशाखापत्तनम में अपनी बेटी के घर में आम जीवन जी रहे कोंडापल्ली सीतारमैया की जब 70 वर्ष की उम्र में मौत हुई तो दर्जन भर क्राँतिकारी भी नहीं जुटे. तो दूसरी ओर विनोद मिश्र जैसे नेता भी हुए जिन्हें दो दशक तक भूमिगत रहने के बाद समझ आया कि रास्ता तो संसदीय जनपथ से ही होकर गुजरता है. अपनी मौत से पहले विनोद मिश्र ने आंध्रप्रदेश के नक्सलवादियों को बेइमान क़रार कर दिया था. जाहिर है, रास्ते की तलाश में नक्सली संगठन टूटते और बिखरते और जुड़ते रहे हैं. नक्सल आंदोलन ने हाल में बड़ी करवट ली. पिछले साल अक्टूबर में जनशक्ति और पीपुल्सवार जैसे ख़तरनाक माने जाने वाले नक्सली संगठनों के पाँच बड़े नेता रामकृष्ण के नेतृत्व में आंध्र प्रदेश सरकार से बात करने के लिए क़रीब दो दशक बाद जंगल से बाहर निकले. लेकिन, वार्ता नाकाम होने के बाद ये नक्सली नेता वापस जंगल में लौट गए. |
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