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काफ़ी मज़बूत है बंगाल का 'क़िला' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पश्चिम बंगाल में लगातार छह बार विधानसभा चुनाव जीतना और इनमें से भी आख़िरी बार एक नए मुख्यमंत्री के तहत! इसके बावजूद सीटें बढ़ ही रही हैं. हर चुनाव के साथ सत्तारूढ़ वाम मोर्चे के प्रदर्शन में निखार और अब हाल में हुए लोकसभा चुनाव में राज्य की 42 में से 35 सीटें जीतकर एक नया रिकॉर्ड! जी हाँ, ये सभी बातें भारत में वामपंथियों के सबसे मज़बूत 'किले' पश्चिम बंगाल के संदर्भ में ही हो रही हैं. तो क्या देश के बाक़ी राज्यों की तरह यहाँ सत्ता विरोधी कोई लहर नहीं चलती? इसका जवाब ये है कि पश्चिम बंगाल में 27 वर्षों से शासन कर रहे माकपा की अगुआई वाले वाममोर्चे ने अपने काम-काज और सांगठनिक ताक़त की बदौलत राज्य में कभी कोई ऐसी लहर ही नहीं पैदा होने दी. कोई लहर चली भी तो चुनाव पर उसका कोई असर नहीं पड़ा. कामयाब नुस्खा वाममोर्चे के इतने लंबे समय तक सत्ता में बने रहने की सबसे बड़ी वजह ये है कि उसने तीन स्तर वाली पंचायत प्रणाली के ज़रिए सत्ता का ज़बरदस्त विकेंद्रीकरण किया है. लंबे समय तक सत्ता हाथ में होने की वजहव से उसके कुछ नेताओं की जेबें ज़रूर भारी हुई हैं और विलास के भौतिक साधनों के प्रति उनमें आकर्षण भी बढ़ा है. लेकिन ग्रामीण इलाक़ों में उसने विकास परियोजनाओं की निगरानी और धन ख़र्च करने के तमाम अधिकार पंचायतों को सौंप रखे हैं. विकास में आम लोगों की भागीदारी बढ़ाकर उसने एक ओर तो अपनी सांगठनिक ताक़त काफ़ी मज़बूत कर ली है तो दूसरी ओर इससे सत्ता विरोधी लहर को पनपने का मौक़ा ही नहीं मिला.
ऐसा नहीं है कि यहाँ राज्य में गाँवों का भरपूर विकास हुआ है और वहाँ बुनियादी सुविधाएँ मुहैया हैं. लेकिन लोगों को पता है कि अपने सीमित संसाधनों के बावजूद सरकार इस दिशा में गंभीर प्रयास कर रही है. यही वजह है कि किसानों की आत्महत्या की कई घटनाओं के बावजूद यहाँ वाममोर्चे का वैसा हश्र नहीं हुआ जैसा आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू की तेलुगुदेशम पार्टी का हुआ. पंचायतों के अलावा सरकार ने राज्य में भूमि सुधार के क्षेत्र में भी काफ़ी काम किया है. राज्य के लाखों भूमिहीनों को सरकारी ज़मीनों के पट्टे दिए गए हैं. राज्य की पंचायतों की कार्यप्रणाली और भूमि सुधार के तरीक़े के अध्ययन के लिए देश ही नहीं बल्कि विदेशों से भी सरकारी और ग़ैर सरकारी प्रतिनिधि आते रहते हैं. ज्योति बसु के बाद मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने वाले बुद्धदेब भट्टाचार्य ने आते ही 'डू इट नाउ' का जो नारा दिया था, अब धीरे-धीरे उसका असर भी नज़र आने लगा है. ट्रेड यूनियनों की गतिविधियाँ की आक्रामकता काफ़ी कम हुई है और विदेशी निवेशक सामने आ रहे हैं. तो क्या राज्य के सभी लोग सरकार के कामकाज से बहुत खुश हैं? इसका जवाब भी नहीं है. इन नाखुश लोगों की नाराज़गी चुनावों को प्रभावित नहीं सके, ये सुनिश्चित करता है दूर-दराज के गाँवों तक फैला पार्टी का संगठन. विपक्षी तृणमूल काँग्रेस के एक नेता भी मानते हैं कि सांगठनिक तौर पर माकपा की बराबरी करना संभव नहीं है. वह कहते हैं कि जो जहाँ मज़बूत रहता है वो 'जिसकी लाठी उसकी भैंस' की तर्ज पर चुनावी धांधली से बाज़ नहीं आता है. कमज़ोर विपक्ष इसके अलावा वाममोर्चे के पक्ष में एक महत्वपूर्ण बात ये है कि राज्य में विपक्ष नाम की कोई चीज़ ही नहीं है. काँग्रेस शुरू से ही अंतर्कलह और गुटबाज़ी की शिकार रही है.
1998 में ममता बनर्जी ने अलग होकर तृणमूल काँग्रेस का गठन किया तो सत्ता से नाराज़ लोगों को कुछ उम्मीद बंधी. लेकिन वो भी अपने मूल चरित्र से अलग नहीं हट सकी. ममता के अड़ियल रवैये और मनमाने फ़ैसलों से लोगों में उनकी साख गिरी. उनको सुनने के लिए भीड़ तो काफ़ी जुटती है लेकिन सांगठनिक कमज़ोरी की वजह से पार्टी कभी इस भीड़ को वोटों में नहीं बदल सकी. हाल में हुए लोकसभा चुनाव में इसी वजह से राष्ट्रवादी तृणमूल काँग्रेस का सूपड़ा साफ़ हो गया. पिछले लोकसभा चुनाव में पार्टी ने आठ सीटें जीती थीं. इस बार सिर्फ़ ममता ही जीत सकीं और उनकी जीत का अंतर भी पिछली बार के मुक़ाबले घटकर आधे से भी कम रह गया. ममता ने पहले तो सुदीप बंधोपाध्याय को टिकट नहीं देकर कोलकाता उत्तर-पश्चिम की जीती हुई सीट गँवा दी.
सुदीप और इस सीट पर पार्टी के उम्मीदवार सुब्रत मुखर्जी के बीच वोटों के बँटवारे में माकपा ने ये सीट छीन ली. दिलचस्तप बात ये है कि माकपा ने लगभग 50 वर्ष के बाद ये सीट फिर से जीती है. महानगर की जिन पाँच सीटों पर भाजपा-तृणमूल गठबंधन सबसे मज़बूत था उनमें से चार अभी माकपा ने छीन ली है. भाजपा के दोनों केंद्रीय मंत्री, तपन सिकदर और सत्यब्रत मुखर्जी भी बुरी तरह पराजित हो गए. वैसे ममता बनर्जी ने हर चुनाव की तरह इस बार भी इस दुर्गति के लिए चुनावी धाँधली को ज़िम्मेदार ठहराते हुए कहा है कि राज्य में राष्ट्रपति शासन के बिना मुक्त और निष्पक्ष चुनाव संभव नहीं हो सकता. ये बात अलग है कि चुनाव आयोग ने राज्य में इस बार एहतियात के तौर पर जितने क़दम उठाए, विपक्ष ने उसका स्वागत किया था और पहले कभी धाँधली की आशंका नहीं जताई थी. राज्य में वाममोर्चा सरकार की छवि ग़रीबों की हमदर्द के तौर पर उभरी है. सरकार के काम काज और विपक्ष की निष्क्रियता ने मोर्चे को यहाँ लगभग अजेय बना दिया है. मोर्चे में विभिन्न मुद्दों पर मतभेद होते रहते हैं लेकिन सभी घटक मिल-बैठकर उनको सुलझा लेते हैं. विपक्ष इन मतभेदों से कभी फ़ायदा नहीं उठा सका. मुख्यमंत्री की कुर्सी नहीं होने के बावजूद ज्योति बसु राज्य में वाममोर्चे के मसीहा बने हुए हैं. कोई भी घटक उनकी बात मानने से इनकार नहीं करता. ऐसे में निकट भविष्य में वाममोर्चे के मज़बूत क़िले में दरार की कोई संभावना नज़र नहीं आती. |
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