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पूर्वी भारत में भी एनडीए का किला ध्वस्त | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पूर्वी भारत में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को ख़ासा नुक़सान उठाना पड़ा है. भारतीय जनता पार्टी के साथ ही उसके सहयोगियों को भी जनता ने नकार दिया है. पार्टी सिर्फ़ उड़ीसा में ही सहयोगी दल बीजू जनता दल के साथ मिलकर बेहतर प्रदर्शन कर सकी है बाक़ी जगह उसे करारी हार मिली है. झारखंड में पार्टी के पास 11 सीटें थीं मगर अब वह सिर्फ़ एक ही सीट बचा पाई है और कांग्रेस गठबंधन के पास 12 सीटें चली गई हैं. भाजपा सिर्फ़ बाबूलाल मरांडी की कोडरमा सीट ही बचा पाई है. कांग्रेस ने झारखंड मुक्ति मोर्चे के साथ मिलकर राज्य में झाड़ू फेर दिया है. पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस पार्टी के साथ ही भाजपा का पत्ता भी साफ़ हो गया. पार्टी के पास आठ सीटें पिछली लोकसभा में थीं मगर अब वह सिर्फ़ एक सीट जीत सकी है. ममता बनर्जी कोलकाता दक्षिण सीट से जीत सकी हैं जबकि केंद्र सरकार में मंत्री रहे भाजपा के तपन सिकदर भी दमदम सीट से हार गए. वामपंथी दलों के गठबंधन को 33 सीटें मिली हैं जबकि कांग्रेस पाँच सीटें अपनी झोली में डाल पाई है. कांग्रेस को दो सीटों का नुक़सान हुआ है. भाजपा को उम्मीद थी कि वह पूर्वोत्तर भारत के राज्य असम में इस बार महत्त्वपूर्ण बढ़त हासिल कर लेगी मगर ऐसा हुआ नहीं. पार्टी सिर्फ़ दो ही सीटें जीत पाई जबकि नौ सीटें कांग्रेस के हाथ में गईं. एनडीए गठबंधन अगर कहीं पिछली बार के प्रदर्शन को दोहरा पाया तो वह था उड़ीसा. राज्य में पिछली बार उसके पास 19 सीटें थीं और दो सीटें कांग्रेस की झोली में गईं थीं मगर इस बार एनडीए को 18 सीटें मिली हैं. बाक़ी तीन सीटें कांग्रेस की झोली में गई हैं. इस तरह पूर्वी भारत के राज्यों में भाजपा गठबंधन पिछली बार का प्रदर्शन भी नहीं दोहरा सका है और अन्य क्षेत्रों की तरह यहाँ भी उसे झटका लगा है. |
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