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दक्षिण में साझीदारों ने नैया डुबोई | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पुराने साझीदारों की कमज़ोरी और नए दोस्तों के चुनाव में ग़लती ने एनडीए को दक्षिण भारत में काफ़ी नुक़सान पहुँचाया है. भारतीय जनता पार्टी की दक्षिण भारत में कोई ख़ास मौजूदगी कभी नहीं रही है लेकिन 1999 के चुनाव में उसके साझीदारों के अच्छे प्रदर्शन के कारण उसे काफ़ी सहारा मिला था. केरल को छोड़कर तीन दक्षिणी राज्यों में पार्टी ने ऐसे दलों के साथ गठबंधन किया था जो संसद में उसकी ताक़त बढ़ाने में मददगार रहे थे. लेकिन इस बार के चुनाव में उसके साझीदारों की हालत पतली होने के कारण गठबंधन को भारी धक्का लगा है. आंध्र प्रदेश एनडीए को बाहर से समर्थन देने वाले चंद्रबाबू नायडू की पार्टी तेलुगू देशम की हवा निकलने के कारण गठबंधन को सीधे-सीधे तीस से अधिक सीटों का नुक़सान हुआ है.
टीडीपी ने तेरहवीं लोकसभा में अपने 29 सांसदों के सांसदों के साथ एनडीए को समर्थन दिया था, इसके अलावा टीडीपी से गठबंधन की बदौलत बीजेपी ने सात सीटें जीती थीं. इस बार टीडीपी को सिर्फ़ पाँच सीटें मिली हैं जबकि बीजेपी को एक भी नहीं, एनडीए को किसी एक राज्य में होने वाला यह सबसे बड़ा नुक़सान है. कांग्रेस ने इस राज्य में तेलंगाना राष्ट्र समिति नाम की क्षेत्रीय पार्टी से गठबंधन करके काफ़ी फ़ायदा हासिल किया है. कांग्रेस ने राज्य में 29 सीटें जीते हैं जबकि तेलंगाना राष्ट्र समिति ने पहली बार पाँच सीटें जीत ली हैं. तमिलनाडु जयललिता की अन्ना द्रमुक को जब एनडीए में शामिल किया गया तो लगने लगा कि इसका नुक़सान एनडीए को हो सकता है लेकिन नुक़सान ऐसा होगा इसका अंदाज़ा कम से कम बीजेपी के नेताओं को तो नहीं था.
ख़ास तौर पर जिस तरह एनडीए से करूणानिधि की पार्टी द्रमुक अलग हुई उसके बाद कांग्रेस ने उसे पटाने का मौक़ा नहीं गँवाया, कांग्रेस का निर्णय कितना सही था इसका पता नतीजों से चल जाता है. पिछली लोकसभा में जयललिता की पार्टी को 10 और बीजेपी को चार सीटें मिली थीं, इस बार कुल 14 सीटों का नुक़सान हुआ, यानी दोनों में से किसी को कुछ नहीं मिला. दूसरी ओर, कांग्रेस को करूणानिधि की पार्टी द्रमुक से गठबंधन के फ़ायदे के तौर पर 10 सीटें मिली हैं जबकि पिछली बार उसकी सिर्फ़ दो सीटें थीं. द्रमुक ने भी अपने प्रदर्शन में पिछली बार के मुक़ाबले सुधार किया है, उसकी सीटें 12 से बढ़कर 16 हो गई हैं. कर्नाटक बीजेपी को उम्मीद थी कि उसे जो नुक़सान अन्य राज्यों में हो रहा है उसकी भरपाई कर्नाटक से हो जाएगी, उसे राज्य में सफलता तो मिली है लेकिन उतनी नहीं जितनी कि उसे आशा थी.
राज्य की 28 सीटों में से कांग्रेस ने 17 जीत ली हैं यानी उसे कुल 10 सीटों का फ़ायदा हुआ जबकि कांग्रेस को दस सीटों का नुक़सान. कांग्रेस को राज्य में नुक़सान तो ज़रूर हुआ लेकिन इतना नहीं कि उसके सरकार बनाने के मंसूबों पर असर पड़ सके. केरल एनडीए को जैसी उम्मीद थी, वैसा ही हुआ, केरल में उसकी मौजूदगी तो नहीं है लेकिन कांग्रेस की हालत ख़राब होने को पार्टी एक अच्छा संकेत मान रही थी. हुआ भी कुछ ऐसा ही है, केरल की परंपरा के अनुरूप वहाँ कांग्रेस को 20 में से एक भी सीट नहीं मिली है. वामपंथी मोर्चे को यहाँ 19 सीटें मिली हैं, एक सीट मुस्लिम लीग को गई है. सबसे दिलचस्प बात ये है कि केरल में बुरे प्रदर्शन से केंद्र में सरकार बनाने की कांग्रेस की योजनाओं पर ख़ास फर्क़ नहीं पड़ता क्योंकि उसकी हार का मतलब है वामपंथी पार्टियों की जीत. वामपंथी मोर्चे ने पहले ही घोषणा कर दी है कि वह केंद्र में सरकार बनाने के कांग्रेस के दावे का समर्थन करेगी. |
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