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हिंदीभाषी क्षेत्रों में वामपंथ की स्थिति | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पिछले वर्ष हुए लोकसभा चुनाव के बाद सक्रिए राजनीति में वामपंथी दलों विशेषरूप से मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की भूमिका सहसा बेहद महत्वपूर्ण हो गई. पिछले वर्ष के दौरान वामपंथी दलों पर मीडिया ने जितना फोकस किया, उतना शायद ही पहले कभी किया हो. लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में एकाएक मिले महत्व के बावजूद आज भी कम्युनिस्ट आंदोलन अपनी ऐतिहासिक कमज़ोरी का उतना ही, बल्कि कुछ की राय में कहीं अधिक, शिकार है जितना कई दशकों पहले था. विशाल हिंदी भाषी भूभाग में उसकी उपस्थिति नगण्य है. वामपंथी दल विशेषकर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और मार्क्सवादी पार्टी, इस वास्तविकता से अच्छी तरह परिचित हैं कि हिंदी प्रदेश में राजनीतिक शक्ति अर्जित किए बगैर राष्ट्रीय राजनीति में लगातार महत्व बनाए रखना असंभव है. उनके लिए चिंता की बात यह है कि पिछले तीन दशकों के दौरान हिंदी प्रदेश में उनकी उपस्थिति घटती गयी है और उनके प्रभावक्षेत्र सिकुड़ते गए हैं. बहुत समय तक इस वास्तविकता को नज़रअंदाज़ करने के बाद अब मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी इससे टकराने और अंततः बदले के मूड में नज़र जा रही है. छह अप्रैल से नई दिल्ली में उसकी कांग्रेस होने जा रही है, और इसके ठीक पहले उसने एक सप्ताह की संगोष्ठी आयोजित करके हिंदी प्रदेश की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक स्थिति पर व्यापक विचार-विमर्श किया. संगोष्ठी में धर्म द्वारा पेश की जा रही चुनौतियों पर भी चर्चा हुई. स्पष्ट है कि माकपा एक बार फिर हिंदी प्रदेश में सक्रिय होने के लिए कमर कस रही है. इसके पहले 1978 में भी माकपा ने एक ऐसी ही कोशिश की थी. पार्टी के सल्किया प्लेनम में निर्णय लिया गया था कि हिंदी प्रदेश में संगठन का विस्तार किया जाए. इस निर्णय के तहत पार्टी की केंद्रीय समिति का कार्यालय कोलकाता से दिल्ली लाया गया. दिल्ली से हिंदी और उर्दू में साप्ताहिक मुखपत्र शुरू किए गए. हिंदी-उर्दू लेखकों को व्यापक मंच प्रदान करने के लिए जनवादी लेखक संघ का गठन किया गया और एकबारगी ऐसा लगा कि पार्टी हिंदी प्रदेश में सक्रिए हस्तक्षेप के लिए तैयार है. कमी शाहबानो केस और बाबरी मस्जिद का ताला खुलने के बाद आक्रामक रामजन्मभूमि आंदोलन-ये दो मुद्दे ऐसे थे जिन पर धर्मनिरपेक्ष वामपंथी दृष्टि से जनता के बीच अभियान छेड़ा जा सकता था.
लेकिन वामपंथी दलों ने केवल कुछ बयान जारी करके ही संतोष कर लिया. माकपा और भाकपा दोनों ने ही अपनी सीमित शक्ति का भी इस्तेमाल नहीं किया और हिंदू एवं मुस्लिम संप्रदायवादियों के लिए मैदान खुला छोड़ दिया. नतीजतन 80 के दशकों के मध्य हिंदी प्रदेश में इन पार्टियों की जो शक्ति थी, आज उतनी भी नहीं है. संगठन और विधानसभा एवं संसद, दोनों ही स्तरों पर उसमें कमी आई है. कम्युनिस्ट आंदोलन की सबसे बड़ी कमज़ोरी यह रही है कि उसने धर्म, संस्कृति और जाति व्यवस्था को गहराई से समझकर अपनी रणनीति बनाने की कोशिश नहीं की. उसने समाज के व्यापक तबकों के साथ ऐसा तालमेल स्थापित नहीं किया जिसके कारण कम्युनिस्ट पार्टियां उनके दैनंदिन जीवन का अंग बन सकें. उन्होंने ‘वर्ग’ को केवल एक आर्थिक अवधारणा के रूप में ग्रहण किया, उसके सामाजिक रूप ‘जाति’ को समझने की ज़रूरत महसूस नहीं की. कमज़ोरी जहाँ-जहाँ कम्युनिस्ट पार्टियाँ मजबूत थीं, वहाँ उनके नेताओँ की छवि मेहनतकश वर्गों के पक्ष में खड़े होने वाले और उनके आर्थिक संघर्षों को नेतृत्व देने वाले जुझारू योद्धाओं की तो थी, पर इससे अधिक नहीं. नतीजतन लोग उनके पास अपनी समस्याओं के समाधान के लिए तो आते थे. पर चुनाव में वोट डालने के वक्त अपनी जाति के नेताओं की बात मानते थे. मध्य और पिछड़ी जातियों के उदय के बाद बने नए जातिगत समीकरणों और गठबंधनों ने चरण सिंह, मुलायम सिंह यादव और लालू प्रसाद यादव जैसे नेताओं को उभारा. दलितों की अस्मिता की लड़ाई को भी कम्युनिस्ट पार्टियाँ अपने एजेंडे पर नहीं ला पाईं. नास्तिक और धर्मविरोधी छवि के कारण उनका समाज के बहुसंख्यक तबके के साथ घनिष्ठ संबंध नहीं बन पाया. इस बीच बिहार में नक्सलवादी संगठनों के प्रभाव में अच्छा विस्तार हुआ. लेकिन उनकी भूमिका भी भूस्वामियों के ख़िलाफ़ किसानों के संघर्ष तक सीमित रही. जब उनमें से कुछेक ने संसदीय रास्ता अपनाया तो वे चुनाव में खास उल्लेखनीय सफलता हासिल नहीं कर पाए. हिंदी प्रदेश में कम्युनिस्ट आंदोलन के विस्तार के लिए स्थितियाँ अनुकूल है. सांप्रदायिक तथा जातिवादी पार्टियों का कामकाज लोग देख चुके हैं. उन्हें सच्चे विकल्प की तलाश है. ऐसे में यदि मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव की पिछलग्गू बनने के बजाए कम्युनिस्ट पार्टियाँ अपनी अलग राह निकालें, तो स्थिति में बदलाव की प्रक्रिया शुरू हो सकती है. |
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