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रविवार, 23 जुलाई, 2006 को 17:27 GMT तक के समाचार
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'राष्ट्रपति का संदेश पढ़ने के बाद निर्णय'

हंसराज भारद्वाज
राष्ट्रपति अब्दुल कलाम का संदेश संसद में पढ़कर सुनाया जाएगा
भारत के क़ानून मंत्री हंसराज भारद्वाज ने कहा है कि 'लाभ का पद' विधेयक के संबंध में राष्ट्रपति अब्दुल कलाम का संदेश संसद में पढ़कर सुनाया जाएगा और चर्चा के बाद ही इस बारे में निर्णय लिया जाएगा.

उनका मानना था कि मीडिया का ये कहना ग़लत है कि राष्ट्रपति की सलाह को ठुकरा दिया गया है और राष्ट्रपति के पद की गरिमा को ध्यान में रखते हुए उस पद को वाद-विवाद का विषय नहीं बनाना चाहिए.

उन्होंने ये भी कहा कि ग्रामीण लोगों को सस्ता और सुलभ न्याय उपलब्ध करवाने के लिए विशेष अदालतें बनाई जाएँगी जो ज़िला मुख्यालय से गाँव-गाँव में जाकर सरल प्रक्रिया के तहत तीन महीने के भीतर मामलों का निपटारा करेंगी.

बीबीसी हिंदी के विशेष कार्यक्रम 'आपकी बात - बीबीसी के साथ' में श्रोताओं के सवालों के जवाब देते हुए उन्होंने ये विचार व्यक्त किए.

'भ्रम फ़ैला रहे हैं'

'लाभ का पद' विधेयक पर राष्ट्रपति की सलाह के बावजूद मंत्रिमंडल के उस विधेयक को बिना बदलाव संसद में लाने पर क़ानून मंत्री का कहना था कि इस बारे में भ्रम फैलाया जा रहा है.

 मैं विनम्रता से कहना चाहता हूँ कि राष्ट्रपति के संदेश को सदन में पढ़कर सुनाया जाएगा, फिर उस पर चर्चा होगी और जो निष्कर्ष निकलेगा उसी के आधार पर निर्णय होगा
हंसराज भारद्वाज

उनका कहना था कि वे राष्ट्रपति के पद का आदर करते हैं लेकिन सरकार को नहीं लगता कि ये विधेयक जिस शक्ल में लाया गया है उसमें कोई संवैधानिक त्रुटी है और वे इस बारे में विपक्ष से विस्तार से चर्चा के लिए भी तैयार हैं.

केंद्रीय क़ानून मंत्री का कहना था, "मैं विनम्रता से कहना चाहता हूँ कि राष्ट्रपति के संदेश को सदन में पढ़कर सुनाया जाएगा, फिर उस पर चर्चा होगी और जो निष्कर्ष निकलेगा उसी के आधार पर निर्णय होगा."

उनका कहना था ऐसा नहीं है कि सांसद कोई बहुत बड़ा फ़ायदा उठा रहे थे क्योंकि कई सांसदों के अतिरिक्त कार्यभार संभालने की परंपरा बहुत देर से चल रही है.

भारद्वाज के अनुसार संविधान के अनुच्छेद 102 के तहत जहाँ सांसद को संसद की सदस्य के अयोग्य ठहराया जा सकता है, उसी के तहत उसे इससे मुक्त भी किया जा सकता है.

ग्रामीण इलाक़ों में अदालतें

क़ानून प्रणाली में न्याय मिलने में देरी पर एक सवाल का जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि इसका शीघ्र ही समाधान होगा.

उनका कहना था कि राज्यों के साथ चर्चा के बाद ग्रामीण क्षेत्रों के लिए विशेष अदालतों का गठन होगा और अदालतें ग्रामीण इलाक़ो में लगाई जाएँगी ताकि ग्रामीण लोगों को पैसा ख़र्च कर शहरों या ज़िला मुख्यालयों में न आना पड़े.

इन अदालतों के पास दिवानी और फ़ौजदारी मामले निपटाने का अधिकार होगा और इन्हें तीन महीने के भीतर फ़ैसला देना होगा.

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