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आँगन के पार: घरेलू हिंसा के ख़िलाफ़ क़ानून पर चर्चा | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बीबीसी वर्ल्ड सर्विस ट्रस्ट और बीबीसी हिंदी की साझा प्रस्तुति है आँगन के पार. एक कार्यक्रम जिसमें ख़ास तौर पर ग्रामीण महिलाओं के सरोकारों, उनके स्वास्थ्य, उनके सशक्तिकरण और एचआईवी-एड्स पर चर्चा होती है. आँगन के पार की पाँचवीं कड़ी में चर्चा घरेलू हिंसा के ख़िलाफ़ बने क़ानून की. महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा की घटनाएँ बदलते समय के साथ कम नहीं हो रही है. भारत सरकार के अनुसार लगभग 70 प्रतिशत महिलाएँ घरेलू हिंसा का शिकार हैं. लेकिन पिछले 25 अक्तूबर 2006 से घरेलू हिंसा के ख़िलाफ़ बने क़ानून को लागू कर दिया गया है लेकिन क्या इससे तस्वीर बदलेगी. क्या गाँव-देहातों में रहने वाली महिलाएँ इस क़ानून की मदद लेने की हिम्मत जुटा पाएँगी. इतने सारे क़ानून जो पहले से ही मौजूद हैं उसकी फ़ेहरिस्त मे जुड़ा एक और क़ानून क्या उम्मीद लेकर आया है. इस चर्चा मे भाग लिया है राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्षा गिरिजा व्यास और सामाजिक कार्यकर्ता कमला भसीन ने. पहले के कार्यक्रम | इससे जुड़ी ख़बरें घरेलू हिंसा क़ानून में पहली गिरफ़्तारी28 अक्तूबर, 2006 | भारत और पड़ोस घरेलू हिंसा के ख़िलाफ़ क़ानून लागू26 अक्तूबर, 2006 | भारत और पड़ोस 'महिलाओं को विचार बदलना होगा'04 सितंबर, 2005 | भारत और पड़ोस घरेलू हिंसा पर विधेयक पारित24 अगस्त, 2005 | भारत और पड़ोस घरेलू हिंसा रोकने के लिए क़ानून22 अगस्त, 2005 | भारत और पड़ोस एचआईवी संक्रमित जोड़ियों की शादी03 अक्तूबर, 2006 | भारत और पड़ोस ख़तना से एड्स पर अंकुश13 अगस्त, 2006 | पहला पन्ना 'एड्स के प्रसार से अर्थव्यवस्था पर असर'21 जुलाई, 2006 | कारोबार इंटरनेट लिंक्स बीबीसी बाहरी वेबसाइट की विषय सामग्री के लिए ज़िम्मेदार नहीं है. | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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