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घरेलू हिंसा रोकने के लिए क़ानून | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाली घरेलू हिंसा को रोकने के लिए सरकार ने संसद के निचले सदन में एक विधेयक पेश किया है. नए प्रावधानों के तहत घरेलू के हिंसा के दोषी पाए जाने वाले लोगों को एक वर्ष तक कारावास की सज़ा हो सकती है. केंद्रीय मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री कांति सिंह ने यह विधेयक सदन में रखा. इस विधेयक की ख़ास बात ये है कि घरेलू हिंसा के दायरे में शारीरिक, मानसिक और यौन प्रताड़ना को तो शामिल किया ही गया है, साथ ही मारपीट की धमकी देने पर भी कार्रवाई हो सकती है. इस क़ानून के तहत किसी महिला या उसके रिश्तेदारों से दहेज की माँग करने के लिए दोषी लोगों को दंडित किया जा सकता है. सरकार का कहना है कि इस क़ानून के लागू होने के बाद महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाली हिंसा की रोकथाम में मदद मिलेगी. इस क़ानून के तहत मैजिस्ट्रेट पीड़ित महिला की सुरक्षा सुनिश्चित करने का आदेश दे सकता है जिसके तहत उसे प्रताड़ित करने वाला व्यक्ति उस महिला से संपर्क स्थापित नहीं कर सकेगा. मैजिस्ट्रेट की ओर से आदेश पारित होने के बाद भी अगर महिला को प्रताड़ित करने वाला व्यक्ति उससे संपर्क करता है या उसे डराता-धमकाता है तो इसे अपराध माना जाएगा और इसके लिए दंड और 20 हज़ार रूपए तक का जुर्माना लगाया जा सकता है. मैजिस्ट्रेट इस मामले में महिला के दफ़्तर या उसके कामकाज की जगह पर प्रताड़ित करने वाले व्यक्ति के प्रवेश पर रोक लगा सकता है. भारत में घरेलू हिंसा की घटनाओं का स्तर कई देशों की तुलना में बहुत अधिक है और लंबे समय से ऐसे क़ानून की माँग महिला संगठनों की ओर से होती रही है. लोकसभा से पारित होने के बाद इसे राज्यसभा की मंज़ूरी के लिए भेजा जाएगा जिसके बाद यह क़ानून का रूप ले लेगा. |
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