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रविवार, 29 अक्तूबर, 2006 को 07:06 GMT तक के समाचार
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आराम फ़रमा रहे हैं बोडो अलगाववादी

बोडो अलगाववादी
बोडो अलगाववादी स्वीकार करते हैं कि कभी-कभी हथियारों के दम पर भी धन जुटाया जाता है
असम के अलगाववादी संगठन नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ़ बोडोलैंड यानी एनडीएफ़बी के अलगाववादी इन दिनों ‘जनता के ख़र्च पर’ आराम फ़रमा रहे हैं.

पिछले वर्ष 25 मई को भारत सरकार, असम की प्रांतीय सरकार और एनडीएफ़बी के बीच हुए समझौते के तहत इन दिनों ये चरमपंथी सरकारी ज़मीन पर बने शिविरों में रह रहे हैं.

अलगाववादी संगठन, केंद्र और राज्य सरकार के बीच हुए संघर्ष विराम समझौते के तहत यह प्रावधान रखा गया है कि चरमपंथी चाहें तो अपने संगठन के लिए "स्वेच्छापूर्वक' दिया गया दान स्वीकार कर सकते हैं.

पर ऐसा करने पर चरमपंथियों पर आरोप लग रहे हैं कि हथियार दिखाकर प्राप्त किया गया धन 'स्वेच्छा से दिया गया दान' नहीं माना जा सकता.

चरमपंथी अपनी सशस्त्र शाखा को बोडोलैंड सेना कहा जाना पसंद करते हैं. संघर्ष विराम के बाद खुले में आ चुकी इस सेना के मुख्य सेनाध्यक्ष बी सुस्रांग्रा मुस्कराकर स्वीकार करते हैं कि कभी लोग अपनी मर्ज़ी से दान देते हैं तो कभी बंदूक के भय से.

दरअसल, बोडोलैंड के इस स्वायत्तशासी इलाके में इन बंदूकधारियों की धनवसूली तनाव का एक बड़ा कारण बनी हुई है.

सरकारी पक्ष

बोडोलैंड स्वायत्तशासी क्षेत्र यानी बीटीएडी के पुलिस महानिरीक्षक आरएम सिंह स्वीकार करते हैं कि बंदूक दिखाकर धन लिए जाने को जबरन वसूली ही माना जाएगा.

 जिसे पुलिस और प्रशासन जबरन उगाही कहता है उसे चरमपंथी दान बताते हैं. जहाँ तक धनराशि देने वाले का सवाल है, लोगों की ओर से कभी शिकायत आती ही नहीं
आरएम सिंह, पुलिस महानिरीक्षक

संघर्ष विराम समझौते के तहत क्या हथियारों का समर्पण एक शर्त नहीं होनी चाहिए थी? यह पूछे जाने पर सिंह कहते हैं, “संघर्ष विराम समझौते के मूल मसौदे में शिविरों में एक शस्त्रागार बनाकर वहीं सारे शस्त्र जमा कराने का प्रावधान रखा गया था. इस शस्त्रागार की एक-एक चाबी सरकार और चरमपंथियों के पास रखे जाने का प्रावधान था. लेकिन बाद में इस शर्त पर सहमति नहीं हो पाई और शस्त्र अभी भी चरमपंथियों के पास ही हैं.”

धन वसूलने वालों के ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई क्यों नहीं होती? इस सवाल पर सिंह कहते हैं, “जिसे पुलिस और प्रशासन जबरन उगाही कहता है उसे चरमपंथी दान बताते हैं. जहाँ तक धनराशि देने वाले का सवाल है, लोगों की ओर से कभी शिकायत आती ही नहीं.”

एनडीएफ़बी के महासचिव गोविंद बसुमतारी के अनुसार संगठन में लगभग एक हज़ार सदस्य हैं जिनमें से इसके अध्यक्ष डीआर नाब्ला को छोड़कर अब कोई भूमिगत नहीं है.

वो सरकार पर आरोप लगाते हैं कि उनके सभी कार्यकर्ताओं के रहने लायक व्यवस्था इन शिविरों में नहीं है.

इस पर क्षेत्र के शीर्ष पुलिस अधिकारी आरएम सिंह कहते हैं कि चरमपंथी संगठन के काफी कैडरों ने संघर्ष विराम लागू होने के बाद शादियाँ कर ली हैं. ये लोग अपने परिवार के साथ रहने लायक सुविधा चाहते हैं जो दे पाना सरकार के लिए संभव नहीं है.

पुरानी समस्या

जबरन धनवसूली की समस्या से निजात पाने के लिए शिविरों का सारा खर्च सरकार की ओर से उठाए जाने का एक प्रस्ताव विचाराधीन है.

स्वायत्तशासी इलाके के सबसे बड़े शहर कोकराझाड़ के सबसे पुराने रेस्तरां के मालिक कहते हैं कि अलगाववादियों की ओर से मासिक वसूली किया जाना कोई नई बात नहीं है.

 जब ये लोग भूमिगत थे, तभी से उनका खर्च उठाने की ज़िम्मेवारी आम जनता पर जबरन थोप दी गई थी. अब भी शहर का हर व्यापारी उन्हें पैसे देने के लिए मजबूर है. यह राशि व्यापारी की माली हालत देखकर तय की जाती है
रेस्तरां मालिक, कोकराझाड़

वे कहते हैं, “जब ये लोग भूमिगत थे, तभी से उनका खर्च उठाने की ज़िम्मेवारी आम जनता पर जबरन थोप दी गई थी. अब भी शहर का हर व्यापारी उन्हें पैसे देने के लिए मजबूर है. यह राशि व्यापारी की माली हालत देखकर तय की जाती है.”

कोकराझाड़ ज़िले के पुलिस अधीक्षक हीरेन नाथ कहते हैं कि उन्हें आम तौर पर जबरन वसूली की कोई शिकायत नहीं मिलती. ऐसी घटनाएँ तभी उजागर होती हैं जब किसी प्रकार की बड़ी हिंसा हो जाए.

हिंसा से एक पृथक और स्वाधीन बोडोलैंड हासिल करने का सपना देखने वाले एनडीएफ़बी के कार्यकर्ताओं की अध्ययन सूची में गांधी की आत्मकथा भी शामिल है.

सुबह की परेड और कसरत के बाद शिविरों में रहने वाले लोगों के पास काफी खाली वक्त रहता है.

संगठन के उप सेनाध्यक्ष 31 वर्षीय बीके आलोंगबार का कहना है कि इस खाली वक्त में उनके कैडर विभिन्न रचनात्मक गतिविधियों से जुड़े रहते हैं. शिविर के इर्द-गिर्द बागवानी के अलावा कई कार्यकर्ता पढ़ने का भी शौक रखते हैं.

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