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बुधवार, 27 सितंबर, 2006 को 02:53 GMT तक के समाचार
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हमले का ख़तरा बरकरार - रिपोर्ट
लादेन
रिपोर्ट के मुताबिक मुस्लिम समुदाय में अमरीका विरोधी भावना फैल रही है
अमरीकी नेशनल इंटेलिजेंस काउंसिल की रिपोर्ट के मुताबिक अल क़ायदा से अमरीका को ख़तरा बना हुआ है और जिहादी ‘आँदोलन’ का दुनिया भर में प्रसार जारी है.

यह रिपोर्ट अमरीका की 16 ख़ुफ़िया एजेंसियों की मदद से तैयार की गई है. इसमें कहा गया है कि कुल मुस्लिम आबादी के महज कुछ फ़ीसदी ही जिहादी की श्रेणी में हैं लेकिन इनकी संख्या तेज़ी से बढ़ रही है.

रिपोर्ट के मुताबिक अगर यही रुख जारी रहा तो अमरीका में और उसके बाहर अमरीकी हितों पर ख़तरा बढ़ेगा जिससे दुनिया भर में और हमले हो सकते हैं. पेश है रिपोर्ट के कुछ अंश..

अल क़ायदा

रिपोर्ट में कहा गया है कि आतंकवाद से निपटने के लिए अमरीका के नेतृत्व में जो प्रयास किए गए है उससे अल क़ायदा को काफ़ी नुक़सान हुआ है, उसके कई हमलो को विफल किया गया है लेकिन इसके बावजूद रिपोर्ट में निष्कर्ष निकाला गया है कि अल क़ायदा अभी भी अमरीका के लिए एक ख़तरे के रूप में मौजूद है.

 दुनिया भर में जिहादी आंदोलन फैल रहा है जिसमें अल क़ायदा सहित कुछ दूसरे आतंकवादी संगठन भी शामिल है और इसके कारण हमलो की आशंका लगातार बढ़ रही है

इसके साथ साथ दुनिया भर में जिहादी आंदोलन फैल रहा है जिसमें अल क़ायदा सहित कुछ दूसरे आतंकवादी संगठन भी शामिल है और इसके कारण हमलो की आशंका लगातार बढ़ रही है.

इराक़

रिपोर्ट के अनुसार इराक़ में जिहाद के नाम पर आतंकवादी नेताओ की एक नई पीढ़ी तैयार हो रही है और उन्हें मिली कथित सफलता से और लोग जिहाद में शामिल होने के लिए प्रेरित हो रहे हैं.

इराक़ युद्ध के कारण दुनिया भर के मुस्लिम समुदाय में अमरीकी नीति के ख़िलाफ़ रोष पनपा है जिससे जिहाद का समर्थन करने वाले लोगो की संख्या लगातार बढ़ रही है.रिपोर्ट के अनुसार अगर इस तरह की धारणा बने कि जिहादियो की इराक में हार हो रही है तो फिर कम लोग लड़ाई के लिए तैयार होंगे.

ईऱान और सीरिया

रिपोर्ट में ईऱान और सीरिया की पहचान आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले देशो के रूप में की गई है.साथ ही कहा गया है कि कुछ देश ऐसे भी है जो अपने यहाँ होने वाली आतंकवादी गतिविधियो पर लगाम कसने में विफल रहे है.

 अमरीका विरोधी और ग्लोबलाइज़ेशन या वैश्वीकरण विरोधी भावनाएँ उफ़ान पर हैं जिससे कट्टरपंथियो को मदद मिल रही है

रिपोर्ट कहता है कि अमरीका विरोधी और ग्लोबलाइज़ेशन या वैश्वीकरण विरोधी भावनाएँ उफ़ान पर हैं जिससे कट्टरपंथियो को मदद मिल रही है. इसका फ़ायदा उठाकर अलगाववादी ताक़तें अमरीकी हितो पर चोट पहुँचा सकती है. इंटरनेट युग में ऐसे हमले करना आसान और हमलावरो की पहचान मुश्किल हो गई है.

प्रमुख “ आतंकवादी ” नेता

क्योंकि ये रिपोर्ट इस साल अप्रैल में तैयार की गई थी इसलिए इसमें कहा गया था कि अबु मूसाब अल ज़रकावी , ओसामा बिन लादेन और अयमान अल ज़वाहिरी के पकड़े या मारे जाने से इन संगठनो को ज़बरदस्त नुक़सान पहुँचेगा.

रिपोर्ट के अनुसार इस स्थिति में हमले एक दम तो नहीं रुकेंगें लेकिन प्रमुख नेताओ की अनुपस्थिति में संगठन निश्चित रूप से कमज़ोर होगा जिससे अमरीका पर मंडरा रहे ख़तरे में थोड़ी कमी आएगी. अगर इन नेताओ को नहीं पकड़ा गया तो फिर अमरीका के लिए मुश्किलें और बढ़ सकती है.

ग़ौरतलब है कि इसी वर्ष जून में इराक़ में हुई कार्रवाई में ज़रकावी की मौत हो चुकी है.

यूरोप पर ख़तरा

रिपोर्ट के अनुसार ज़िहादी मानते हैं कि पश्चिमी हितों पर चोट करने के लिए यूरोप अहम स्थान है.

 रिपोर्ट के मुताबिक सिर्फ़ आतंकवादी नेताओं को पकड़ने या उनके ख़िलाफ़ सैन्य अभियान चलाने भर से इस पर काबू नहीं पाया जा सकता बल्कि इसके लिए समन्वित बहुपक्षीय प्रयासों की ज़रुरत है

यूरोप में रह रहे आप्रवासी मुस्लिम समुदाय के भीतर मौजूद चरमपंथी नेटवर्क नए लोगों को साथ लेने और शहरों में हमले करने में सहायता कर रहा है. वर्ष 2004 में मैड्रिड और इसके अगले वर्ष लंदन में हुए हमलों से इसकी पुष्टि होती है.

ज़िहादी आँदोलन का जड़

रिपोर्ट के अनुसार चार ऐसे मुख्य कारण हैं जिससे विश्वव्यापी ज़िहादी आँदोलन के विस्तार में मदद मिल रही है.

पहला, भ्रष्टाचार, अन्याय और पश्चिमी दबदबे का भय जिससे गुस्सा और दीनहीन होने की भावना पनपती है. दूसरा कारण है इराक़ की स्थिति. तीसरा, मुस्लिम बहुल देशों में सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक सुधारों की सुस्त गति और चौथा, अधिकतर मुसलमानों में अमरीका विरोधी भावना.

निदान

रिपोर्ट के मुताबिक सिर्फ़ आतंकवादी नेताओं को पकड़ने या उनके ख़िलाफ़ सैन्य अभियान चलाने भर से इस पर काबू नहीं पाया जा सकता बल्कि इसके लिए समन्वित बहुपक्षीय प्रयासों की ज़रुरत है.

हाल के दिनों में कुछ जाने माने मुस्लिम उलेमा ने हिंसा और धर्म को चरमपंथ से जोड़ने की कोशिश की निंदा की है जिससे संकेत मिलता है कि इस तरह का प्रयास ज़िहादी विचारधारा का रचनात्मक विकल्प तैयार करने में मददगार साबित हो सकता है.

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