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मदरसों में बढ़ती हिंदू छात्रों की संख्या | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
मदरसों का नाम लेते ही एक ऐसे स्कूल की तस्वीर उभरती है जहां अल्पसंख्यक छात्र पारंपरिक पुराने तरीके से अपनी तालीम पूरी करते हैं. इन पर अक्सर कट्टरपंथी ताकतों को पनाह देने के आरोप भी लगते रहे हैं. लेकिन पश्चिम बंगाल के मदरसों ने यह तस्वीर बदल दी है. राज्य के मदरसों में न सिर्फ़ ग़ैर-मुसलमान छात्र पढ़ते हैं, बल्कि उनकी संख्या इस बार बीते साल के मुक़ाबले 15 फ़ीसदी बढ़ गई है. इनमें ज्यादातर हिंदू हैं. पश्चिम बंगाल मदरसा शिक्षा बोर्ड के अध्यक्ष अब्दुस सत्तार कहते हैं, '' देश ही नहीं बल्कि यह पूरी दुनिया में अपने लिहाज से अनूठी बात है. यहां हिंदू छात्र न सिर्फ़ पढ़ रहे हैं, वे मुसलमान छात्रों के मुक़ाबले बेहतर नतीजे भी ला रहे हैं.'' राज्य के जलपाईगुड़ी जिले के उजिरिया मदरसा में 14 साल की तानिया सेन ने अपने मुसलमान सहपाठियों की अपेक्षा अरबी की परीक्षा में बेहतर अंक हासिल किए हैं. वो कहती हैं,'' मेरा गैर-मुसलमान होना कभी कोई मुद्दा नहीं रहा.'' दक्षिण कोलकाता स्थित एक मदरसे के प्रधानाचार्य तापस लायक कहते हैं,'' हमारे मदरसे में कई ग़ैर-मुसलमान छात्र व शिक्षक हैं. लेकिन वे सब सदभाव से रहते हैं.'' जाने-माने फ़िल्मकार मृणाल सेन कहते हैं कि राज्य में मदरसों के माहौल से पूरे देश को सीख लेनी चाहिए. वो कहते हैं कि कई मदरसे सांप्रदायिक सदभाव को मजबूत करने की दिशा में ठोस काम कर रहे हैं. ग़ैर मुसलमान सरकारी अधिकारी बताते हैं कि ‘इन मदरसों में ग़ैर-मुसलमान छात्रों की तादाद बढ़ने के दो प्रमुख कारण हैं. पहला नियमित स्कूलों में सीटों की कमी और दूसरा मदरसों को उच्च माध्यमिक शिक्षा बोर्ड से मिली मान्यता. इसके अलावा कई स्कूल डोनेशन की मांग करते हैं. इसकी वजह से भी ग़रीब छात्र मदरसों का रुख करते हैं.’ पश्चिम मेदिनीपुर जिले की कांथी रहमानिया हाई मदरसा के प्रधानाचार्य सुवर्ण बरण पांडा कहते हैं,'' हमारे मदरसे में कुल 900 छात्र हैं. इनमें दो सौ से ज्यादा ग़ैर-मुसलमान हैं. दो साल पहले तक यह तादाद पचास से भी कम थी.'' वो कहते हैं कि हिंदू होने के बावजूद मदरसे में उनको छात्रों की ओर से ज्यादा सम्मान मिलता है. कोलकाता से सटे दक्षिण 24-परगना जिले के अकरा हाई मदरसा में फिलहाल 34 हिंदू छात्र हैं. साल भर पहले तक यहां एक भी ग़ैर-मुसलमान छात्र नहीं था. वहां 12वीं में पढ़ने वाली मीनाक्षी नस्कर कहती है कि ‘मुझे शुरू में बहुत डर लगता था. लेकिन यहां सब कुछ सामान्य है.’ उसे अरबी भाषा का बहुत अच्छा ज्ञान है. मदरसे में अंग्रेज़ी पढ़ाने वाले देवेश मंडल कहते हैं,'' सामान्य स्कूलों में सीटों की कमी है. इसके अलावा फीस कम होने के कारण भी छात्र मदरसों की ओर आकर्षित हो रहे हैं.'' राज्य सरकार ने ग़ैर-मुसलमान छात्रों को अरबी भाषा में होने वाली दिक्कत को भी दूर कर दिया है. अरबी भाषा के सौ अंकों के प्रश्नपत्र में वे लोग 65 अंकों के सवाल का जवाब दूसरी भाषा में लिख सकते हैं. इस साल दसवीं और बारहवीं की परीक्षा में भी हिंदू छात्रों के नतीजे बेहतर रहे हैं. उनमें से कइयों को इंजीनियरिंग व मेडिकल कालेजों में दाखिला मिल गया है. सत्तार कहते हैं,'' हमने मदरसों को भी सामान्य स्कूलों जैसा बना दिया है. यहां छात्र व छात्राएं साथ ही पढ़ते हैं. हमने दकियानूसी परंपराओं को खत्म कर दिया है.'' सरकार ने मदरसा छात्रों के लिए छात्रवृत्ति भी शुरू की है. शायद इसीलिए पाकिस्तान ने भी राज्य के मदरसों से सीख लेने का फ़ैसला किया है. |
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