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'संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन' में भारतीय छात्र | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र के मुख्यालय में आजकल एक अनोखा सम्मेलन चल रहा है जिसमें दुनिया भर के स्कूली छात्र भाग ले रहे हैं. इसमें संयुक्त राष्ट्र का मॉडल या प्रतिमान बनाकर महासभा और सुरक्षा परिषद से जुड़े हर मुद्दे पर बहस की जा रही है. इसका मकसद संयुक्त राष्ट्र के बारे में इन छात्रों का ज्ञान बढ़ाना है. 'मॉडल संयुक्त राष्ट्र' कहे जाने वाले इस सम्मेलन में दुनिया भर से स्कूलों के कुल 2300 छात्र और छात्राएँ भाग लेने के लिए न्यूयॉर्क में जमा हुए हैं. यह सम्मेलन तीन दिन चलने वाला है. दिल्ली से भी इस सम्मेलन में दिल्ली के विभिन्न स्कूलों के छह छात्र-छात्राएँ इसमे भाग ले रहे हैं. इन प्रतिभाशाली युवा भारतीयों को सम्मेलन में आने के लिए सैकड़ों छात्रों में से चुना गया है.
दसवीं से बारहवीं कक्षा के यह छात्र पहली बार संयुक्त राष्ट्र को नज़दीक से देखकर बहुत खुश दिखे. महासभा के सभागार के अंदर खड़े हुए एक छात्र द्वारिका के दिल्ली पब्लिक स्कूल के निशीत शर्मा कहते हैं, “आज तक हमने संयुक्त राष्ट्र की सिर्फ़ तस्वीरें ही देखी थीं, आज हम यहां महासभा के अंदर खड़े हैं. हमारे लिए यह बहुत बड़ी बात है कि इतनी छोटी उम्र में हम यहाँ आए हैं.” तीन दिन चलने वाले इस सम्मेलन में हर देश के छात्रों को संयुक्त राष्ट्र में एक अलग देश का रोल करने को कहा जाता है. इसके लिए यह छात्र साल भर तक उस देश के बारे में गहन अध्ययन करते हैं और संयुक्त राष्ट्र में उससे जुड़े हर पहलू पर तैयारी भी करते हैं. भारत के छात्रों को यूरोप के हंगरी का रोल करने के लिए चुना गया है. आयोजकों को उम्मीद है कि इस सम्मेलन से इन छात्रों को संयुक्त राष्ट्र के कामकाज के बारे में और अंतरराष्ट्रीय मामलों को समझने में मदद मिलेगी. इस सम्मेलन के दौरान यह छात्र संयुक्त राष्ट्र महासभा के सभागार में और सुरक्षा परिषद में भी ठीक उन्ही जगहों पर बैठकें कर रहे हैं जहां संयुक्त राष्ट्र की असल बैठकें होती हैं. अंतरराष्ट्रीय मसले दार्फ़ूर का मामला हो या ईरान का परमाणु संबंधी विवाद या फिर चाहे खुद संयुक्त राष्ट्र में सुधार की ही बात क्यूं न हो, हर विषय पर गौर किया जा रहा है. और इनके हल निकालने के लिए सुझाव भी दिए जा रहे हैं. दिल्ली के रामजस स्कूल के राघव माहेश्वरी कहते हैं, “संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अब विश्व में बदलाव के हिसाब से तब्दीली करनी चाहिए. हर इलाके का प्रतिनिधित्व होना ज़रूरी है. सुरक्षा परिषद में वीटो खत्म कर देना चाहिए और स्थाई और अस्थाई सदस्यों की संख्या बढ़ानी चाहिए. इसमे देशों के आकार और जनसंख्या का भी ख़याल रखा जाना चाहिए.” सुधार की बात तो ठीक है लेकिन संयुक्त राष्ट्र में धन संबंधी समस्याएं भी तो हैं. डीपीएस आरकेपुरम की मनप्रीत उप्पल को संयुक्त राष्ट्र में वित्तीय प्रबंधन से शिकायत है.
वो कहती हैं, “ रक्षा का जो बजट है उसका दसवाँ हिस्सा सामाजिक कल्याण में खर्च होता है. अगर रक्षा के बजट में कटौती करके सामाजिक उद्धार के कामों में वह धन खर्च हो तो ज़्यादा लोगों का भला होगा.” भारत का भविष्य सँवारने के लिए तैयार इन छात्रों के हौसले काफ़ी बुलंद हैं. निशीत शर्मा इस ज़िम्मेदारी को समझते हैं. वो बोले, “हमें पता है कि हमारे देश की क्या हालत है. और यह भी कि क्या बदलना है. लेकिन युवा वर्ग को देश के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी समझनी होगी तभी कुछ हो सकेगा.” इस सम्मेलन में बच्चो का हौसला बढ़ाने के लिए संयुक्त राष्ट्र महा सभा के वर्तमान अध्यक्ष यान एलिएसन इन बच्चों को संबोधित भी किया. | इससे जुड़ी ख़बरें दान के चावलों से चलता एक स्कूल17 मार्च, 2006 | भारत और पड़ोस एक उदाहरण बन गई हैं गिरिजा देवी20 फ़रवरी, 2006 | भारत और पड़ोस अमरीका के 'इंडिया संडे स्कूल'08 जनवरी, 2006 | भारत और पड़ोस 'नर्सरी में दाखिले के लिए इंटरव्यू नहीं'19 दिसंबर, 2005 | भारत और पड़ोस हेडमास्टर की उम्र तेरह साल 25 जुलाई, 2005 | भारत और पड़ोस स्कूली बच्चों को अमानवीय सज़ा 07 जनवरी, 2005 | भारत और पड़ोस पढ़ाई पहले, बुनाई बाद में08 दिसंबर, 2003 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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