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राजा के अधिकारों में कटौती का प्रस्ताव | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
नेपाल में सांसदों ने राजा ज्ञानेंद्र के अधिकारों को अत्यंत सीमित करने वाले प्रस्ताव को सर्वसम्मति से पारित कर दिया है. अब नेपाल में नरेश की स्थिति नाम मात्र के राष्ट्राध्यक्ष की रह जाएगी. प्रस्ताव में सेना पर नेपाल नरेश का नियंत्रण ख़त्म करने की व्यवस्था है. इसी के साथ नेपाल की 90 हज़ार जवानों वाली शाही सेना सीधे संसद के नियंत्रण में आ जाएगी. संसद ने जो प्रस्ताव पारित किया है उसमें राज परिवार को करों के दायरे में लाने और संसद को नरेश का उत्तराधिकारी चुनने का अधिकार देने की भी बात है. इससे पहले नरेश के उत्तराधिकारी को चुनने का अधिकार राजशाही सलाहकार परिषद को था. संसद में स्वीकृत प्रस्ताव के तहत परिषद को भंग किया जा रहा है. नेपाल में अप्रैल में हुए जनांदोलन में मुख्य माँग राजा के अधिकारों में कटौती की ही थी. नेपाल के 1990 के संविधान में शासन से जुड़े अधिकतर अधिकार संसद को दिए गए थे लेकिन राजनीति में राजशाही की भूमिका बनाए रखी गई थी. मंज़ूरी तय थी संवाददाताओं के अनुसार राजा के अधिकारों में कटौती के प्रस्तावों को संसद में मंज़ूरी मिलना तय ही माना जा रहा था. दरअसल नेपाल की 205 संसदीय मौजूदा संसद में 90 प्रतिशत से ज़्यादा सदस्य अंतरिम सरकार में शामिल दलों के हैं. अप्रैल में हुए देशव्यापी जनांदोलन के बाद नरेश ज्ञानेंद्र के आमंत्रण पर अंतरिम सरकार का गठन किया गया था. संसद पहले ही एक संविधान सभा के गठन का प्रस्ताव पारित कर चुकी है. संविधान सभा नए संविधान की रचना के साथ-साथ देश में राजशाही के भविष्य पर भी विचार करेगी. |
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