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आसान नहीं है नेपाल में लोकतंत्र की राह | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
नेपाल नरेश ज्ञानेंद्र को आख़िरकार जनता के सामने झुकना ही पड़ा, मगर इसका कारण उनकी सोच में बदलाव नहीं था और न ही भंग की गई संसद को बहाल कर राजा ने लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जताई है. यह सब इसलिए हुआ क्योंकि नेपाल आज अपने इतिहास के निर्णायक मोड़ पर खड़ा है. शुक्रवार को संसद की बैठक बुलाकर राजा ज्ञानेंद्र ने फिलहाल अपनी गद्दी बचा ली लेकिन राजा का व्यापक प्रभाव ख़त्म कर लोकतांत्रिक नेपाल की स्थापना करने के लिए यह पहला क़दम है. उन्नीस दिनों तक चली हड़ताल के दौरान जिस प्रकार नेपाली समाज का हर वर्ग लोकतंत्र बहाल किए जाने के लिए सड़कों पर उतरा और प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रदर्शनकारियों को अपना समर्थन दिया, उससे यह साफ़ हो गया है कि नेपाल की राजनीतिक व्यवस्था में भारी बदलाव आएगा. इस व्यवस्था परिवर्तन का श्रेय उन लाखों नेपालियों को जाता है जिन्होंने अपनी परवाह किए बग़ैर सशस्त्र पुलिस और सेना का सामना किया. सात राजनीतिक पार्टियों के एक घटक दल, नेपाल सद्भावना पार्टी के महासचिव, राजेंद्र महातो कहते हैं, "राजा झुक गया लेकिन लोग गणतंत्र की मांग कर रहे हैं." राजशाही का भविष्य आम लोग राजशाही को ख़त्म किए जाने के पक्ष में हैं लेकिन राजनेता इसके पक्ष में नहीं लगते और इसकी वजह है माओवादियों का बड़ा प्रभाव और दबाव. नेपाल में माओवादी आंदोलन पिछले 10 वर्षों से चल रहा है. इस समय नेपाल का 75 प्रतिशत हिस्सा माओवादियों के प्रभाव में है जहां वे अपना कानून, अपनी कर-व्यवस्था और अपनी विचारधारा को लागू करने का प्रयास कर रहे हैं. नेपाल में सात राजनीतिक पार्टी गठबंधन के नेता, प्रदीप गिरि कहते हैं, "300 वर्षों तक काठमांडू ने बाक़ी नेपाल की चिंता नहीं की. लिहाज़ा माओवादी अपना प्रभाव बढ़ा सके." शुक्रवार को संसद की बैठक के बाद अंतरिम सरकार के नवोनीत प्रधानमंत्री, गिरिजा प्रसाद कोइराला प्रतिनिधि सभा में नया संविधान बनाए जाने के लिए संविधान सभा के चुनाव की घोषणा करेंगे और साथ ही माओवादियों से बातचीत की प्रक्रिया शुरू करने पर बात करेंगे. राजा की छवि नेपाल नरेश ज्ञानेंद्र ने 2001 में अपने भाई और तत्कालीन राजा वीरेंद्र की हत्या के बाद गद्दी संभाली थी. पाँच वर्षों से राजनीतिक दलों ने जिस प्रकार से राजा ज्ञानेंद्र के साथ कई मुद्दों पर समझौता किया और राजा वीरेंद्र की हत्या के बाद चुप्पी साधे रखी, उससे लोगों में व्यापक असंतोष और नाराज़गी है. नेपाल में 'ज्ञानेंद्र चोर, गद्दी छोड़' का नारा गली-गली में गूँज रहा था और राजा ज्ञानेंद्र के ख़िलाफ़ जनाक्रोश का मुख्य कारण कहीं न कहीं उस हत्याकांड में छुपा है. राजा ज्ञानेंद्र और राजकुमार पारस के ख़िलाफ़ नारे हर दिन लगते हैं. लोगों से बातचीत के बाद यह समझ आता है कि किस प्रकार नई राजनीतिक व्यवस्था के बारे में पूरा नेपाल विचार कर रहा है. माओवादियों की भूमिका एक बात तो तय है कि नई व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण भूमिका माओवादियों की होगी.
इस समय माओवादियों से हथियार डलवाना सबसे मुश्किल काम होगा और बिना उसके नेपाल में संविधान सभा के लिए स्वतंत्र चुनाव नहीं हो सकता. संविधान सभा ही नए संविधान में नेपाल नरेश की भूमिका पर अपनी राय रखेगी. जहाँ अधिकतर लोग नेपाल नरेश के ख़िलाफ़ हैं, समाज का एक तबका मानता है कि नेपाल की विभिन्न जातियों और वर्गों को एक साथ रखने में राजशाही की भूमिका है. कई लोग मानते हैं कि 21वीं सदी में राजशाही के लिए कोई जगह नहीं है. यह सोच माओवादियों की सोच से तो प्रभावित तो है ही, राजा ज्ञानेंद्र की छवि ने इस सोच को और मज़बूत किया है. हालांकि राजशाही का भविष्य नेपाल के लिए फिलहाल बड़ा मुद्दा नहीं है. इस समय सात राजनीतिक पार्टी गठबंधन के सामने सबसे बड़ी चुनौती है लोगों की अपेक्षाओं पर खरे उतरना, अपनी एकता बनाए रखना और नेपाल को संपूर्ण लोकतंत्र के लक्ष्य की ओर ईमानदारी के साथ आगे बढ़ाना. | इससे जुड़ी ख़बरें माओवादियों ने किया संघर्षविराम26 अप्रैल, 2006 | भारत और पड़ोस नेपाल नरेश के सत्ता छोड़ने का स्वागत 26 अप्रैल, 2006 | भारत और पड़ोस प्रधानमंत्री पद के लिए कोइराला चुने गए25 अप्रैल, 2006 | भारत और पड़ोस माओवादियों को राजा का फ़ैसला नामंज़ूर25 अप्रैल, 2006 | भारत और पड़ोस नरेश ने संसद बहाल करने की घोषणा की24 अप्रैल, 2006 | भारत और पड़ोस नेपाल में घटनाचक्र: एक नज़र23 अप्रैल, 2006 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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